• Home
  • Articles
  • Interviews
  • Magazine
    • Subscription
    • Current issue
    • Previous issues
  • Current Affairs
  • Advertise with us
  • Contact Us
    • Contact Address

English Issue

Download Current Issue: February 2013

Previous Issue January 2013

http://dialogueindia.in/magazine/images/2012/A-Warrior-or-Hock.jpg

Previous Issue November 2012

Current Issue

https://dl.dropboxusercontent.com/s/cystlj9jqnq1jbl/Bandhan-Todo-Bhajpa.jpg

Current Issue May 2013

Previous Issue April 2013

Previous Issue March 2013

Primary links

  • Home
  • Articles
  • Interviews
  • Magazine
    • Subscription
    • Current issue
    • Previous issues
  • Current Affairs
  • Advertise with us
  • Contact Us
    • Contact Address

Links





WWW.UPSCPORTAL.COM - India's Largest Community for IAS Aspirants
 




Anchal Niyas

ECS Consultancy

Secondary links

  • Why Dialogue India?
Home » Blogs » admin's blog

Posted Sun, 09/02/2012 - 18:48 by admin

New Page 1

- रत्ना श्रीवास्तव

एक अरब २० करोड़ की जनसंख्या वाले हमारे देश ने हाल ही खत्म हुए लंदन ओलंपिक में दो रजत पदकों समेत छह पदक जीते हैं। ये ओलंपिक में हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। लेकिन क्या इतनी बड़ी जनसंख्या वाले वाले देश के लिए ये वाकई बड़ी कामयाबी है। अगर मोटे तौर पर देखें तो भारत में हर बीस करोड़ की आबादी पर हमने महज एक पदक हासिल किया। ये सोचने वाली बात हो सकती है कि आबादी और संसाधनों में हमसे बेहद कम और गरीब कहे जाने वाले तमाम छोटे छोटे देश किस तरह ओलंपिक में बाजी मार जाते हैं। इनमें से ज्यादातर के पास तो सही मायनों में खेल ढांचा भी नहीं है। हो सकता है कि उन्हें बहुत आला दर्जे की कोचिंग और उपकरण भी नहीं हासिल हों।
ग्रेनाडा की जनसंख्या शायद एक लाख के आसपास होगी। जमैका की आबादी दस लाख से भी कम है। ग्रेनाडा ने लंदन ओलंपिक में अपना पहला गोल्ड मेडल जीता तो जमैका ने चार गोल्ड, चार सिल्वर और चार कांस्य पदक जीते। ये हैरानी की बात है कि ये देश ऐसा कैसे कर ले जाते हैं और हम वैसा क्यों नहीं कर पाते। इसकी वजह शायद एक नहीं, कई हैं- कुछ कारण शायद हमारे जीन्स में हैं, कुछ संस्कृति में, कुछ गरीबी में, कुछ प्रशासनिक कुशलता में, कुछ शिक्षा में।
खेलों की सामाजिक संरचना को देखें तो पता लगता है कि भूगोल या जीन्स का कोई न कोई रिश्ता इनसे है। मसलन कैरीबियन सागर के छोटे से देश जमैका ओलिम्पिक खेलों की स्प्रिंट यानी छोटी दूरी की रेसों में बोलबाला है। उसैन बोल्ट, ब्लैक, असाफा पॉवेल इसके उदाहरण हैं। मैराथन और लम्बी दूरी की रेसों में अफ्रीका के केन्या और इथोपिया जैसे देशों की धाक है। कुश्ती और बॉक्सिंग में पूर्वी यूरोप और एशिया की सीमा के कॉकेशियन लोग सफल हैं। मोटे तौर पर गोरे यूरोपियन, अफ्रीकी मूल के अश्वेत और चीनी मूल के खिलाड़ी खेल के मैदान पर राज करते हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका इन तीनों तरह के खिलाडिय़ों को