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Posted Wed, 02/01/2012 - 22:55 by admin

रत्ना श्रीवास्तव
खंडूरी के मुख्यमंत्री बनते ही उत्तराखंड के चुनावी समर में भाजपा फिर से लड़ाई में आ गयी है और अब कांग्रेस की चुनौतियों का कारगर तरीके से सामना कर रही है। भविष्य के चुनावी परिदृश्य पर एक रिपोर्ट।
जब तक ये अंक आपके हाथ में होगा, तब तक उत्तराखंड में मतदान की घड़ी एकदम सामने होगी या फिर राज्य की नई सरकार का भाग्य ईवीएम मशीनों में बंद हो चुका होगा। चुनाव परिणाम तो मार्च में सामने आयेंगे लेकिन जो तस्वीर दिख रही है वो उलझाने वाली है, इसमें किसी भी सियासी दल को बहुत ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा।
अब से कुछ महीनों पहले तक राज्य में भारतीय जनता पार्टी को लेकर जो आक्रोश जनता में फैलने लगा था, वो भुवन चंद्र खंडूरी के सत्ता संभालने के बाद तेजी से उठाये गये कदमों ने काफी हद तक कम कर दिया है। लेकिन ये भी सही है कि उत्तराखंड के गठन के बाद से ही यहां सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ सत्ताविरोधी कारक काम करता रहा है।
दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के राज में भ्रष्टाचार की गूंज ने बीजेपी सरकार की छवि पर खासा दाग लगाया था। निशंक राज में न केवल अफसरशाही निरकुंश हो चुकी थी बल्कि कई बड़े घोटाले उभर कर सामने आये। ट्रांसफर, पोस्टिंग और नियुक्तियों में पैसों का खुला खेल चला। जब कैग की रिपोर्ट में कुंभ घोटाले को लेकर राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया गया तो दिल्ली में बैठे बीजेपी आलाकमान की नींद खुली। इसी दौरान बीजेपी आलाकमान ने अपनी ओर से राज्य में एक सर्वेक्षण भी कराया, जिसमें साफ निकलकर आया कि निशंक सरकार दिनोंदिन अलोकप्रिय होती जा रही है, अगर चुनावों तक निशंक सत्ता में बने रहे तो बीजेपी के लिए अगली बार सत्ता में आना मुश्किल हो जायेगा। इसने आलाकमान को हरकत में आने पर मजबूर कर दिया। वैसे इससे पहले तक बीजेपी के असंतुष्ट लगातार राज्य के बिगड़ते जमीनी हालात से शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा रहे थे।
सर्वे के बाद बीजेपी की टॉप लीडरशिप को निशंक को बदलने का मन बनाना ही पड़ा। विधानसभा चुनावों से मुश्किल से छह महीने पहले साफसुथरी और कड़े प्रशासक की छवि वाले खंडूरी की ताजपोशी मुख्यमंत्री के तौर पर कराई गई। खंडूरी ने सत्ता में आते ही आपरेशन क्लीन शुरू कर दिया। उन्होंने ताबड़तोड़ दौरे शुरू किये। बेलगाम अफसरशाही को कसने की और विकास कार्यों को गति देने की कोशिश की। लेकिन असली काम किया उनके दौरों ने, जिसके जरिए उन्होंने जनता को ये संदेश दिया अब कुछ गलत नहीं होगा और उनसे जुड़े हुए विकास कार्यों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जायेगी। पिछले छह महीनों पर नजर दौड़ाएं तो दिखता है कि खंडूरी ने जहां तक हो सका निशंक राज की कालिख को पोंछने की अपनी ओर से पूरी कोशिश की।
इन छह महीनों में जिन खास बातों ने खंडूरी के प्रति विश्वास का माहौल पैदा किया उनमें लोकायुक्त की नियुक्ति, सिटिजन चार्टर, अटल खाद्यान्न योजना, राज्य में नौकरियों की बहाली और मंत्रियों द्वारा निजी संपत्ति की घोषणा शामिल हंै। कुछ समय पहले ही मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों ने राज्य की वेबसाइट पर अपनी संपत्ति के ब्योरे डाले हैं। ये कुछ ऐसे कदम थे, जिन्होंने राज्य में बीजेपी की डगमगाती नैय्या को संभाल लिया।
चूंकि बीजेपी अगले मुख्यमंत्री के रूप में खंडूरी को ही प्रोजेक्ट कर रही है, लिहाजा सारे चुनाव अभियान की कमान उन्हीं के हाथ में है बल्कि टिकट बंटवारे में भी उन्हीं की चली है। इसके चलते पार्टी के कई दिग्गज नेताओं के चहेतों के टिकट कट गये। खंडूरी को अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करके बीजेपी ने कम से कम कांग्रेस से इस मामले में बढ़त जरूर हासिल कर ली, जो अभी तक ये स्पष्ट नहीं कर पाई कि चुनाव जीतने की सूरत में उसका मुख्यमंत्री कौन होगा। कांग्रेस ने बार बार कहा है कि वह इन चुनावों में किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं कर रही, कौन मुख्यमंत्री होगा, ये चुनाव परिणाम आने के बाद ही तय होगा।
कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछले पांच सालों में जिस तरह बीजेपी शासनकाल में भ्रष्टाचार फलाफूला है और विकास कार्यों को गति नहीं मिल सकी, उससे उसके पक्ष में हवा बनी है, लेकिन हकीकत ये ही है कि कोई पार्टी कैसा भी दावा करे, राज्य में किसी भी पार्टी को भारी बहुमत नहीं मिलने जा रहा, जैसा कि हमेशा से होता आया है।
हाल में उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जनसभाओं ने चुनावी गर्मी को और बढ़ाया है। खासकर राहुल की सभाओं ने युवाओं में जोश भरा है। राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि ये कहना गलत होगा कि सोनिया और राहुल की यात्रा का असर नहीं पड़ा है बल्कि इसने कांग्रेस की स्थिति को मजबूत करने का काम जरूर किया है। कांग्रेस अपने चुनावी अभियान में लगातार राज्य में पिछले दिनों के बदतर हालात की यादों को ताजा करने की कोशिश कर रही है। उसके निशाने पर खंडूरी भी हैं। कांग्रेस का कहना है कि वर्ष २००७ के चुनावों में ये खंडूरी ही थे, जिन्होंने घूम घूमकर कांग्रेस के ५६ घोटालों की सूची जनता को दिखाई थी और दावा किया था कि सत्ता में आते ही वो इसकी जांच कराएंगे। पिछले विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करके जब बीसी खंडूरी पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस पर जांच आयोग का गठन भी किया। इस आयोग ने कुछ समय पहले अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, लेकिन राज्य सरकार इसलिए उसे सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रही है, क्योंकि उसमें कुछ है ही नहीं। वाकई कांग्रेस के इस आरोप पर बीजेपी और खंडूरी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं बल्कि इसके जवाब में वे जनता का ध्यान केंद्र सरकार के हाल के घोटालों की ओर खींच रहे हैं।
७० सीटों वाले उत्तराखंड में नौ सौ से ज्यादा उम्मीदवार भाग्य आजमा रहे हैं जिसमें बड़ी संख्या निर्दलियों की है। कांग्रेस और बीजेपी के बागी उम्मीदवार भी बड़ी संख्या में जोर आजमाइश कर रहे हैं। जाहिर है कि ये लोग अपनी ही पूर्व पार्टियों के उम्मीदवारों को पलीता लगाएंगे। कई जगहों पर बागी ज्यादा मजबूत भी हैं। कांग्रेस में कई गुट हैं-हरीश रावत, विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज इनकी अगुवाई करते हैं, लिहाजा इससे कांग्रेस में अंतर्कलह की स्थिति भी है।
चुनावों में उत्तराखंड क्रांति दल और बहुजन समाज पार्टी ने भी तमाम उम्मीदवारों को उतारा है, बेशक इनका बहुत ज्यादा असर न पड़े लेकिन दोनों ही दल वोट काटने का काम करेंगे और उम्मीद है कि इनके दो से चार उम्मीदवार जीत हासिल करके विधानसभा तक भी पहुंचेंगे।

