
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:11 by admin
राकेश मनचंदा
जून 2011 में रिलीज फिल्म लगान को देखने से कुछ खास सबक मिलते हैं। वर्षा के देव को
की गयी प्रार्थना असफल हो जाती है। बारिश न होने से फसल खराब हुई है और किसान
परेशान हैं। वे अपनी नियति को बदलना और लगान माफ कराना चाहते हैं। उनका हिन्दू राजा
अपनी असहायता प्रकट करता है। फिल्म में दिखाया गया है कि मूर्खतापूर्ण औपनिवेशक
कर-व्यवस्था की वजह से किस तरह 99 फीसदी देसी किसान एक साथ हो जाते हैं। शर्तें तय
हो जाती हैं।
अगर किसानों की टीम अंग्रेजों की टीम को क्रिकेट के खेल में हरायेगी तो तीन सालों
के लिए उनका लगान माफ कर दिया जायेगा। दूसरी ओर अगर किसानों की टीम हारती है तो उसे
तीन गुना लगान देना होगा। खेल के लिये जरूरी सामान के बगैर ही नंगे पांव रहने वाली
देसी टीम चुनौती स्वीकार करने के लिये तैयार है। ब्रिटिश टीम मैच हार गई। छावनी बंद
हो गई। कैप्टन रसेल को पूरे प्रांत का लगान देने के लिए बाध्य किया गया क्योंकि
उच्चाधिकारियों ने उसकी शर्त को ही अवैध करार दे दिया। उसे दंडित कर मध्य अफ्रीका
भेज दिया गया।
युद्ध की ही तरह खेलों में भी देश की एकता और साहस के दर्शन होते हैं। अमीर और गरीब
सभी एक साथ बैठ कर एक-एक गेंद का मजा लेते हैं। बनने वाले और बचाये जाने वाले एक-एक
रन पर तगड़ी समीक्षाएं होती हैं जो इस बात को दिखाता है कि पारदर्शिता इस खेल के
आनंद को कितना बढ़ा देती है। बनाये गये रनों और बचाये गये रनों से हासिल होने वाली
खुशी कोई चुरा नहीं सकता। छोड़े गये कैचों और हारे गये मैचों का विस्तार से विश्लेषण
होता है। सवाल यह है कि क्या क्रिकेट की पारदर्शिता का इस्तेमाल लोगों की सहभागिता
के साथ रोजाना के प्रशासन के लिये किया जा सकता है?
भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए भारत त्राहि त्राहि कर रहा है। लोग कड़ी मेहनत करते
हैं लेकिन पुरस्कार के तौर पर जो लाभ और सुरक्षा मिलनी चाहिए, उसे चुरा लिया जाता
है। प्राचीन भारत में राजा लोग अपने लाभ मंदिर में सोने के रूप में छिपा कर रखते
थे। आज कंपनियां अपने उन सीईओ को ज्यादा पैसे देती हैं जो उनके फायदे को टैक्स
हैवेन माने जाने वाले देशों में रखवाने में मदद करते हैं।
कंपनियां अपने हित के हिसाब से काम कराने के लिए नेताओं को पटा लेती हैं लेकिन अपने
कर्मचारियों का भविष्य असुरक्षित ही छोड़ देती हैं। सीईओ उत्पादन चक्र से पैसे निकाल
कर जुआघर में लगा देते हैं जिसे शेयर बाजार कहते हैं। शेयर बाजार में बढ़ोतरी तो होती
है लेकिन रोजगारहीन बढ़ोतरी। असल में सरकार-कॉरपोरेट जगत-बैंकर त्रिगुट शेयर बाजार
पर नियंत्रण रखता है। यह त्रिगुट 99 फीसदी लोगों की मेहनत की कमाई को चुरा लेता है।
पारदर्शिता का अभाव और असली उत्पादकों की ओर से सहभागिता की कमी इनकी मदद करती है।
उत्पादन टीम और लाभ का देखरेख करने वाली टीम को एक दूसरे से अलग रखा जाता है।
क्रिकेट में अमीर और गरीब दोनों ही हर एक रन का हिसाब फायदे और नुकसान या हार या
जीत की संभावना के रूप में लगाता रहता है। मेरा देश, मेरी खुशी, मेरी जानकारी इस
उत्साह में लोग इस खेल के साथ लगे रहते हैं और पूरी तरह आनंद उठाते रहते हैं। लेकिन
आप एक ऐसे क्रिकेट मैच की कल्पना करिये जिसमें कोई नियम न हों, वाइड गेंदें न हों,