प्रश्रय देता है और दुनिया का नम्बर एक देश बन जाता है। बीजिंग ओलिम्पिक में चीन ने गोल्ड मेडलों के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया था। हालांकि वह स्थिति इस बार लंदन में बदल गई। यहां अमेरिका ने ४६ गोल्ड २९ सिल्वर और २९ ब्रोंज के साथ कुल १०४ पदक जीते और नंबर वन रहा। वहीं चीन ३८ गोल्ड, २७ सिल्वर और २३ कांस्य पदकों के साथ ८८ पदक ही जीत पाया। हालांकि इस स्थिति ने चीन के खेल हलकों में उथलपुथल मचा दी कि एेसा क्यों हो गया। निश्चय ही इसकी गाज वहां खेल के कुछ आला अधिकारियों पर गिरेगी।
वैसे देखा जाये तो दुनिया के सबसे फिसड्डी देश दक्षिण एशिया के हैं, जहाँ सिर्फ भारत को मेडल मिले हैं। पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और मालदीव को कोई मेडल नहीं मिला। ओलंपिक में अब तक हमने २४ पदक जीते हैं और इनमें से ज्यादातर हॉकी में। लेकिन १९६४ ओलंपिक के बाद हमारे खाली लौटने की नौबत आ गई। काफी हल्के स्तर के १९८० के मास्को ओलंपिक में हमने आखिरी बार हॉकी का गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद से ये खेल लगातार रसातल में ही जा रहा है। पिछली बार हम अगर ओलंपिक के लिए क्वालिफाई ही नहीं कर पाये थे तो इस बार क्वालिफाई होने के बावजूद कोई मैच जीत नहीं पाये। हां, संतोष की बात ये है कि अब हॉकी का दाग दूसरे खेल धोने लगे हैं। १९९६ के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर पेस ने टेनिस में कांस्य पदक जीतकर १९५२ के बाद पहली बार व्यक्तिगत खेलों में पदक जीता। इसके बाद हर ओलंपिक में हमने व्यक्तिगत खेलों में कोई न कोई पदक जरूर जीता। २००० के सिडनी खेलों में कर्णम मल्लेश्वरी भारोत्तोलन मंें कांस्य पदक लेकर लौटीं तो २००४ एथेंस ओलंपिक राज्यवद्र्धन सिंह राठौर सिल्वर पदक हासिल करने में कामयाब रहे। बीजिंग ओलंपिक हमारे लिए मोड की तरह आये जहां से हम एक स्वर्ण और दो कांस्य जीतने में सफल रहे। काफी हद तक इस सफलता ने देश के मूड को नहीं बदला बल्कि सरकार से लेकर प्राइवेट संस्थाओं तक को खेल में पैसा लगाने के लिए तैयार किया। सही मायनों में खेल संस्कृति और तैयारियों के लिए धन बहाने की शुुरुआत वर्ष २०१० के कामनवेल्थ खेलों के साथ हुई। उस समय हमने शानदार प्रदर्शन किया, जो फिर ग्वांगझू एशियाई खेलों और अब लंदन ओलंपिक तक जारी रहा। यकीनन इसके लिए हमारे खिलाडिय़ों ने काफी तैयारी की। उन्हें विेदेशों में रखकर आला ट्रेनिंंग और कोचिंग की व्यवस्था की गई। अधिकतम संभव विदेशी एक्सपोजर और बड़ी प्रतियोगिताओं में शिरकत करने के लिए भेजा गया। पहली बार सरकार ने तैयारियों के लिए धन की कोई कमी नहीं होने दी। उस हिसाब से देखें तो हम छह नहीं बल्कि कुछ और पदक लाने की स्थिति में थे। कुछ मामूली चूकों के चलते हम कम से कम दो तीन ओर पदकों से वंचित रहे।
