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Posted Wed, 02/01/2012 - 21:50 by admin

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उत्तर प्रदेश के हालात बहुत ही चिन्ताजनक हैं। जनता रूपी मेमने को दबोचने के लिए राजनीतिक दलों के रूप में रंग सियारों ने अपनी बिसात बिछा दी है। प्रदेश के सभी राजनीतिक दल, चाहे छोटे हों या बड़े, लोकतंत्र, कानून के शासन, जनकेंद्रित विकास सभी प्रमुख शर्तों से बहुत पीछे हैं। जनांदोलनों का पिछले वर्ष का दौर वर्तमान राजनीति को एक इंच भी नहीं बदल पा रहा है। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और प्रदेश की राजनीति एक घातक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर गयी है। निश्चित रूप से आने वाला समय व्यापक जनअसंतोष व जनांदोलनों को होना है और इसी बीच चुनाव व चुनावों के बाद की उठापटक, गठजोड़ और लूट-खसोट, प्रमुख मुद्दे और उनके प्रति प्रमुख दलों का नजरिया हमारे आगे के विश्लेषण का विषय है और इन्हीं के बीच प्रदेश में निकट भविष्य में बड़े संघर्षों एवं नये विकल्पों व नेतृत्व के उभरने की प्रक्रिया भी शुरू होगी। समग्र विश्लेषण हमारे विशेष संवाददाता हिमांशु का।
देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावी लाभ लेने के मकसद से हर छोटी-बड़ी पार्टी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। अगले लोकसभा चुनाव के पहले के सबसे अहम चुनावों में से एक है उत्तर प्रदेश का चुनाव। कहा तो यह भी जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद दिल्ली के सियासी समीकरणों में बड़े फेरबदल दिख सकते हैं। अब तक के चुनाव सर्वेक्षण और राजनीति के जानकारों की बातों से जो संकेत मिल रहे हैं उससे पता चलता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है। ऐसी स्थिति में चुनावी नतीजे आने के बाद होने वाले जोड़-तोड़ में इन छोटी पार्टियों की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है।
यहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी जिसने उत्तर प्रदेश को न सिर्फ बीमार राज्यों की श्रेणी में ला खड़ा किया है बल्कि राज्य की समस्याओं को सुलझाने के खोखले दावे करने वाले फर्जी डॉक्टरों की फौज भी खड़ी की है। इस राज्य ने बारी-बारी से इन चारों दलों को आजमा कर देखा है लेकिन अगर आज भी उत्तर प्रदेश के कई गांवों में बिजली का तार नहीं पहुंच पाया है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अगर आज भी बीमारी की पहचान हुए बगैर हर साल हजारों जानें उत्तर प्रदेश में जा रही हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अगर आज भी बुनियादी शिक्षा से बड़ी संख्या में सूूबे के बच्चे वंचित हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? कहने की जरूरत नहीं कि हर स्तर पर राज्य को बीमार बनाने के लिए प्रदेश में नेताओं के वेश में काम करने वाले वे फर्जी डॉक्टर ही जिम्मेदार हैं जिन्हें बीमार का इलाज तो पता नहीं लेकिन वे शर्तिया इलाज का दावा करने में पीछे नहीं हटते।
२००७ में अनुमानों के उलट मायावती को पूर्ण बहुमत मिला था और वे प्रदेश पर राज करने के लिए चौथी दफा पंचम तल पहुंची थीं। उनकी पार्टी को ४०२ सीटों में से २०६ पर जीत हासिल हुई थी। सपा को २००७ में ९७ सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। भाजपा ५१ सीटों के साथ तीसरे पायदान पर रही थी और देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी २२ सीटों पर सिमट गई थी। जानकार बता रहे हैं कि इस बार प्रदेश में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है। बहरहाल, बसपा को एक बार फिर सत्ता में लाने के लिए मायावती कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ रही हैं। उन्होंने विपक्षी दलों पर आक्रामक हमला करने की अपनी पुरानी रणनीति अपनाई है जिससे उनका पारंपरिक वोट बैंक खुश होता है। मायावती की आक्रामकता उस वक्त चरम पर पहुंचती दिखी जब उन्होंने अपनी मूर्तियों और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी को ढंकने का आदेश देने वाले चुनाव आयोग पर भी प्रेस वार्ता करके हमला बोला। जो लोग उत्तर प्रदेश की जाति आधारित राजनीति को समझते हैं वे यह मानते हैं कि मायावती को थोड़ा नुकसान तो होगा और संभवत: वह अकेले सरकार बनाने की स्थिति में भी न रहें लेकिन यह नुकसान इतना अधिक नहीं होगा कि मायावती एकदम से प्रदेश की राजनीति में अप्रासंगिक हो जाएं।