ओवरों की संख्या पर कोई बंदिश न हो, न दर्शकों की हूटिंग हो और न ही उत्साह से भरा
उनका शोर। ऐसे में क्या होगा? वह खेल कितना बोरिंग होगा? न कोई पुरस्कार और न कोई
सजा।
अब इसे आप मंत्रालयों और कारोबारी कार्य संस्कृति के ऊपर लागू करने की कोशिश
कीजिये। आप पायेंगे कि हमारी व्यवस्था में असामंजस्य को शामिल कर लिया गया है। इससे
व्यवस्था कमजोर और असुरक्षित रहती है। नतीजा? नतीजा यह कि गृह मंत्रालय जब
पाकिस्तान-प्रशिक्षित आतंकवादियों की सूची जारी करेगा तो उसमें ढेरों कमियां होंगी।
अच्छा प्रदर्शन न करने वाले खिलाड़ी को हटा लेना खेल में संभव है। लेकिन यह नियम
संसद में लागू नहीं हो सकता। वोट देने का अधिकार केवल पांच सालों बाद मिलता है।
दक्षिण अफ्रीका में पिछले फीफा विश्व कप के दौरान हमने सीखा कि अगर किसी खिलाड़ी के
पास 20-30 सेकेंड से अधिक समय तक गेंद रह जाती है तो उसे क्यों मैदान से हटा लिया
जाता है। गेंद को तेजी से आगे बढ़ाना खेल का हिस्सा है। दर्शकों में दबाव बनाने और
बढ़ाने की क्षमता होती है और वे चयनकर्ताओं को बदलाव करने के लिये मजबूर कर देते
हैं। लेकिन यहां राजनेता निर्णय लेने में देरी कर देते हैं और गलत कारणों से शोर
मचाते रहते हैं ताकि संसद में विधेयक अटक जाये। लोकपाल विधेयक और महिला आरक्षण
विधेयक नेताओं के खेल के ताजा शिकार हैं। अंग्रेजों ने दंड को अनुशासित और
व्यवस्थित प्रशासन स्थापित करने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन हम
हैं कि 44 सालों में भी सिटिजन चार्टर और लोकपाल विधेयक को एक साथ मिला कर संसद में
पारित तक नहीं करा सके हैं।
भाग्य नाम की जो वस्तु होती है उसे अभ्यास, कुशलता में बढ़ोतरी के जरिये बदला जा
सकता है। हर मिनट हर सेकेंड परिणाम देने की मांग इतनी तगड़ी है कि असली मैच में कदम
पीछे खींचने का वक्त नहीं है। जब लोकतंत्र मजबूत होता है और सहभागी चौकन्ने होते
हैं तो भाग्य को मैचजिताऊ कुशलता की मदद से बदला जा सकता है। ऐसे में निजी फायदे के
लिये नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ाने वालों के लिये कोई जगह नहीं होती। कुशलता
के आधार पर धन का उचित वितरण 99 फीसदी की आमदनी बढ़ा सकती है।
आज स्थिति यह है कि कारोबारी पिच पर सूचना को मैच फिक्सिंग के जरिये बाधित कर दिया
गया है। जिस मुनाफे को काले धन के रूप में टैक्स हैवेन देशों में जमा कर रखा गया
है, वह लौटने का नाम नहीं लेता। इसके लिये बहाने गढ़ लिये जाते हैं। किसी भी देश का
वित्त मंत्रालय यह जानता है कि केंद्रीय बैंक द्वारा कितने नोट छापे गये थे और
कितना बाहर भेजा गया है। भ्रष्टाचार की संभावना तो तब भी है लेकिन उसे घटा कर काफी
कम किया जा सकता है। आधुनिक तकनीकी से युक्त अमीर और गरीब सहभागियों का दबाव एक
आसान व्यवस्था बनाने में मदद कर सकता है जो पारदर्शिता पर नजर रखती है।
राजनीति और रोजमर्रा का प्रशासन हमेशा उबाऊ बने रहेंगे अगर भ्रष्टाचार को नियंत्रित
करने के लिये नियम तय नहीं किये जाते। भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के लिये लोगों को
स्टेडियम से लेकर संसद तक सहज व्यवस्थाएं स्थापित करनी होंगी। अगर अंडे को कोई
बाहरी शक्ति फोड़ती है तो जीवन नष्ट हो जाता है और अगर इसे कोई अंदरूनी शक्ति तोड़ती
है तो जीवन शुरू होता है। इससे पहले कि देर हो जाए, आइये एक शुरुआत करें।
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