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Posted Wed, 02/01/2012 - 21:57 by admin

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चुनाव सुधारों के लिए काम कर रहे संगठन नेशनल नेटवर्क फॉर इंडिया के ट्रस्टी प्रमोद चावला से हमारे विशेष संवाददाता शेखर की बातचीत के प्रमुख अंश:
विधानसभा चुनावों को साफ-सुथरा बनाने के लिए अब तक चुनाव आयोग ने जो कदम उठाए हैं, उनके बारे में आप क्या कहेंगे?
आयोग के अब तक के कदम नाटकबाजी से अधिक कुछ नहीं हैं। आयोग जो भी निर्णय ले रहा है वह सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के पक्ष में दिख रहे हंै। एक उदाहरण से यह पता चल जाएगा कि कड़ाई का दंभ भरने वालेचुनाव आयोग की स्थिति कैसी है। २००३ में यह कानून बना था कि सभी उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति का ब्यौरा आयोग को देना होगा। इसमें यह भी तय हुआ था कि सभी उम्मीदवारों को अपना पैन नंबर अनिवार्य तौर पर देना होगा। पर ऐसे उम्मीदवारों की बड़ी संख्या है जो इस नियम का पालन नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद आयोग इनके खिलाफ कुछ नहीं कर रहा है। इसके अलावा अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए आयोग कोई निर्णायक कदम नहीं उठा रहा है।
आयोग की कोशिशों में कमी कहां है?
कमी ही कमी है। आयोग ऐसे नियम क्यों नहीं बनाता जो अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोक सकेें। आयोग कोई ऐसा उपाय क्यों नहीं करता जिससे धनबल का प्रयोग चुनाव में न हो और सही उम्मीदवार ही मैदान में रह सकें। जो नियम बने हुए हैं, उन्हें भी आयोग कहां सही ढंग से लागू करवा पा रहा है। कितना बड़ा मजाक है कि आयोग स्वयं मान रहा है कि इन चुनावों में दस हजार करोड़ से भी अधिक का काला धन लगाया जाएगा किन्तु इसको रोकने के उपाय या शक्तियां उसके पास नहींहैं।

धनबल और अपराधियों की सक्रियता जिस तरह से चुनावों में बढ़ी है उससे राजनीति आपको किस ओर जाती दिख रही है?
यह एक कड़वा सच है लेकिन कहना जरूरी है कि इस तरह की राजनीति हमें नर्क की ओर ले जा रही है। हम एक ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं जहां कोई अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करना चाह रहा है। नहीं कर पाना और नहीं चाहने में बुनियादी अंतर है और जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं चाहना ज्यादा खतरनाक है। चुनाव के दौरान वोट बटोरने के लिए पैसे खुलेआम बांटे जा रहे हैं। चुनाव आयोग की आंखों में धूल झोंकने के लिए तो उम्मीदवारों ने टोकन के जरिए पैसा पहुंचाने का खेल भी उत्तर प्रदेश और पंजाब में शुरू कर दिया है। सही मायने में देखा जाए तो धनबल और बाहुबल देश की गैरबराबरी का गलत फायदा उठाकर राजनीतिक रोटी सेंकने का काम कर रहे हैंं।

ऐसे में राजनीति की धारा को सकारात्मक मोड़ देने के लिए क्या जरूरी लगता है?
सबसे पहला उपाय तो यह किया जाना चाहिए कि वैसे लोगों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाए जिन पर गंभीर आपराधिक मामले हों। ऐेसे लोगों को तब तक चुनाव नहीं लड़ने देना चाहिए जब तक ये पूरी तरह से आरोपों से मुक्त नहीं हो जाते। हमें यह समझना होगा कि राजनीति को अपराधियों से मुक्त कराना बेहद जरूरी है। इसके बिना सारे सुधार धरे के धरे रह जाएंगे। इसके अलावा धनबल के असर को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग को चुनाव सुधारों की गाड़ी को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए।

चुनाव सुधार की बात काफी समय से चल रही है लेकिन अब तक इस मामले में उल्लेखनीय प्रगति क्यों नहीं हुई है?
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जो लोग देश पर शासन कर रहे हैं वे खुद डरे हुए हैं और उनके मन में चोर बैठा हुआ है। उन्हें यह भय सता रहा है कि अगर उन्होंने चुनाव सुधार की गाड़ी को आगे बढ़ाया तो खुद उनके लिए कई तरह की मुश्किलें पैदा हो जाएंगी। अब तो चुनाव सुधार की दिशा में तब ही काम आगे बढ़ेगा जब जनता द्वारा दबाव डाला जाए। अन्ना हजारे के आंदोलन से कुछ दबाव बना था लेकिन वे अकेले थे इसलिए सरकार फिर लौटकर वहीं पहुंच गई जहां वह पहले थी। अगर अन्ना के साथ समाज के और भी ऐसे लोग एक साथ आकर सरकार पर इस बात का दबाव बढ़ाएंगे तो निश्चित तौर पर चुनाव सुधार की गाड़ी आगे बढ़ेगी।

आपका संगठन एनएनएफआई चुनावों को साफ-सुथरा बनाने के लिए क्या कर रहा है?
हम पिछले दस सालों से समाज में चुनाव को लेकर जागरुकता फैला रहे हैं। हम न सिर्फ मतदाताओं को मत डालने के लिए जागरुक कर रहे हैं बल्कि उन्हें यह भी कह रहे हैं कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को अपना प्रतिनिधि न बनाएं। उत्तर प्रदेश में कई युवा समूह हैं जो इस बारे में जागरुकता अभियान चला रहे हैं। इसके अलावा हम उत्तर प्रदेश में जागरुकता के प्रसार के लिए राज्य के तकरीबन ५,००० लघु एवं मंझोले उद्यमों के मजदूर संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और मजदूरों को यह कह रहे हैं कि साफ-सुथरे रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को ही वोट दें न कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार को। स्वाभाविक है कि हम यह काम दलगत भावना से अलग हटकर कर रहे हैं। इसके अलावा हम सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों और चुनाव आयोग से भी समय-समय पर जरूरी हस्तक्षेप की मांग करते रहते हैं। सिविल सोसाइटी और मीडिया के जरिए भी हम चुनाव को लेकर जागरुकता फैलाने का काम कर रहे हैं।
 

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