• Home
  • Articles
  • Interviews
  • Magazine
    • Subscription
    • Current issue
    • Previous issues
  • Current Affairs
  • Advertise with us
  • Contact Us
    • Contact Address

English Issue


 
Current Issue May 2012


 

Previous Issue April 2012

Current Issue

Download Current Issue: May 2012


Download Previous Issue: April 2012

Download Previous  Issue: March 2012

Primary links

  • Home
  • Articles
  • Interviews
  • Magazine
    • Subscription
    • Current issue
    • Previous issues
  • Current Affairs
  • Advertise with us
  • Contact Us
    • Contact Address

Links





WWW.UPSCPORTAL.COM - India's Largest Community for IAS Aspirants
 




Anchal Niyas

ECS Consultancy

Secondary links

  • Why Dialogue India?
Home » Blogs » admin's blog

Posted Wed, 02/01/2012 - 23:16 by admin

डॉ नूतन ठाकुर
कहावत है कि जाके पाँव ना फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। शायद यह बात कई सारी नारी-जन्य समस्याओं के लिए भी लागू होती है। वैसे तो कहने को पुरुष और स्त्री एक हैं और दोनों ही मनुष्य हैं लेकिन हकीकत यह है कि पुरुषों और स्त्रियों में कई सारी ऐसी जन्मना विभिन्नताएं होती हैं जिनके कारण चाह कर भी दोनों बिलकुल एक समान ना तो हो पाते हैं और ना ही जीवन में बर्ताव कर पाते हैं। एक तो स्त्री और पुरुष के शारीरिक बनावट में ही नैसर्गिक अंतर होता है। दूसरे संतान को जन्म देने की जिम्मेदारी स्त्रियों के माथे डाल कर भगवान ने दोनों को साफ तौर पर अलग कर दिया। जहाँ संतान उत्पत्ति के लिए संसर्ग के समय स्त्री और पुरुष दोनों की सहभागिता होती है, वहींपरवर्ती समय में यह जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह स्त्रियों के माथे पर आ जाती है। शायद यह एक बहुत बड़ा कारण रहा हो कि आदि समय से ही स्त्री और पुरुष के प्रति समाज का व्यवहार, आचरण और समाज की अपेक्षायें बहुत अलग-अलग रही। जहाँ पुरुष काफी हद तक स्वतंत्र रहे, उन्हें बाहर घूमने की आजादी रही, उनके समाज में विचरण पर कभी कोई रोक नहीं लगा और जहाँ वे समाज के पुरोधा बने रहे, वहीं स्त्रियाँ कुछ ऐसी स्थिति में पहुँच गयीं जहाँ से उन्हें पुरुषों की अनुगामी बनने, उनका अनुसरण करने और उनके कथनानुसार चलने को ही अपनी नियति स्वीकार करनी पड़ी।
यह स्थिति एक लंबे समय तक चलती रही और शायद आज भी इस स्थिति में कोई बहुत अंतर नहीं आया है, वह भी तब जब कि सिद्धान्ततया नारी सशक्तिकरण का आंदोलन काफी आगे बढ़ चुका है। इन सभी बातों का नतीजा यह है कि स्त्री और पुरुष की सोच में कुछ बहुत ही मौलिक और आधारभूत अंतर हो जाते हैं जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनवरत परिलक्षित होते हैं।
एक ऐसा ही महत्वपूर्ण अंतर स्त्री पहनावे को ले कर भी है। जहाँ पुरुष बड़े आराम से एक कच्छे में जहां-तहां घूम लेते हैं और अकसर हमें पुरुष मिल जाते हैं जो खाली बदन अपने घर के बाहर खड़े रहते हैं, खेतों में अथवा शहरों में मजदूरी के काम रहे होते हैं लेकिन इसकी जगह ऊपर के वस्त्र खोल कर घुमती हुई स्त्रियाँ बहुत ही कम मिलती हैं। मेरी निगाह में भारत जैसे देश में तो इनकी संख्या नगण्य होगी। यदि दो-चार ऐसी महिलायें होंगी भी जो अपने ऊपरी भाग को निर्वस्त्र करके घूम रही हों तो वह या तो पारंपरिक रूप से ऐसे परिधान धारण करने वाली जनजातीय महिला होंगी या कोई अति-आधुनिक स्त्री जो गोवा के तट पर मिल जाए। विदेशों तक में इस तरह से अकारण निर्वस्त्र घूमने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम ही हुआ करती है।
