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Posted Wed, 02/01/2012 - 23:24 by admin

पैसे की ठसक और राजनीतिक संबंधों के दम पर एक संदिग्ध व्यक्ति किस तरह ऊंचाइयां चढ़ता है व बड़े पुरस्कारों तक पहुंच जाता है, मथुरा के एक ऐसे ही शख्स की सच्चाई का खुलासा करती नरेश चंद्र गुप्ता की रिपोर्ट।
पुलिस के रिकार्डों में वह विवादास्पद छवि वाला ऐसा शख्स है, जिसके ऊपर तमाम लड़कियों के उत्पीड़न से लेकर बलात्कार तक के मामले दर्ज हैं। शायद ही कोई एेसा आरोप हो जो इस शख्स पर नहीं लगा हो। मथुरा पुलिस की अभिसूचना इकाई के अनुसार मोहन स्वरूप भाटिया नाम के इस शख्स का काम पत्रकारिता के जरिए अधिकारियों को ब्लैकमेल करना, धन ऐंठना और अपने काम को साबित करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाना है। ये अपने जीवन में कई लड़कियों के उत्पीड़न के मामलों में चर्चित रहा है। इसकी आम छवि अच्छी नहीं मानी जाती। आये दिन यहां के समाचार पत्रों में इस शख्स की दबंगई से लेकर तमाम तरह की करतूतों के किस्से छाये रहते हैं। तमाम सामाजिक संगठन इसके खिलाफ आक्रोश का इजहार करते हुए सरकार को अपनी शिकायत भेज चुके हैं। ये शख्स राजनीतिक तौर पर काफी पहुंच वाला है। एक धार्मिक गुरु से भी उसे भरपूर सहयोग मिलता रहा है। आप ये जानकर हैरान हो सकते हैं कि ये शख्स जिसे अपनी इन सब करतूतों के चलते कानून के शिकंजे में होना चाहिए था, अब पद्मश्री लेने के चक्कर में है।
शायद भाटिया को पद्मश्री मिल भी जाती, क्योंकि इसके लिए उन्होंने राजनीतिक पहुंच के साथ ऊंचे अधिकारियों से अपने रिश्तों का भी भरपूर इस्तेमाल किया था। नतीजा ये हुआ कि इन्हें बड़ा समाजसेवी बताते हुए पद्मश्री अवार्ड दिलाने के लिए इनकी फाइल प्रधानमंत्री कार्यालय तक भेज दी गई। सब कुछ ठीक रहता तो शायद इस तरह के छवि वाले शख्स को भी ये अवार्ड हासिल हो ही जाता लेकिन इसकी भनक जब मथुरा के सामाजिक संगठनों और अन्य लोगों को लगी तो बड़े पैमाने पर उनकी शिकायतें सबूतों के साथ पीएम आफिस पहुंचने लगीं। जिसके चलते उनके खिलाफ जांच बिठाई गई और लगता है कि पद्मश्री का सपना देखने वाले इस शख्स को अब ये अवार्ड शायद ही मिले। लेकिन पाठकों को इस बात से रू-ब-रू कराना जरूरी होगा कि इन बेहद प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अलंकरण वाले सम्मान के लिए किस तरह के लोग होड़ में हैं और ऐसे उच्च कोटि के पुरस्कारों के साथ खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रहे।
सबूतों के आधार पर हम मथुरा के मोहन स्वरूप भाटिया नाम के इस ऊंचे संपर्कों की असलियत आप तक पहुंचा रहे हैं ताकि आप भी सचेत रहें और जानें हमारे देश, समाज और संविधान की भावना को किस तरह के लोग दागदार कर रहे हैं। दुख की बात ये भी है कि ऐसे लोग तरह-तरह के हथकंडों के बल पर अपने मकसद में कामयाब भी हो जाते हैं। भाटिया पर लगे संगीन आरोपों की तह तक जाने से पहले ये बताना भी जरूरी है वो मथुरा में क्या करते हैं। वह खुद को पत्रकार बताते हैं, क्योंकि मथुरा से वो कई समाचार माध्यमों को खबर भेजने का काम करते रहे हैं, लेकिन शिकायतें पहुंचने पर इनमें से कई समाचार माध्यमों ने उनसे किनारा भी कर लिया। किसी जमाने में यह कु. चित्रा राव नामक महिला के एक स्कूल के मैनेजर थे। बाद में इसी स्कूल से धोखाधड़ी करके अपना खुद का स्कूल खोल लिया, जिसका नाम ज्ञानदीप शिक्षाभारती है। कु. चित्रा राव के घर पर गुंडागर्दी करने के आरोप में एक बार पुलिस इन्हें गिरफ्तार करके कोतवाली भी ले गयी थी। आमतौर पर इस स्कूल की आड़ में ऐसी गतिविधियां चलाई जाती हैं, जिन्हें अच्छा नहीं माना जाता। कुछ सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस स्कूल में अधिकारियों और उन नेताओं की रंगरेलियां होती रही हैं, जिनसे भाटिया अपना काम निकालते रहे हैं। इनके छोटे भाई तो इसी स्कूल की एक अध्यापिका को भगा कर ले गए थे। इसके अलावा ये फिल्में बनाने का दावा भी करते हैं, लेकिन आम तौर पर ये लड़कियों के साथ व्यभिचार का एक और साधन है।