अगर हम वाकई खेलों के लिए वाकई चिंतित हैं तो न केवल स्कूलों में खेलों को अनिवार्य विषय घोषित करना होगा बल्कि ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा कि गांव-शहर की अ'छी खेल प्रतिभाएं सामने आ सकें और उनको तराशा जा सका। मौजूदा दौर में हम खेल में उन्हीं खिलाडिय़ों को आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने अपनी खुद की कोशिशों और आर्थिक खर्च से अपनी एक जगह बना ली हो। दरअसल हमारे देश में हजारों प्रतिभाएं असमय खत्म ही इसीलिए हो जाती हैं क्योंकि वो न तो आर्थिक तौर पर मजबूत होती हैं और न उन्हें एेसी कोई मदद मिल पाती है कि वो छोटी छोटी जगहों से निकलकर तमाम स्तरों को लांघकर राष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान बना पाएं। वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले ही सैकड़ों खिलाड़ी आमतौर पर सही ट्रेनिंग से लेकर आर्थिक जरूरतों से संबंधित मदद से वंचित रह जाते हैं। दरअसल एक बेहतरीन खिलाड़ी तैयार करने के लिए उसे इन तमाम मदद की जरूरतें तब होती हैं जब वह १२ वर्ष के आसपास होता है। यही वह उम्र होती है जब बेहतरीन कोचिंग, ट्रेनिंग, खुराक से उसे तराशा जा सकता है। चीन में ये सब सरकारी संरक्षण में होता है तो जमैका में खेल एक अनिवार्य संस्कृति है। वहां नर्सरी और प्राइमरी स्तर के स्कूलों से छोटे बच्चों की दौड़ प्रतियोगिताओं पर जोर होता है।
खैर अब चलिए भारत के उन खिलाडिय़ों की बात करते हैं जो इस बात जीतकर लौटे। सुशील कुमार ने साबित कर दिया कि वह भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ ओलंपियन हैं। उनका रजत पदक, स्वर्ण के बिल्कुल करीब माना जाना चाहिए। पेट की समस्या अगर आड़े नहीं आती तो वह लंदन में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने की स्थिति में थे। निशानेबाजी में विजय कुमार ठान कर आये थे कि उन्हें कुछ करके लौटना है। हालांकि २५ मीटर एयर पिस्टल फायर में उन्होंने जितना बेहतरीन प्रदर्शन फाइनल में शुरुआती राउंड में किया था उसी स्थायित्व को वह बरकरार रखते तो शायद वह भी गोल्ड के आसपास दिखते। ओलंपिक में केवल विजय ही नहीं बल्कि कई हमारे खिलाड़ी केवल इसलिए चूके क्योंकि वह छोटी छोटी बातों पर चूके, विदेशी टीमें इसका बहुत ख्याल रखती हैं। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में इस पहलू पर खासतौर पर ध्यान दिया जाता है कि किस तरह इवेंट से पहले खाने से लेकर सोने तक बारीक बातों का ध्यान रखें और इवेंट के दौरान एकाग्रता को बेहतर तरीके से बनाकर रखा जा सके।
साइना नेहवाल सेमीफाइनल तक बहुत अच्छा खेलीं लेकिन सेमीफाइनल में उन्होंने करीब करीब हथियार ही डाल दिये थे। उनकी किस्मत अच्छी थी कि प्रतिद्वंद्वी चीनी खिलाड़ी चोटिल हो गई और साइना को कांस्य मिल गया। गगन नारंग (१0 मीटर एयर राइफल), योगेश्वर दत्त (६० किलो कुश्ती) में कांस्य पदक जीतने वालों में रहे। लेकिन लंदन ओलंपिक में भाग लेने वाले भारतीय स्टार खिलाडिय़ों की बात करें तो सिर्फ एमसी मैरीकॉम ही अपने करियर का उत्कृष्ट समापन करते हुए दिखीं।
