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Posted Sun, 09/02/2012 - 19:13 by admin

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मुकेश श्रीवास्तव

आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश एक बार फिर से केन्द्रबिन्दु बनने जा रहा है। खास बात यह है कि आगामी चुनाव में प्रदेश की कमान पूरी तरह से नारी शक्ति के हाथों जाती दिख रही है। कांग्रेस चुपके-चुपके प्रियंका बढ़़ेरा को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। वहीं बसपा से मायावती व भाजपा से उमा भारती सामने होंगी। सपा भी अब पीछे नही दिखती। सपा सांसद डिम्पल यादव के सहारे राज्य में अच्छा प्रदर्शन करने में सबको पछाडऩे की ललक में है। सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने जिन मुद्दो को लेकर चुनाव में परचम लहराया है, उसको देखते हुए कन्नौज की जनता ने मुख्यमंत्री की पत्नी को सांसद बनाकर आंखों में बिठा लिया। इन सब को देखते हुए सपा ने लोकसभा चुनाव में डिम्पल कार्ड खेलने का मन बना लिया है। अब आगामी लोकसभा चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना समाजवादी पार्टी डिम्पल कार्ड के रूप में तुरूप का इक्का चलने के फिराक में हैं क्योकि सपा राजनीति में बढ रहे महिलाओं के ग्राफ व वोट बैंक दोनों से भलीभंति वाकिफ है। पार्टी यह बखूबी जानती है कि 2014 में सूबे में महिला वोट बैंक अहम भूमिका अदा करेगा।
सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को सपा नेत्री बनाने का ताना-बाना विधानसभा चुनावों के मध्य ही बुना जा चुका था। इसकी झलक प्रदेश चुनावों के दौरान भी देखने को मिली थी जब डिम्पल अखिलेश यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ी नजर आई। इससे इतना साफ हो गया था कि डिम्पल यादव ने अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरूआत कर दी हैं। महज एलान भर बाकी है। यही कारण है कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने डिम्पल को कन्नौज उपचुनाव लड़ाया, जहां डिम्पल के साइकिल की रफ्तार के आगे हाथी से लेकर कमल व पंजा तक नतमस्तक हो गए। यह जीत भले केवल एक संासद की मानी जा रही हो लेकिन जो लोग उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों व मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक शैली से वाकिफ होंगे, उन्हें यह जरूर पता होगा कि यह सपा की दूरगामी नीति का एक हिस्सा हैं। वास्तव में पार्टी लंबे समय से एक अदद महिला नेतृत्व के अभाव से जूझ रही हैं। गाहे-बगाहे विपक्षी भी सपा पर महिलाओं को तवज्जो न देने का आरोप लगाते रहते हैं। तो एक तरफ जहां सपा विपक्षी के आरोपों का जवाब डिम्पल यादव के जरिए देने का प्रयास कर रही है, वही दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव अपनी पुत्रवधू के जरिए लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं। वैसे भी पार्टी का एक बड़ा तबका डिम्पल यादव को सपा नेत्री बनाने को बेचैन नजर आ रहा हैं, क्योंकि अब तक सपा राजनीति में महिलाओं की उपेक्षा करने की तोहमत ढो रही है। अक्सर पार्टी नेता इस तोहमत के साथ और आगे नही बढऩा चाहते हैं। उनका मानना है कि डिम्पल यादव के सहारे पार्टी एक सशक्त महिला नेता की कमी दूर कर सकती हैं।
