
Posted Wed, 02/01/2012 - 21:02 by admin
ललित सुरजन
वैसे तो वित्तीय वर्ष 2012-13 का केन्द्रीय बजट पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों
के सम्पन्न होने के बाद ही संसद में पेश हो पाएगा किन्तु वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी
द्वारा बजट प्रस्तावों के संबंध में विभिन्न वर्गों के संगठनों एवं राज्यों के
वित्तमंत्रियों के साथ विमर्श का दौर प्रारम्भ कर दिया गया है जो 31 जनवरी तक चलेगा।
प्रणव मुखर्जी द्वारा सबसे पहले 11 जनवरी को किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से चर्चा
की। किसान प्रतिनिधियों द्वारा कृषि क्षेत्र हेतु अधिक बजट आवंटन, कृषि उत्पादकता
बढ़ाने तथा जीडीपी में कृषि के योगदान बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। 16 जनवरी
को श्रमिक संघों के साथ विमर्श में उनके प्रतिनिधियों द्वारा योजनाओं को श्रमोन्मुखी
बनाने के साथ-साथ श्रमिकों के हितों की रक्षा की आवश्यकता प्रतिपादित की गई। 17
जनवरी को सामाजिक क्षेत्र के संगठनों के प्रतिनिधियों से चर्चा में इन संगठनों के
प्रतिनिधियों द्वारा सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट आबंटन वृद्धि, सामाजिक आडिट,
वित्तीय समावेशीकरण तथा समावेशी विकास की सलाह दी गई।
18 जनवरी को राज्यों के वित्त मंत्रियों के साथ विमर्श बैठक में राज्यों द्वारा बजट
संबंधी अनेक सुझाव दिए गए। राज्यों द्वारा मांग की गई कि बी.के. चतुर्वेदी समिति की
अनुशंसा अनुसार केन्द्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या 147 से घटाकर 59 की जायेे तथा
राज्यों को स्थानीय आवश्यकता आधारित योजनाओं के लिए अधिक धन उपलब्ध करवाया जाय। 19
जनवरी को बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से आयोजित
विमर्श बैठक में इन संस्थानों के प्रतिनिधियों द्वारा कहा गया कि भारत की वर्तमान
बचत दर 32 प्रतिशत होने के बावजूद उसकी एक तिहाई राशि ही बैंकों में जमा हेतु आती
है, इसलिए बैंकों की जमा राशि बढ़ाने के उपाय किए जाने चाहिए। वित्तीय संस्थानों के
अधिकारियों द्वारा अधोसंरचना क्षेत्र को भी प्राथमिकता क्षेत्र में शामिल करने का
सुझाव दिया गया। प्रणव मुखर्जी विमर्श बैठक के इस क्रम में सबसे अन्त में 31 जनवरी
को वे देश के उद्योगपतियों से चर्चा करेंगे। इन चर्चाओं के बाद आगामी वित्तीय वर्ष
2012-13 के बजट प्रस्तावों को अन्तिम रूप दिया जायेगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था बड़ी कठिन दौर से गुजर रही है। किन्तु नए साल के पहले पखवाड़े
में अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार के आसार नजर आए। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि
दर में सकारात्मक परिवर्तन, अनुकूल मानसून से खाद्य उत्पादन में वृद्धि, खाद्य
स्फीति शून्य से नीचे जाकर थमना, मुद्रा स्फीति दर का 7 प्रतिशत तक नीचे आना, शेयर
बाजार में सुधार आदि से आशा का माहौल तो बना है। लेकिन इसको फौरी राहत कहा जा सकता
है। आधारभूत समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। विभिन्न वर्गों की वित्तमंत्री से बढ़ी
हुई अपेक्षाएं हैं, जिनको पूरी करना अपने आप में बड़ी चुनौती है। इस प्रकार