इनके अलावा हमारे कुछ बाक्सर बहुत करीब आकर पदकों से चूके तो कुछ को गलत फैसले ले डूबे। बॉक्सर देवेंद्रो और दुर्भाग्यशाली रहे विकास कृष्णन दोनों अभी भी किशोर हैं और उनका भविष्य बेहद उज्वल है। हालांकि विजेंदर के पास भी अभी ज्यादा भार वर्ग में एक और मौका है। इसे खुशकिस्मती कह सकते हैं कि हमारे इन सभी पदक विजेताओं के पास रियो में भी पदक जीतने का एक मौका जरूर रहेगा, क्योंकि उम्र के जिस दौर में वो हैं, वहां वह अपने प्रदर्शन को बेहतर कर सकते हैं। सुशील कुमार अभी सिर्फ २९ साल के हैं। कांस्य पदक जीतने वाले योगेश्वर दत्त भी २९ साल के ही हैं। क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने वाले अमित कुमार महज १९ साल के ही हैं। वे बहुत ही दुर्भाग्यशाली रहे जब कुश्ती के टाई ब्रेक में उन्हें मैच गँवाना पड़ा. निशानेबाजों की मौजूदा खेप भी लंबे समय तक खेल जारी रख सकती है। इसलिए आने वाले दिनों में गगन नारंग, विजय कुमार, मानवजीत संधू, रोंजन सोढ़ी के पास अभी समय है। जॉयदीप कर्माकर चौथे स्थान पर रहे जबकि २१ वर्षीया हिना सिद्धू के पास १० मी. एअर पिस्टल में बढिय़ा भविष्य है।
ये भी तय है कि जो समाज जितना स्वस्थ और खुशहाल होगा, वो उसके खेलों में नजर आयेगा। ये बात आप भारत के संदर्भ में भी देख सकते हैं, जिस तरह हम एक सुविधासंपन्न देश में बदल रहे हैं, खेलों पर भी उसका असर दिख रहा है। हम खेलों पर ज्यादा पैसा खर्च पा रहे है, सिस्टम को बेहतर कर पा रहे हैं, खेलों के जरूरी महंगे उपकरण और कोच हासिल कर पा रहे हैं। हालांकि ये बात भी सही है कि देश की असली खेल प्रतिभाएं गांवों में छिपी हैं, जहां पदकों से ज्यादा जरूरत शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना की है। वैसे ये बात बहस का विषय हो सकती है कि अगर ऐसा है तो गरीब अफ्रीकी देशों के एथलीट कैसे ओलंपिक में स्टार बनकर उभरते हैं। बहुत से और देश हैं, जहां की स्थिति हमसे भी बहुत गई गुजरी है लेकिन ओलंपिक खेलों में वो छा जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद एक बेहतर खेल सिस्टम का भी अपना महत्व है। १९९६ के अटलांटा ओलंपिक में ब्रिटेन महज एक स्वर्ण, ०८ रजत और ०६ कांस्य पदकों के साथ 36वें स्थान पर था। 16 बरसों में उसने इसे २९ स्वर्ण पदक,१६ रजत और १९ कांस्य पदकों में बदल डाला। लंदन ओलंपिक में खिलाडिय़ों की तैयारियों पर ग्रेट ब्रिटेन ने हमसे चार गुना ज्यादा पैसा खर्च किया।
हम भी ऐसा कर सकते हैं। अगर लंदन ओलंपिक ओलंपिक हमारे लिए इसकी शुरुआत हैं तो हमारी असली परख चार साल बाद रियो में होगी। वैसे ये अच्छा लग रहा है कि भारत के खेल माहौल में धीरे धीरे ही सही लेकिन आत्मविश्वास तो भरने लगा है।
जिसकी जरूरत है
ट्रेनिंग सिस्टम :
लंदन ओलम्पिक के लिए भारत विदेशी कोचों की शरण में जाने या खिलाडिय़ों को विदेश भेजने के लिए मजबूर हुआ। विदेशी कोच भारतीय खिलाडिय़ों की दशा व परिस्थितियों से वाकिफ नहीं होते। साथ ही कुछ दिन या कुछ माह विदेश में ट्रेनिंग लेने से खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक विजेता नहीं बन सकता। कम से कम भारत को इस ओलम्पिक से यह सबक मिला है। विदेश में ट्रेनिंग लेने वाले ज्यादातर खिलाड़ी सुपर फ्लाप साबित हुए हैं। एेसे में भारत को इस ओलम्पिक से सबक लेते हुए अपने अल्ट्रा मॉड्र्न व साइंटिफिक ट्रेनिंग सेंटर स्थापित करने होंगे। यही नहीं खुद का एक मजबूत ट्रेनिंग सिस्टम डेवलप करना होगा। भारतीय कोचों पर भरोसा जताना होगा। उन्हें विदेशी कोचों की तरह फ्री हैंड छोडऩा पड़ेगा।