जहां तक बात समाजवादी पार्टी की है तो इसे सबसे ज्यादा फायदा होने का अनुमान कई राजनीतिक जानकार और चुनाव सर्वेक्षण भी लगा रहे हैं। लोग यह भी बता रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा संभालने वाले उनके बेटे अखिलेश यादव जिस तरह से यात्रा कर रहे हैं और कार्यकर्ताओं को एकजुट कर रहे हैं उससे सपा के प्रदर्शन में आश्चर्यजनक सुधार दिखेगा और यह पार्टी चुनाव के बाद नंबर एक बनकर उभरेेगी। हालांकि, कई जानकार इस दावेे को खारिज करते हैं। इन लोगों का कहना है कि निश्चित तौर पर सपा के प्रदर्शन में सुधार होगा लेकिन यह सुधार इतना नहीं होगा कि वह सीटों के मामले में पहले नंबर की पार्टी बन जाए। क्योंकि मुलायम राज जिस तरह से गुंडा राज में तब्दील हुआ था उससे लोगों में अब भी डर बना हुआ है और वे नहीं चाहेंगे कि मुलायम वापस सत्ता में आएं।
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश बेहद अहम राज्य है। इसी राज्य ने भाजपा के लिए दिल्ली से शासन चलाने का रास्ता साफ किया था। उत्तर प्रदेश में भाजपा द्वारा शुरू किए गए राम मंदिर आंदोलन का लाभ इसे न सिर्फ प्रदेश में मिला बल्कि और भी कई राज्यों में पार्टी ने बेहद सफाई से मंदिर कार्ड खेलकर चुनावी लाभ उठाया। लंबे समय से पार्टी से बाहर रही उमा भारती को उत्तर प्रदेश के रास्ते पार्टी में वापस लाकर भाजपा ने मतदाताओं को साफ संकेत दे दिए हैं कि वह मंदिर का मसला भूली नहीं है। जानकारों का तो कहना है कि भाजपा इस चुनाव में लाभ लेने की राह पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी लेकिन पार्टी ने जिस तरह से मायावती द्वारा मंत्रिमंडल और पार्टी से निलंबित और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया उससे भाजपा की काफी फजीहत हुई और यह मायावती सरकार और केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलने के काबिल नहीं बची। यानी कहा यह जा रहा है कि पार्टी जो लाभ लेती दिख रही थी उससे कहीं ज्यादा नुकसान उठाती दिखने लगी है, कम से कम स्वच्छ छवि का। पार्टी ने अपनी रणनीति को मजबूत बनाने के लिए इस कौशल में माहिर माने जाने वाले संजय जोशी को भी भाजपा में वापस बुलाकर उत्तर प्रदेश में काम पर लगाया है। निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं तक को सीधेे तौर पर जानने वाले संजय जोशी द्वारा पार्टी के टिकट बंटवारे से लेकर कई कार्यों में अहम भूमिका निभाए जाने से यह माना जा रहा है कि भाजपा को इसका लाभ मिलेगा।
लंबे समय तक उत्तर प्रदेश पर राज करने वाली कांग्रेस इस बार अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। राहुल गांधी ने प्रदेश के चुनावों को अपने लिए प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है। हालत यह है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी की सफलता या असफलता को राहुल गांधी की कामयाबी या नाकामयाबी के तौर पर देखा जाने लगा है। पर अपराधियों को टिकट देने के मामले में न तो कांग्रेस पीछे है और न ही जाति और संप्रदाय की राजनीति करने में (देखें विशेष रिपोर्ट पेज संख्या 30 पर)। मोटे तौर पर जानकारों का कहना है कि कांग्रेस का २००७ का २१ सीटों का आंकड़ा सुधरेगा लेकिन यह इतना भी नहीं होगा कि कांग्रेस प्रदेश की सत्ता में आ जाए। हालांकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी एक खास जगह बनाए रखने वाले राष्टï्रीय लोकदल के अजित सिंह को अपने साथ मिलाकर अपनी संभावनाओं को मजबूत करने की कोशिश जरूर की है किन्तु अपने क्षेत्र में अजित सिंह की हालत भी कुछ अच्छी नहींहै।
अनुमान है कि इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किसी को बहुमत नहीं मिलने वाला। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि सरकार बनाने में उन छोटी पार्टियों की बड़ी भूमिका होगी जो कुछ-कुछ सीटें जीतेंगी। इन छोटी पार्टियों में मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाली पीस पार्टी पर सबकी नजर है। कहा जा रहा है कि इस पार्टी के सीटों की संख्या पांच से अधिक रह सकती है। हालांकि, इस पार्टी को चलाने वाले लोगों का दावा है कि वे कम से कम १५ सीटें जीतेंगे। अगर कुछ और छोटी पार्टियां कुछ सीटें जीतने में कामयाब रहती हैं तो किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में इनकी अहमियत काफी बढ़ जाएगी। साफ शब्दों में कहा जाए तो चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए जो जोड़-तोड़ का खेल चलेगा उसमें इन पार्टियों की चकल्लस रहेगी। यानी फिर से उत्तर प्रदेश की राजनीति वहीं वापस लौट कर आ जा रही है जहां इस सूबे की बीमारियों की जड़ है। अब अहम सवाल यह उठता है कि आखिर वे बीमारियां या यों कहें कि वे समस्याएं हैं क्या, जिसके आसपास प्रदेश की राजनीति सालों से घूम रही है?