बलात्कार जैसे संगीन आरोप
वर्ष 1977 में श्रीमती निर्मला नाम की महिला ने इन पर अपनी लड़की गुड्डो के साथ व्यभिचार और जबरदस्ती उसे अपने साथ रखने का आरोप लगाया था। ये रिकार्ड आज भी पुलिस में दर्ज है। ये मामला उन दिनों मथुरा में खासा चर्चित भी हुआ था। क्योंकि इससे पहले भी मोहनस्वरूप भाटिया ने एक और फिल्म रंगमहल बनाने के बहाने कलाकारों से न केवल पैसे ऐंठे थे बल्कि उनका हर तरह से शोषण किया था।
उसके बाद उन्होंने सत्यनारायण की कथा नाम से एक दूसरी वीडियो फिल्म बनाने की घोषणा की, जिसमें गुड्डो नाम की लड़की को हीरोइन को लिया गया। इसकी मां ने पुलिस में साफ शिकायत दर्ज की कि फिल्म की आड़ में उसकी लड़की का जमकर दैहिक शोषण किया गया, उसे धमकाया गया और साथ ही मारा-पीटा भी गया। बाद में जब उसने अपनी लड़की को घर भेजने का आग्रह किया तो उसे धमकियां दी जाने लगीं। इस मामले की जांच मथुरा के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सुभाष जोशी ने की थी। इसे लेकर मथुरा के कुछ समाजसेवी संगठनों ने आगरा परिक्षेत्र के तत्कालीन उप महानिरीक्षक बलवीर सिंह बेदी को ज्ञापन भी दिया था। बाद में कोतवाली मथुरा के पुलिस निरीक्षक ने जांच के बाद अपनी जो आख्या पुलिस अधीक्षक को पेश की वो तो और भी चौंकाने वाली थी। इस आख्या के कुछ निष्कर्ष की कुछ खास बातें इस तरह हैं-
भाटिया के स्कूल के बारे में तमाम तरह की बातें कही जाती हैं, इसकी ख्याति अच्छी नहीं है। स्कूल की अध्यापिकाएं अधिकांश तौर पर गरीब परिवारों की और अविवाहित हैं। आये दिन इस शिक्षा संस्था द्वारा बच्चों और इन शिक्षिकाओं का टूर पर जाना और उनके साथ कुछ असंबंधित व्यक्तियों का भी जाना संस्था और भाटिया की बदनामी का सबसे बड़ा कारण है। भाटिया अपना स्कूल खोलने के पहले कु. चित्रा राव के स्कूल में मैनेजर थे। वहां उन्होंने अनेक अनियमितताएं कीं, जिसके चलते उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद चित्रा राव ने उन पर मुकदमा भी किया। बाद में भाटिया द्वारा अपनी गलती मानने के बाद अभियोग खुद खत्म हो गया।
ये सच है कि ज्ञानदीप स्कूल द्वारा अनेक टूर की व्यवस्था की जाती है। भाटिया के एक मित्र जगदीश उर्फ भय्या चौबे की एक बस ज्ञानदीप के नाम से ही इसका भार वहन करती है। इन यात्राओं में स्कूल की अध्यापिकाओं, आकाशवाणी के कलाकार और कुछ बाहरी व्यक्ति भी जाते हैं।
पन्नालाल नामक व्यक्ति भाटिया के स्कूल में किराये से रहता था। वह उसे स्कूल से निकाल देना चाहते हैं। इसके चलते उसके खिलाफ झूठा आरोप लगाकर उसे अपराध में बंदी बनाया गया लेकिन बाद में ये व्यक्ति अदालत में निर्दोष पाया गया। ब्रजसारंग नाम की नौटंकी एक कुख्यात महिला चलाती है, जिससे भाटिया के निकट संबंध हैं। भाटिया ने 07 नवंबर 1979 को एक समाज कल्याण अधिकारी को उनका काम नहीं करने की एवज में पत्र लिखकर धमकाया था कि आशा है कि आप अपना स्थानांतरण नहीं कराना चाहेंगे, ये उनकी ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति का साफ उदाहरण है।