कोच व उपकरण :
लंदन ओलम्पिक में हिस्सा लेने वाले हर खिलाड़ी के साथ कोच की मौजूदगी बनी रही। उनके साथ वही कोच थे जो खिलाडिय़ों के साथ लम्बे समय से जुड़े हैं। पर, भारत के साथ एेसा नहीं था। कई भारतीय खिलाड़ी तो एेसे थे जिनके कोच गए ही नहीं थे। इससे खिलाडिय़ों के साथ लंदन में कोच व मेंटर जैसी कोई चीज नहीं थी। इन खेलों में यह साबित हो गया है कि खिलाडिय़ों के साथ कोच की मौजूदगी कितनी जरूरी होती है। यही नहीं खेलों की दुनिया में अब एक से एक खेल उपकरण आ गए हैं। एेसे उपकरण जिनसे खिलाडिय़ों के प्रदर्शन में सुधार
आता है।

योजना :
चीन, अमेरिका, रूस, जापान जैसे देशों के कई खिलाड़ी ओलम्पिक के पहले बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेते। वह अपना दमखम ओलम्पिक के लिए बचा के रखते हैं। विदेशी खिलाड़ी एक कारगर योजना के तहत ओलम्पिक जैसे खेलों की तैयारी करते हैं। यही कारण है वे ओलम्पिक में पूरे दमखम के साथ उतरते हैं। स्वर्ण जीतते हैं, वल्र्ड या ओलम्पिक रिकार्ड तोड़ते हैं। तुर्की व त्रिनिदाद टोबैगो जैसे देश तक एेसी योजना के तहत तैयारी करते हैं। शायद भारत एकमात्र एेसा देश है जहां के खिलाड़ी अपना पूरा दमखम ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने में लगा देते हैं। जब ओलम्पिक में पहुंचते हैं तो उनमें विश्व स्तरीय प्रदर्शन करने की ताकत कम हो जाती है। यही कारण है कि कृष्णा पूनिया, नाविक स्वर्ण सिंह, जयदीप करमाकर, देवेंद्रो सिंह, विजेंदर जैसे खिलाड़ी पदकों की होड़ में होते हुए भी चूक जाते हैं।

सोच बड़ी हो :
ओलम्पिक जैसे खेलों में विदेशी खिलाड़ी एक बड़ी सोच व बड़े लक्ष्य को लेकर तैयारी करते हैं। चीन, अमेरिका, जमैका, कीनिया, रूस जैसे देश हर इवेंट के स्वर्ण पदक का निशाने पर रखकर अपने खिलाडिय़ों को तैयार करते हैं। वे विश्व स्तरीय मानक निर्धारित करते हैं। उसी के आधार पर खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग दी जाती है। भारत में अभी जो ट्रेनिंग हो रही है उसमें ओलम्पिक क्वालीफिकेशन मार्क को ध्यान में रखा जाता है। जब इतनी ही सोच व लक्ष्य होगा तो पदक तक कैसे पहुंचेंगे भारतीय खिलाड़ी। कुछ एेसा ही भारत को करना पड़ेगा। एक दीर्घकालीन योजना के तहत पदकों को ध्यान में रखकर यहां के खिलाडिय़ों को तैयार करना होगा। ओलम्पिक के लिए खिलाडिय़ों का एक विशेष पूल तैयार कर बड़े लक्ष्य को लेकर तैयारी करवाने की जरूरत है।