भ्रष्टाचार
उत्तर प्रदेश में सरकार चलाने वालों के लिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के आरोप नए नहीं हैं। चाहे वह सरकार मुलायम की हो या मायावती की, कम से कम इस मामले में इन दो धुर विरोधियों में जबर्दस्त समानता दिखती है। अभी प्रदेश में जो मायावती सरकार है उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के नए-नए आरोप लग रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चित रहा है राष्टï्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम में घोटाला। जब इस घोटाले में मायावती सरकार की मुश्किलें लगातार बढ़नेे लगीं तो उन्होंने अपने स्वास्थ्य मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को मंत्रिपद और पार्टी से निकालकर खुद को पाक साफ दिखाने की असफल कोशिश की। एनआरएचएम पर अपै्रल २००५ से मार्च २०११ तक किया गया कुल खर्च ८६५७.३५ करोड़ रुपये है। इस योजना में किस कदर भ्रष्टाचार हुआ इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार की ओर से जो पैसे दिए गए थे और राज्य सरकार द्वारा जो पैसे स्वीकार किए गए हैं उनके बीच सीएजी के अनुसार 5000 करोड़ रुपये से अधिक का अंतर है। इस अंतर के बारे में न तो मायावती कुछ बोल रही हैं और न ही बाबू सिंह कुशवाहा। साफ है कि प्रदेश के लोगों की सेहत सुधारने के मकसद से जो पैसा चला उससे जरूरतमंदों की सेहत तो नहीं सुधरी लेकिन राज्य के कई नेताओं और अधिकारियों का बैंक बैलेंस जरूर बढ़ गया। चुनाव में विपक्षी दल इस मसले को खूब उछाल रहे हैं लेकिन इस बारे में साफ तौर पर कोई कुछ नहीं कह रहा कि जब एक आम मतदाता वोट देने जाएगा तो उसके फैसले को एनआरएच घोटाला कितना प्रभावित करेगा।
कांग्रेस रोजगार गारंटी योजना में घोटाले का मसला भी बड़े जोर-शोर से उठा रही है। कुछ ही दिनों पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने मायावती को पत्र लिखकर कहा कि इस योजना में प्रदेश में काफी धांधली चल रही है और मायावती को इस मामले की सीबीआई जांच कराने का आदेश देते हुए भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई करनी चाहिए। मायावती अच्छी तरह जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन को वापस पाने के लिए कांग्रेस भ्रष्टाचार के इन आरोपों को हथियार बना रही है। इसलिए मायावती ने जवाब में सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और जयराम रमेश के सारे आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ग्रामीण विकास मंत्री चिट्ठी लिखने का काम राजनीति से प्रेरित होकर कर रहे हैं। मायावती जो कह रही हैं, वह बिल्कुल सही है। हालांकि, खुद २जी स्पेक्टम आवंटन, राष्टमंडल खेलों के आयोजन, आदर्श सोसायटी और कई अन्य घोटालों से घिरी कांग्रेस के नेताओं के मुंह से भ्रष्टाचार की बात सुनकर प्रदेश के लोग इसे किस तरह से पचा पाएंगे, यह तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे।

जाति की राजनीति
यह कहना गलत नहीं होगा कि जाति की राजनीति को मजबूती देने में सबसे अहम भूमिका उत्तर प्रदेश ने निभाई है। चाहे वह मायावती हों या मुलायम सिंह यादव, प्रदेश की राजनीति के इन दो सबसे ताकतवर खिलाड़ियों ने अपना अब तक का सफर काफी हद तक जाति की राजनीति करके ही पूरा किया है। यही वजह है कि तमाम आरोपों के बावजूद मायावती इस बात को लेकर आश्वस्त नजर आ रही हैं कि उनका वोट बैंक उनसेे छिटका नहीं है और उन्हें एक बार फिर पंचम तल पहुंचाएगा। मायावती के बेहद करीबी और बसपा में नंबर दो माने जाने वाले सतीश मिश्रा जिस तरह फिर से सक्रिय हुए हैं उससे यह लगता है कि उन्हें इस बात का भरोसा है कि उनकी पार्टी दलित-ब्राह्मण समीकरण के जरिए सत्ता में पहुंचने में कामयाब होगी। सतीश मिश्रा को इस बात से भी उत्साह मिल रहा होगा कि कुछ लोग यह बात कहने लगे हैं कि मुलायम सिंह यादव के राज में प्रदेश के ब्राह्मण खुद को बहुत ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे थे लेकिन बसपा के राज में उनके अंदर का असुरक्षा भाव कम हुआ है। कई राजनीतिक जानकार भी यह बात कह रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव को रोकने के लिए राज्य के दलित और ब्राह्मण मायावती के पक्ष में मतदान कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो मुलायम को उम्मीद बंधाने वाले सारे राजनीतिक सर्वेक्षण गलत साबित हो सकते हैं। प्रदेश की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी २१ फीसदी है। इनमें भी अच्छी-खासी संख्या जाटवों की है। जानकार बता रहे हैं कि यह ऐसा वोट बैंक है जो मायावती से छिटकता हुआ नहीं दिखता। शायद यही वजह है कि मायावती को जब भी मौका मिलता है वे दलितों के अंदर गर्व की भावना जगाने से नहीं चूूकतीं। हालांकि, यह भावना काफी हद तक खोखली है क्योंकि मायावती के राज में दलितों के विकास के नाम पर जमीनी तौर पर कुछ हुआ नहीं है। पर जब बात जाति की हो तो वहां विकास का मुद्दा पीछे छूट जाने से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए।