केन्द्रीय बजट 2012-13 के सन्दर्भ में वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के समक्ष चुनौतियां
ही चुनौतियां हैं।
वित्त मंत्री के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती राजकोषीय घाटे को पिछले वर्ष के बजट में
प्रस्तावित जीडीपी के 4.6 प्रतिशत लाने का है। 2011-12 के बजट में प्रस्तावित व्यय
से 12 खरब रुपये अधिक वास्तविक व्यय होने का अनुमान है तो वास्तविक प्राप्तियां भी
अनुमान से अरबों रुपये कम होने का अनुमान है। उदाहरण के लिए 2011-12 के बजट में
प्रस्तावित सब्सिडी की धनराशि से एक हजार अरब रुपये अधिक धनराशि सब्सिडी पर व्यय
होने का अनुमान है। उसी प्रकार सार्वजनिक उपमों विनिवेश से 40 हजार करोड़ रुपये
प्राप्त होने का लक्ष्य था जिसके विरुद्ध मात्र 1100 करोड़ रुपये ही विनिवेश
प्राप्तियां मिल सकी हैं। यदि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक का वर्तमान स्वरूप भी
अगले सत्र में पारित होकर अधिनियम बन जाता है तो इस लोक कल्याणकारी कदम से 30 हजार
करोड़ रुपये का बजट पर अतिरिक्त प्रत्यक्ष भार पड़ेगा। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना
है कि यह राशि वास्तव में दुगुनी जाएगी। जीएसटी के नाम से चर्चित वस्तु एवं सेवा कर
के अगले वर्ष भी अमल में आने के आसार नहीं हंै। वित्तमंत्री बजट घाटा कागजों पर भले
ही जीडीपी का 4.6 प्रतिशत ले आएं, वास्तविकता में यह 4.8 प्रतिशत से अधिक रहने वाला
है।
जीडीपी में वृद्धि के साथ ही साथ बजट के संसाधनों में भी वृद्धि होती है। दूसरी ओर
बजट में पूंजीगत व्यय में वृद्धि होने पर जीडीपी में वृद्धि होती है। इस प्रकार दोनों
एक दूसरे के पूरक हैं। वित्त मंत्री के समक्ष चुनौती 8 प्रतिशत विकास दर के आसपास
बनाए रखने की है क्योंकि अब 9 प्रतिशत विकास की दर प्राप्त करना सम्भव नहीं रहा।
यूरो- संकट बना हुआ है। निकट भविष्य में विदेशी विनिमय बाजार में रुपये के मजबूत
होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपनाए गए मौद्रिक उपाय
महंगाई तो कम नहीं कर पाए अलबत्ता विकास दर विशेषकर औद्योगिक विकास दर धीमी करने
में इसका भी योगदान रहा है। पिछले वर्ष भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8.5 प्रतिशत थी।
वित्तमंत्री के अनुसार चालू वर्ष में 7 प्रतिशत विकास दर प्राप्त होने की आशा है।
इसके साथ ही समावेशी विकास के लक्ष्य प्राप्त करना बहुत बड़ी चुनौती है। सीमित आमदनी
वाला आम आदमी बढ़ती महंगाई से परेशान है। वित्तमंत्री के समक्ष एक बड़ी चुनौती मुद्रा
स्फीति दर को नियंत्रित करने की है जो समस्त प्रयासों के बावजूद 7 प्रतिशत से नीचे
नहीं जा पा रही है। पेट्रोलियम पदार्थ एवं औद्योगिक उत्पादों की बढ़ती उत्पादन लागत
के कारण मुद्रा स्फीति पर काबू करना मुश्किल कार्य है। मुद्रा स्फीति दर का खुदरा
बाजार में सामयिक असर देखने को नहीं मिलता है इसलिए उपभोक्ता को राहत नहीं मिल पाती
है। अभी खाद्य स्फीति भले ही नियंत्रित दिखाई दे रही है किन्तु अप्रैल के बाद इसमें
वृद्धि की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
लेखक दैनिक देशबंधु के प्रधान संपादक हैं।
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