आत्मविश्वास :
सौ या दो सौ मीटर की दौड़ के पहले उसेन बोल्ट या योहान ब्लैक को जिसने भी देखा होगा सभी को उनमें आत्मविश्वास नजर आया होगा। वहीं ट्रैक पर जब भारतीय एथलीट टिंटू लुका या सुधा सिंह खड़ी थीं तो बेहद सहमी थीं। यही नहीं क्वार्टर फाइनल बाउट जीतने के बाद मैरी कोम में जो आत्मविश्वास होना चाहिए था वह सेमीफाइनल में नजर नहीं आया। साइना नेहवाल भी सेमीफाइनल व कांस्य के लिए हुए मुकाबले में सुस्त दिखाई दे रही थीं। जबकि छोटे से छोटे देश के खिलाड़ी जब ओलम्पिक में पहुंचे तो उनका हौसला व आत्मविश्वास देखते ही बन रहा था। भले ही उनके हिस्से में पदक न आएं लेकिन उनकी शारीरिक भाषा गजब की होती है। भारतीय खिलाडिय़ों में आत्मविश्वास और हौसला भरने के लिए काम करना होगा। उनकी शारीरिक भाषा विजेताओं की तरह बनाने के प्रयास
करने होंगे।
कुछ बातें ये भी...

पिछले कुछ साल से हमारी हॉकी संस्थाएं आपस में लड़ रहीं थीं। किसी ने इसकी चिंता नहीं की। टेनिस की टीम तय करते वक्त तमाशा होता रहा, किसी को परेशानी नहीं थी। एक अरसे से खेल संघों के पदाधिकारियों के कार्यकाल को लेकर विवाद चल रहा है, उसे ठीक करने की किसी को फिक्र नहीं।
महज दो साल पहले कामनवेल्थ गेम्स में हमने ग्रेट ब्रिटेन से बेहतर प्रदर्शन करके उसे तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। इसे देखा जाना चाहिए कि वही ब्रिटेन किस तरह लंदने ओलंपिक में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा।
अगर गंभीरता से कोशिश की जाये तो भारत निशानेबाजी, कुश्ती और बॉक्सिंग के क्षेत्र में दुनिया की एक बड़ी ताकत बनकर उभर सकता है।
बैडमिंटन में भी भारत के कम से कम दस खिलाड़ी ऐसे हैं जो कि सौ सर्वश्रेष्ठ खिलाडिय़ों में गिने जाते हैं और दुनिया में छा जाने की उनमें क्षमता है। केवल मलेशिया ही वो देश है जिसके दस खिलाड़ी टॉप सौ में शामिल हैं, जबकि डेनमार्क के नौ, इंडोनेशिया के सात और चीन के सिर्फ पांच खिलाड़ी ही टॉप सौ में शामिल हैं. चीन के ये सभी पांचों खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ बीस खिलाडिय़ों में शामिल हैं।
भारत अगले दस सालों में बन सकता है बड़ी ताकत
ट्रेनर हीथ मैथ्यूज़ कि गिनती दुनिया के मशहूर शारीरिक प्रशिक्षकों में होती है। उन्होंने भारत में सानिया मिर्ज़ा और विजेंदर सिंह की फिटनेस पर काम किया है। मैथ्यूज़ का कहना है कि साल २०२४ तक भारत ओलंपिक के पहले पांच देशों में शुमार हो सकता है। करना ये है कि इन मेडलिस्ट के अलावा जो खिलाड़ी क्वार्टर फाइनल में पहुंचे, उन पर खास ध्यान दिया जाये। एक खास सिस्टम बनाया जाए जिसमें इन खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग मिले. सिर्फ पांच और दस प्रतिशत बेहतरी करेंगे तो नतीजा आएगा। मैथ्यूज़ कहते हैं कि जिन बातों पर सुधार की ज़रूरत है वो हैं-बुनियादी ढांचा, कोचिंग, आधुनिक उपकरण, स्पोट्र्स मेडिसिन और विदेशों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना।
 

  • admin's blog
  • Login to post comments
 

© 2010 Dialogue India Magazine.