वहीं सपा की तैयारी मुसलमानों और यादवों के बूते राज्य की सत्ता में वापस लौटने की है। इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के वोट बटोरने की जुगत में भी सपा लगी हुई है। अखिलेश यादव की यात्राओं को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। अखिलेश के बारेे में यह बताया जा रहा है कि वे अपनी यात्रा के दौरान जहां भी जा रहे हैं वहां वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सघन जनसंपर्क अभियान चलाने की नसीहत देे रहे हैं। जाति की राजनीति में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। टिकट बंटवारे से लेकर अलग-अलग जाति के नेताओं को प्रचार अभियान में शामिल करके कांग्रेस एक बार फिर उसी पिच पर वापस आ गई है जिस पर शानदार प्रदर्शन करने के मामले में बसपा और सपा का कोई सानी नहीं है।
वहीं भाजपा उमा भारती को लाकर पहले तो हिंदू मतों के धु्रवीकरण का सपना संजो रही हैं और यह भी उम्मीद कर रही है कि उमा भारती के आने से उसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों का वोट भी मिलेगा। पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, यह पूछे जाने पर भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जवाब दिया उससे यह साफ पता चलता है कि भाजपा किस तरह से जातिगत समीकरणों को अपने पक्ष में करना चाहती है। गडकरी नेे कहा कि राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, उमा भारती और सूर्यप्रताप शाही के नेतृत्व में पार्टी उत्तर प्रदेेश में चुनाव लड़ेगी और नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री का चुनाव पार्टी करेगी। इन चारों को अहमियत देेकर गडकरी एक साथ ठाकुर, ब्राह्मण, अन्य पिछड़ा वर्ग और भूमिहारों के वोट पार्टी के पक्ष में करने का कार्ड खेल रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिस बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लाने पर भाजपा की इतनी फजीहत हुई उन्हें भी जातिगत समीकरण अपने पक्ष में करने के मकसद से ही लाया गया था। यद्यपि गडकरी की योजनाओं को आडवाणी गुट पलीता लगाने पर तुला हुआ है।

मुस्लिम तुष्टिकरण
भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक दलों नेे राज्य के मुसलमानों को लुभाने की कोशिशों में कोई कमी नहीं छोड़ी है। उत्तर प्रदेश के कुल मतदाताओं में मुसलमान मतदाताओं की हिस्सेदारी १९ फीसदी है। राज्य की ४०६ विधानसभा सीटों में से १५० पर मुसलमान मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उत्तर प्रदेश के २३ जिलों में मुसलमानों की आबादी पांच लाख से अधिक है। ये आंकड़े इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों का वोट राज्य की राजनीति में कितनी अहमियत रखता है। यही वजह है कि कोई भी दल इस वोट बैंक को अपने पक्ष में करने का अवसर नहीं गंवाना चाहता।
इस वर्ग को लुभाने के लिए कांग्रेस ने सच्चर समिति के बहाने आरक्षण कार्ड खेला। चुनाव आयोग ने इसमें फच्चर फंसा दिया। लेकिन कांग्रेस का कहना है कि चुनाव के बाद वे इस मामले को आगे बढ़ाएंगे। जाहिर है कि ऐसा करके पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में करना चाहती है। जयपुर में आयोजित साहित्य समारोह में सलमान रश्दी को शामिल होने से रोकनेे को भी मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। क्योंकि मुसलमान रश्दी से नाराज हैं और ऐसे में रश्दी को भारत आने का मौका देकर कांग्रेस ने मुसलमानों के वोट खुद से दूर करने का खतरा नहीं उठाया। कांग्रेस ने मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के मकसद से सपा के राशिद मसूद को अपनी पार्टी में शामिल किया है। कहा जाता है कि सहारनपुर और आसपास के इलाकों में मसूद की अच्छी पकड़ है इसलिए कांग्रेस को लगता है कि मसूद के आने से पार्टी को अधिक मुस्लिम वोट मिलेंगे।
वहीं सपा ने मुसलमानों को लुभाने के लिए इस बार के विधानसभा चुनावों मेें ८१ मुसलमानों को टिकट दिया है। मुलायम सिंह यादव ने आजम खान को वापस लाकर मुसलमानों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे अब भी उनके उतने ही प्रिय हैं जितने पहले थे। आजम खान को पार्टी में किस तरह से अहमियत मिली हुई है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुलायम और अखिलेश के बाद आज वे पार्टी में नंबर तीन हैं। मुलायम सिंह यादव को यह लगता है कि अब भी सूबे के मुसलमान आजम खान को सम्मान की निगाह से देखते हैं, इसलिए आजम के पार्टी में अहम स्थिति में होने से इसके चुनावी प्रदर्शन पर असर पड़ेगा।