इस सब का मुख्य कारण वही है- स्त्री और पुरुष की मानसिकता और सोच-पद्धति में अंतर। इस अंतर का एक रूप तब देखने को मिलता है जब स्त्रियां अपने लिए अंग-वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) खरीदने बाजार जाती हैं। जहाँ पुरुष बड़े आराम से अपनी जरूरत और अपने नाप वगैरह के बारे में इन दुकानों के दुकानदारों अथवा सेल्समेन से बात कर लेते हैं वहींस्त्रियाँ इन बातों के विषय में इन दुकानों के पुरुषकर्मियों से खुल कर कदापि नहीं कह पातीं।
अभी हाल में सामाजिक संस्था इंस्टीटयूट फार रिसर्च एंड डोक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) की ओर से मैंने एवं मेरी सहयोगी उर्मिला पाण्डेय द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में इसी विषय पर एक रिट याचिका दायर की गयी। इस याचिका में हम लोगों ने उच्च न्यायालय से यह प्रार्थना की है कि हाई कोर्ट महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार को महिलाओं के लिए अंडरगारमेंट्स बेचने वाले सभी दुकानों के लिए एक ऐसी शासकीय नीति बना कर उसके अनुरूप शासकीय आदेश पारित करने हेतु निर्देशित करे जिससे ऐसी सभी दुकानों में कम से कम एक महिला सेल्सगर्ल एवं एक ट्रायल रूम की व्यवस्था अनिवार्यतया हो। साथ ही तमाम ऐसी दुकानों में अभद्र ढंग से प्रस्तुत किये गए महिला अंगवस्त्र के सम्बन्ध में रोक लगाए जाएँ। ऐसा हमने इसलिए कहा कि हम सभी जब भी बाजार जाते हैं तो देखते हैं कि महिला अंगवस्त्रों को इन दुकानों में बहुत ही भदेस और ओछे ढंग से रखा जाता है जो देखने से ही अश्लील लगता है। मैंने और उर्मिला पाण्डेय ने हाई कोर्ट से यह भी निवेदन किया है कि हाई कोर्ट महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय को ना सिर्फ ऐसे आदेश जारी करने को आदेशित करे बल्कि उसकी आगे मोनिटरिंग करने के भी आदेश दे। इस मुकदमे में हमारे अधिवक्ता अशोक पाण्डेय हैं।
हम लोगों ने इस पेटिशन में यह कहा है कि महिलाओं और लड़कियों को अपने लिए अंगवस्त्र खरीदते समय कुछ खास तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लगभग इन सभी दुकानों में ज्यादातर लोग पुरुष होते हैं और इन दुकानों में अधिकतर ट्रायल रूम भी नहीं होते। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि महिलाओं को सही साइज के अंगवस्त्र खरीदने में कठिनाई होती है और वे गलत साइज के अंडरगारमेंट्स पहनने को बाध्य होती हैं जिसमें ब्रेसरी के गलत साइज से ब्रेस्ट कैंसर की भी संभावना रहती है। पेटिशन में हमारे द्वारा यह भी कहा गया है कि जिस तरह से महिला अंगवस्त्रों को अभद्र ढंग से इन सभी दुकानों में खुलेआम प्रदर्शित किया जाता है उससे भी महिलाओं को भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। पेटिशन में हाल में ही सऊदी अरब में इस सम्बन्ध में पारित किये गए कानून का भी हवाला दिया गया है। दरअसल हाल में ही सऊदी अरब में एक कानून बनाया गया कि वहाँ के सभी महिला अंडरगारमेंट दुकानों में अब केवल महिलायें ही काम करेंगी। इस बात का वहाँ के मौलाना और पुरातनपंथी बहुत अधिक विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनकी यह इच्छा नहीं है कि महिलायें भी जागरुक हों और अपने अधिकारों के लिए सजग हों। पर इस कदम का ना सिर्फ सऊदी अरब में स्वागत हुआ है बल्कि पाश्चात्य देशों ने भी इसकी प्रशंसा की है।
इसी आदेश के तर्ज पर हम भी यह चाहते हैं कि स्त्रियों की विशिष्ट समस्या के दृष्टिगत भारत में भी हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से ऐसी स्थिति बन सके जिससे हम स्त्रियों से जुड़ी इस खास समस्या का उचित समाधान हो सके।
लेखिका नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वीनर तथा आईआरडीए की सचिव हैं

  • admin's blog
  • Login to post comments
 

© 2010 Dialogue India Magazine.