समाजवादी पार्टी के इस डिम्पल कार्ड की एक और बानगी तब देखने को मिली जब दिल्ली में 24 जुलाई को अखिलेश यादव के साथ फिक्की महिला संगठन के कार्यक्रम में डिम्पल ने शिरकत की। इस दौरान कई हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू न्यूज चैनलों ने अपना पूरा फोकस इस पोलिटिकल कपल पर ही केंद्रित रखा। इस मौके पर डिम्पल यादव महिला उद्यमियों के प्रश्नों का जवाब बड़़ी ही शालीनता व समझदारी से देती नजर आईं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डिम्पल ने बताया कि उनकी राजनीति में आने की इच्छा बिलकुल नहीं थी लेकिन परिवार और समाजवादी पार्टी की इच्छा व समाजसेवा के प्रति रूझान के चलते ही राजनीति में प्रवेश किया। वे हर मुद्दे पर खुलकर बोलीं चाहे वह राजनीतिक हो या फिर पारिवारिक। श्रीमती यादव ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब महिलाओं को राजनीति पर चर्चा व परिचर्चा को अपनी दिनचर्या में लाना होगा, क्योंकि जब तक राजनीति में महिलाएं खुलकर भाग नहीं लेंगी, तब तक महिलाओं के साथ-साथ देश व प्रदेश का विकास संभव नही हैं। सपा संासद ने यह भी साफ कर दिया कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नही हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में संपन्न हुए यूपी विधानसभा चुनावों में महिलाओं को सबसे ज्यादा टिकट सपा ने ही दिए थे। वे महिलाओं को प्रोत्साहित भी करना नहीं भूलीं। उन्होंने कहा कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं। फिक्की के इसी कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने यह कह डिम्पल कार्ड को आगे बढाने के संकेत दिए कि सपा महिलाओं के अधिकारों व हितों के लिए व्यापक स्तर पर लडा़ई लडेगी। वहीं सपा के थिंक-टैंक माने जाने वाले एक सीनियर नेता ने कहा कि डिम्पल यादव की राजनीति में सक्रिय भूमिका से लोकसभा चुनाव में महिला वोटरों का रूझान सपा की तरफ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि डिम्पल की सक्रियता से पार्टी की महिला विंग की दशा व दिशा दोनों ही बदलेगी, जो पार्टी हित के लिए अति आवश्यक हैं।
दरअसल, समाजवादी पार्टी 2014 में केंद्र की सत्ता में किंगमेकर की भूमिका अदा करना चाहती है। और चाहे भी क्यों न! मुलायम सिंह यादव के पास उत्तर प्रदेश का मजबूत गढ़ है, जिसे फतह करने के बाद उनका मनोबल भी सातवें आसमान पर है। सपा मुखिया लोकसभा चुनाव की तैयारी में कोई कोताही नही बरतना चाहते हैं। वे यह भी जानते हैं कि अगर उनकी पार्टी यूपी में अच्छा प्रदर्शन करती हैं तो केंद्र में मजबूती से अपना पक्ष रख सकेगी और उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ सकती हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी को अपने मनचाहे प्रदर्शन के एि राजनीति के सभी समीकरणों को अपने अनुकूल करना होगा। फिर चाहे वह जातीय समीकरण हो, यूथ आकर्षण हो या महिला वोट बैंक। यही नहीं, उत्तर प्रदेश इकलौता ऐसा राज्य है जहां राजनीतिक मिजाज लगातार बदलते रहते हैं। पिछले आम चुनाव के बाद से यहां का महिला वोट बैंक चौराहे पर हैं, जो एकजुट नही हो पा रहा हैं। यहां की महिलाओं ने मायावती का कार्यकाल भी देखा, जो सिर्फ लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के ही भेंट चढ गया। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार ने भी ऐसे ही हालात निर्मित किए हैं। कुशासन और कुप्रबंधन के मामले में यूपीए सरकार मायावती से चार कोस आगे ही निकली और साथ-साथ महंगाई को भी अपनी ही रफ्तार से बढाया।
ऐसे में आज चौराहे पर खडे यूपी के महिला वोट बैंक को एक राजनीतिक विकल्प की तलाश हैं जिसे सपा डिम्पल यादव के रूप् में पूरा करना चाहती है। जहां भाजपा यह बताते नहीं थक रही है कि महिलाओं की हितैषी वही है, वहीं कांग्रेस अपनी महिला नेताओं के नाम गिना कर बता रही है कि असल में महिलाओं के लिए काम हमारी ही पार्टी कर रही है तो मायावती भी महिला वोट बैंक को रिझाने में लगी हैं। ऐसे में सपा के पास डिम्पल यादव से बेहतर महिला नेत्री का चेहरा नहीं हो सकता। वैसे भी तमाम पारिवारिक बैकग्राउंड उन्हें राजनीति में अपरिहार्य बना देता है। कुल मिलाकर डिम्पल के जरिए सपा लोकसभा चुनाव का रूख अपनी तरफ मोडऩा चाहती हैं।
 

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