मुसलमानों को लुभाने की दौड़ में मायावती भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने पिछले चुनावों में ६४ मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था। इस बार उन्होंने 87 मुसलमानों को टिकट दिए हैं।

राज्य बंटवारा
मायावती ने चुनावों के ठीक पहले उत्तर प्रदेश को चार हिस्से में बांटने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजकर एक ऐसी चाल चली है जिस पर दूसरी पार्टियां फंस गई हैं। मायावती की यह चाल चुनावी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बस कुछ सेकंडों में ही उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों- पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित हो गया और विधानसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। कांग्रेस और भाजपा ने इस प्रस्ताव को मायावती का चुनावी स्टंट बताया और कहा कि केंद्र सरकार को यह प्रस्ताव नहीं स्वीकारना चाहिए। पर कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इस मसले पर यह कहकर चतुराई का परिचय दिया है कि वह इस मामले पर अंतिम फैसला लेने के लिए दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की सिफारिश करेगी। साफ है कि कांग्रेस यह प्रस्ताव लाकर अपने पत्ते नहीं खोल रही है और इस मामले को लंबे समय तक अटकाने की रणनीति पर काम कर रही है। जब मायावती ने यह प्रस्ताव विधानसभा में पारित करवाया तो पहले तो सपा की समझ में ही नहीं आया कि वह क्या रुख अपनाए। क्योंकि मायावती का यह कदम अनापेक्षित था। लेकिन फिर सपा ने इस प्रस्ताव का विरोध करना शुरू कर दिया। चुनाव में यह मुद्दा रह-रहकर उठ तो रहा है लेकिन यह कहना मुश्किल है कि राज्य के बंटवारे के इस प्रस्ताव से चुनाव के परिणामों पर कितना असर पड़ेगा।

बिजली-सड़क-पानी
इस दौर में ये तीनों मुद्दे वैसी बुनियादी जरूरतों में शामिल हो गए हैं जैसे कभी रोटी-कपड़ा-मकान के बारे में माना जाता था। मायावती भले ही अपने राज में इन मोर्चों पर सुधार के लिए कई कदमों का उल्लेख कर रही हों लेकिन हकीकत तो यही है कि आज भी सबसे अधिक आबादी वाला यह सूबा इन तीन मोर्चों पर बहुत बुरी हालत में है। बिजली आपूर्ति के मामले में प्रदेश की हालत खराब है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रदेश खुद उतना बिजली उत्पादन नहीं करता जितनी उसकी जरूरत है। हालांकि, हर पार्टी सरकार में आने से पहले यह दावा जरूर करती है कि सत्ता में आने के बाद अपने पांच साल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश को बिजली के लिहाज से सरप्लस राज्य बना देगी। इस बार कई जगह चुनाव प्रचार में भी बिजली के मुद्दे को उठाया जा रहा है। गांवों में बिजली पहुंचने का श्रेय लेेने की कोशिश कांग्रेस कर रही है। कांग्रेस के नेता यह कह रहे हैं कि आपके गांव में बिजली तो केंद्र सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत पहुंची है इसलिए आपके वोट पर पहला हक हमारा बनता है।
सड़क और पानी के मामले में प्रदेश की हालत ठीक नहीं है। मायावती की महत्वाकांक्षी परियोजना गंगा एक्सप्रेसवे परवान नहीं चढ़ पाई। कुछ गांवों में सड़कों की हालत जरूर सुधरी है लेकिन इसके लिए कांग्रेस क्रेडिट लेने की कोशिश कर रही है। क्योंकि कांग्रेस का दावा यह है कि ये सड़कें तो प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनी हैं। इसलिए इसका श्रेय उसे जाता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो सड़कों के मामले में अब भी यह राज्य संतोषजनक स्थिति में नहीं पहुंच सका है। पानी के मसले पर देखा जाए तो वह चाहे पेयजल का मसला हो या फिर सिंचाई का, बुनियादी ढांचे का अभाव स्पष्ट दिखता है। आज भी राज्य के कई इलाके ऐसे हैं जहां खेती इस बात पर काफी हद तक निर्भर है कि बारिश कितनी होती है। वहीं सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जिन्हें पीने के लिए स्वच्छ पानी नसीब नहीं हो पा रहा है।

स्वास्थ्य
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत सुधारने के लिए एनआरएचएम के तहत राज्य को काफी पैसे मिले थे लेकिन जिस तरह से इस रकम की बंदरबांट हुई उससे इस मोर्चे पर सुधार की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गईं। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल क्या है, इसे समझने के लिए यह जरूरी नहीं है कि पूरे सूबे की खाक छानी जाए। पूर्वांचल के सोनभद्र जिले में पिछले दो महीनों में एक रहस्यमय बीमारी से दो दर्जन से अधिक बच्चों को असमय ही मौत का शिकार होना पड़ा है। लेकिन प्रदेश सरकार के स्तर पर सुगबुगाहट दिखनी तो दूर अब तक एक आधिकारिक बयान तक नहीं आया है। बदहाली का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि यहां किसी ऐसी बीमारी की वजह से बच्चों की जान जा रही है।