दस सालों में उत्तराखंड
उत्तराखंड में पिछले दस सालों में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। पहले तो नया राज्य होने के कारण ऊंचे अफसरों और आला नेताओं से लेकर नीचे तक की ब्यूरोक्रेसी ने जमकर भ्रष्टाचार की गंगा बहाई और अब भ्रष्टाचार सरकारी ढांचे के निचले तबके तक पहुंच चुका है जिसकी वजह से ढेर सारी योजनाओं का लाभ गांवों और गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा। पुलिस का अमला बढ़ने के बावजूद अपराधों पर अंकुश नहीं लग पाना राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति पर सवाल भी उठाता है। वहीं पर्यटन के मामले में राज्य की हालत जस की तस है, न तो कोई नये केंद्र विकसित किए जा सके और न ही पुराने परंपरागत पर्यटन केंद्रों की सुविधाओं पर ध्यान दिया जा सका। सच कहा जाये तो राज्य को वित्तीय तौर पर अपने पैर पर खडे हो जाना चाहिए था, उसके पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन भी हैं लेकिन इस मोर्चे पर भी हालत क्यों बदतर होती जा रही है, समझ से बाहर है। राज्य बनने के समय उत्तराखंड पर १६०० करोड़ रुपये का कर्ज था और अब ये बढ़कर १६००० करोड़ रुपये पर पहुंच चुका है।

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