इस जिले में रिहंद बांध से सटे गांवों दधियारा और स्योढ़ों के तकरीबन हर घर में कुछ दिन पहले तक कोई न कोई बीमार था। नमेरा और चोपन की हालत भी कुछ ऐसी ही है। इस इलाके में ज्यादातर मौतें उन बच्चों की हुई हैं जो पिछड़े वर्ग के परिवारों के हैं। इससे मायावती के पिछड़ा प्रेम की पोल भी खुलती है। भले ही सरकार और स्थानीय प्रशासन आधिकारिक तौर पर इस इलाके में ऐसी किसी बीमारी की बात को नहीं मान रही हो लेकिन इलाके में कुछ दिनों पहले ही सचल महामाया अस्पताल को तैनात किया गया। इसका मतलब यह नहीं कि सरकार इस समस्या का समाधान चाहती है। क्योंकि स्थानीय लोगों का तो यह कहना है कि जिस सचल महामाया अस्पताल को इलाके में लगाया गया है उसमें न तो जरूरी दवाइयां होती हैं और न ही जरूरी चिकित्सा उपकरण। इसलिए इन सचल अस्पतालों से यहां हो रही मौतों को रोकना मुमकिन नहीं है। ऐसी ही तस्वीर पूरे राज्य के हर क्षेत्र की है।

विकास
बुनियादी सुविधाओं के मामले में उत्तर प्रदेश आज भी वहीं खड़ा है जहां पांच साल पहले था। एक तरफ जहां देश के बाकी राज्य बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं वहीं उत्तर प्रदेश में सरकार का पूरा ध्यान मायावती की मूर्तियां लगवाने में है। कई सर्वेक्षणों में उत्तर प्रदेश को विकास के मामले में काफी निचने पायदानों पर रहा है। आठ उत्तर भारतीय राज्यों में से हर मोर्चे पर सबसे बुरा प्रदर्शन उत्तर प्रदेश का ही है। प्रदेश की इस बुरी हालत के लिए जानकार मायावती सरकार द्वारा राज्य की कृषि क्षमताओं का सही इस्तेमाल नहीं किए जाने और निवेश के अनुकूल माहौल नहीं बनाने को जिम्मेदार मानते हैं। पिछले पांच सालों में निवेेश के मोर्चे पर सुधार के लिए मायावती ने कोई खास कोशिश नहीं की है। ऐसे में राज्य की अर्थव्यवस्था आज बेहद बुरी स्थिति में है।
विकास के मोर्चे पर मायावती सरकार कितनी असफल रही है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब भी बुंदेलखंड के किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पूर्वांचल में हर साल जापानी बुखार हजारों लोगों की जान ले रहा है। बड़ी संख्या में लोग आज भी प्रदेश से पलायन करके दूसरेे राज्यों में रोजी-रोटी की तलाश रहे हैं। हालांकि, मायावती राज्य के विकास के नाम पर नोएडा और ग्रेटर नोएडा का उदाहरण सामने रखती हैं लेकिन यह दावा कितना खोखला है यह आसपास के इलाकों के किसान बता देंगे। इन लोगों का कहना है कि इनकी जमीन जबरन ली गई है और इस पर खोखले विकास की चादर चढ़ाई गई है। सच तो यह भी है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में विकास की गाड़ी आगे बढ़ी है तो इसके लिए जिम्मेदार दिल्ली से इसकी निकटता है और इसी वजह से यहां रियल एस्टेट का बाजार फल-फूल रहा है। विपक्षी दलों का आरोप यह है कि इस उद्योग की कमाई का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारियों तक पहुंचता है।

मंदिर-मस्जिद
वैसे तो बाबरी ढांचे का विध्वंस तकरीबन बीस साल पहले हुआ था लेकिन आज भी यह मसला यहां की राजनीति में कहीं न कहीं अपनी अहमियत बचाए हुए है। यही वजह है कि अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर आंदोलन खड़ा करने वाली भाजपा उमा भारती को पार्टी में वापस लाकर मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि वह अब भी अपने उस वादे पर कायम है। कहना न होगा कि उमा भारती राम मंदिर के आंदोलन के प्रमुख चेहरों में एक रही हैं। भाजपा को लगता है कि उमा भारती को लाने से मंदिर का सपना देखने वाला एक तबका उसके साथ जुड़ेगा। पर भाजपा के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि प्रदेश में मंदिर का ख्वाब देखने वाले लोग खुद को भाजपा द्वारा ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि इस पार्टी ने केंद्र की सत्ता में छह साल तक रहने के दौरान इस मामले में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। हालांकि, भाजपा इसे गठबंधन सरकार की मजबूरी बताती है लेकिन लोगों के बीच में यह धारणा घर कर गई है कि भाजपा इस मामले पर गंभीर नहीं रही। हालांकि, भाजपा एक बार फिर मंदिर का मसला गर्म करके वोट बटोरने को किस तरह व्याकुल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने अपनी स्वाभिमान यात्रा की शुरुआत काशी और मथुरा से की और इसका समापन आयोध्या में किया। यानी रणनीतिक ढंग से पार्टी ने मंदिर के मसले को जिंदा रखने की कोशिश की है।
अयोध्या पर जब कुछ महीने पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आया तो मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट बटोरने को आतुर समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस फैसले को गलत बताया। उन्होंने कहा कि फैसला मुस्लिमों के लिहाज से अन्यायपूर्ण है। कांग्रेस की तरफ से भी दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के बयान आने लगे। साफ है कि मंदिर-मस्जिद के नाम पर प्रदेश में वोट बटोरने की दौड़ में अकेले सिर्फ भाजपा शामिल नहीं है बल्कि हर दल इस ताक में है कि कैसे उसे यह मसला चुनावी लाभ दिला सकता है।

दलबदल
यह उत्तर प्रदेश की राजनीति की ऐसी बीमारी है जिसकी शुरुआत काफी पहले हो गई थी। यहां की राजनीति का मिजाज अब ऐसा बन गया है कि अगर किसी को उसकी पार्टी में टिकट नहीं मिलता, तो शाम तो वह किसी दूसरे दल में शामिल होता है और अपने लिए टिकट का जुगाड़ कर लेता है। बाबू सिंह कुशवाहा इस बार के उत्तर प्रदेश चुनाव के सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर उभरे हैं। उन्हें भाजपा ने न सिर्फ गले लगाया बल्कि टिकट भी देने वाली थी लेकिन कुशवाहा को पार्टी में लाने को लेकर पार्टी के भीतर ही इतना हंगामा हुआ कि मजबूरन भाजपा कुशवाहा को टिकट देने से पीछे हट गई। बसपा से आए कुछ मंत्रियों और विधायकों को सपा ने भी टिकट से नवाजा है और भाजपा ने भी। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें ये दोनों विपक्षी दल अपने दल में शामिल होने से पहले पानी पी-पीकर कोस रहे थे। भाजपा कल तक बसपा के अवधेश कुमार वर्मा और बादशाह सिंह को गरिया रही थी लेकिन आज ये दोनों भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।
सपा भी कुछ समय पहले तक बलात्कार के आरोपी गुड्डू पंडित पर हमले कर रही थी लेकिन आज गुड्डू इसी पार्टी के उम्मीदवार हैं। कांग्रेस के साथ अजित सिंह के जाने के बाद कभी उनकी खासमखास माने जानी वाली अनुराधा चौधरी ने सपा की राह पकड़ ली। दलबदल करके आने वालेे लोगों को टिकट से नवाजने के मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। बुंदेलखंड में १०-१२ सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस ने उन लोगों को टिकट दिया है जो पिछली बार बसपा और सपा के टिकट पर विधायक बने थे। इन अवसरवादी नेताओं को सभी दलों ने जिस तरह से गले लगाया है उससे यह संकेत तो साफ तौर पर उभरता है कि सैद्धांतिक मामलों में सब एक धरातल पर ही खड़े हैं।

परिवारवाद
परिवारवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा घर जमाया है कि आम कार्यकर्ताओं के लिए टिकट पाना असंभव सा हो गया है। चाहे वह सपा हो या भाजपा या फिर कांग्रेस, सबने इस राह पर चलने में काफी दिलचस्पी दिखाई है। कल तक परिवारवाद को हर मौके पर कोसने वाले मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश यादव को राज्य की राजनीति में स्थापित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। उनके भाई रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव किस तरह से पार्टी के आंतरिक मामलों में दखल देते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सपा ने रेवती रमण सिंह के बेटे उज्जवल रमन और नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल को भी टिकट दिया है। इसके अलावा सपा ने कौशांबी के सांसद शैलेंद्र कुमार के भाई को भी पार्टी टिकट से नवाजा है। कांग्रेस का तो खैर परिवारवाद को बढ़ावा देने का पुराना रिकॉर्ड रहा ही है। कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद को उम्मीदवार बनाने के अलावा और भी कई नेताओं के परिजनोंं को पार्टी टिकट से नवाजा है। इनमें बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा, रीता बहुगुणा जोशी के भाई शेखर बहुगुणा और जगदंबिका पाल के बेटे अभिषेक प्रमुख हैं। ये वही जगदंबिका पाल हैं जिन्होंने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद कहा था कि वे अपने बेटे को कभी राजनीति में शामिल नहीं होने देंगे। पर आज जगदंबिका पाल अपने बेटे को न सिर्फ टिकट दिलाने में सफल हुए बल्कि वे अपने बेटे के लिए प्रचार भी कर रहे हैं।
भाजपा भी इस मामले में पीछे नहीं है। लालजी टंडन के बेटे को टिकट दिया जाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भाजपा ने अपने नेता रामजी सिंह के बेटे अरिजित सिंह को भी टिकट दिया है। भाजपा सांसद रमाकांत यादव की पत्नी रंजना यादव और उनके बेटे अरुण यादव को भी पार्टी ने टिकट दिया है। बहुजन समाज पार्टी भी इस मामले में पीछे नहीं है। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कर्ष और उनकी बेटी संघमित्रा को बसपा ने टिकट दिया है। बसपा सांसद जुगल किशोर भी अपने बेटे को पार्टी से टिकट दिलाने में सफल हुए हैं। बसपा के अनंत मिश्रा अपनी पत्नी शिखा मिश्रा को टिकट दिलाने में कामयाब रहे हैं। बसपा की यह सूची लंबी है लेकिन चारों पार्टियों में टिकट बंटवारे के मोर्चे पर जिस तरह से परिवारवाद दिखा है उससे यह लगता है कि ये चारों पार्टियां राज्य की राजनीति में यथास्थितिवाद बनाए रखना चाहती हैं।

बाहुबल
बाहुबलियों या यों कहें कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को टिकट देने के मामले में कोई भी दल पीछे नहीं है। हर दल ने इन्हें इस उम्मीद के साथ गले लगाया है कि वे अपनी सीट जीत लेंगे और चुनाव के बाद पार्टी की स्थिति मजबूत करने का काम करेंगे। बसपा और सपा का तो खैर बाहुबलियों के सहयोग से सियासी कॉकटेल बनाने का पुराना अनुभव रहा है। पर अलग तरह की राजनीति का दावा करने वाली भाजपा और कांग्रेस ने भी आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को टिकट देने से परहेज नहीं किया। कांग्रेस का टिकट पाने वाले शैलेश कुमार सिंह, कलावती बिंद, अजय राय, भगवान सिंह शाक्य, उत्पल कुमार राय और शिशुपाल सिंह पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। इसके बावजूद सियासत में नया रक्तसंचार करने का दावा करने के मामलेे में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पीछे नहीं हैं। बादशाह सिंह जैसे लोगों को टिकट देकर भाजपा ने भी यह साबित कर दिया है उसके लिए 'पार्टी विद अ डिफरेंसÓ की बात सिर्फ सैद्धांतिक है।

जमीन अधिग्रहण
मायावती सरकार द्वारा उद्योगों के नाम पर किसानों से ली जा रही जमीन के मसले को उस वक्त अहमियत मिलनी शुरू हुई जब राहुल गांधी ने इस मसले को उठाया। उन्होंने बाकायदा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पदयात्रा की और लोगों को यह भरोसा दिलाया कि उनकी जमीन को छीने जाने से वे बचाएंगे। उन्होंने बाकायदा अलीगढ़ में किसान महापंचायत आयोजित करके किसानों को यह कहा कि केंद्र की उनकी सरकार एक ऐसा जमीन अधिग्रहण कानून लाएगी जिससे किसानों का हक सुनिश्चित हो सके। यहां यह बताना आवश्यक है कि दिल्ली से आगरा के बीच बने यमुना एक्सप्रेस-वे के किनारे की जमीन का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण हुआ और इसका इस्तेमाल एक्सप्रेस-वे बनाने वाली कंपनी जेपी और अन्य दूसरी कंपनियां रिहायशी परियोजनाएं विकसित करने के लिए कर रही हैं। मतलब साफ है कि पूरा खेल रियल एस्टेट का बाजार बढ़ाने के लिए चला। वह भी किसानों के हित के नाम पर। अपनी जमीन जाती देख पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान जिस तरह से आंदोलित हुए थे उसे देखते हुए यह राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों ने यह अनुमान लगाया था कि अगर वे इस मुद्दे पर किसानों के साथ दिखे तो इस इलाके के किसान मतदान के दौरान कांग्रेस के साथ दिख सकते हैं। इसके बाद राहुल गांधी ने इस मुद्दे के जरिए पार्टी को लाभ पहुंचाने के मकसद से यात्राओं का दौर शुरू किया। हालांकि, जिस तरह की जातिगत राजनीति उत्तर प्रदेश के रग-रग में समा गई है उसमें राहुल की सभाओं में भीड़ दिखना और उस भीड़ के वोटों में बदलने के बीच काफी फर्क है। शायद राहुल इस बात को समझ गए। यही वजह है कि उन्होंने अजित सिंह को अपने साथ लाकर नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की है।
राहुल को इस नतीजे पर पहुंचाने में जमीन अधिग्रहण को लेकर दिल्ली में हुई राजनीति भी जिम्मेदार रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों से राहुल ने यह वादा किया था कि उनकी केंद्र सरकार ऐसी जमीन अधिग्रहण नीति लाएगी जिसमें किसानों के साथ न्याय हो। संप्रग सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून का एक मसौदा संसद में पेश भी किया लेकिन यह जिस स्थायी संसदीय समिति में गया उसकी अध्यक्ष भाजपा की सुमित्रा महाजन हैं। इसमें बसपा के भी सांसद हैं। इन दोनों दलों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि किसी भी तरह यह कानून उत्तर प्रदेश के चुनावों के पहले न आए। बसपा को यह भय सता रहा था कि ऐसा होते ही मायावती ने कुछ ही महीने पहले जो जमीन अधिग्रहण कानून पारित किया है, वह अपनी चमक खो देगा और बसपा को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो आज किसान और जमीन हर प्रमुख राजनीतिक दल के एजेंडे से गायब है लेकिन वह रस्मी तौर पर घोषणा पत्रों में शामिल है। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि राज्य की राजनीति के प्रमुख चार खिलाड़ियों को किसानों की कितनी चिंता है।

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