एक धार्मिक गुरु से भरपूर सहयोग
एसी कुटिया में रहने वाले और एयर कंडीशंड गाड़ी में सफर करने वाले धार्मिक गुरु के राजधानी में शराब के कारोबारी चांदीवाले परिवार से ही नहीं अनेक गोरखधंधेबाजों से भी बेहतर संबंध हैं। अपने शिष्यों से दान लेने वाले यह धार्मिक गुरु अपने चहेते शिष्य भाटिया को भी भरपूर मदद करते हैं। यही नहीं, अपने इस कृपा पात्र पर लदकद इस संत ने उनके सत्तरवें जन्म दिन पर क्वालिस गाड़ी भी भेंट की। इन्होंने ऐसा क्यों किया? आखिर उन्हें भाटिया से किस तरह का फायदा मिलता है, यह लोगों में चर्चा का विषय है। मथुरा की एक संस्था ब्रज कला अकादमी के निदेशक का आरोप है कि भाटिया के स्कूल में भी इन धार्मिक गुरु के कई शिष्य दान देते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भाटिया और इन धार्मिक गुरु के बीच बेहतर रिश्ते हैं। भाटिया इनकी किताबों का भी संपादन करते रहे हैं। मीडिया में इस गुरु को हाईलाइट करने का यह एक मौका नहीं छोड़ते। कुछ दिन पूर्व एक संस्था अवंतिका और भाटिया के स्कूल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम का शुभारंभ भी इन्हींगुरु ने किया था।

अस्पताल की आड़ में धन संग्रह
भाटिया ने अपनी दिवंगत महिला मित्र सविता भार्गव के नाम पर एक कैंसर अस्पताल चालू करने के नाम पर धन संग्रह करने का जबरदस्त अभियान चला रखा है। स्वर्गीय भार्गव आजीवन कुुंवारी रहीं और मृत्यपर्यंत भाटिया के साथ ही ज्ञानदीप स्कूल में रहती थीं।

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी से करानी चाही लाबिंग
सूत्रों के अनुसार मथुरा के एक पूर्व जिलाधिकारी, जो कुछ समय पहले गृह मंत्रालय में कार्यरत थे, के जरिए ही भाटिया ने पद्मश्री पुरस्कार दिये जाने के लिए अपनी लाबिंग कराने की चेष्टा की लेकिन इनकी कारगुजारियों से पूरी तरह से अवगत होने के कारण उन्होंने मदद करने से इन्कार कर दिया।

एलआईयू रिपोर्ट
जैसा कि ऊपर ही जाहिर हो चुका है कि एलआईयू रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि भाटिया की छवि कैसी है और वो कैसा काम करते रहे हैं।
जान से मारने का भी आरोप
इस शख्स पर रामेश्वर दयाल शर्मा नाम के एक व्यक्ति पर जान से मारने का प्रयास करने का भी आरोप है। क्योंकि रामेश्वर दयाल शर्मा ने भाटिया की करतूतों के खिलाफ न केवल आवाज उठाई थी बल्कि उनके खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी।

इसलिए नहीं मिली गैस एजेंसी
भाटिया एक समाजसेवी की हैसियत से एक गैस एजेंसी लेना चाहते थे लेकिन भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड ने अपनी फील्ड रिपोर्ट के आधार पर उन्हें विवादास्पद व्यक्ति बताया और उनके समाजसेवी होने के दावे को नकार दिया। इस मामले में भाटिया ने जिला अदालत में भारत पेट्रोलियम के खिलाफ मुकदमा दायर किया लेकिन वह हार गये। बाद में जब उन्होंने इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की तो वह वहां खारिज हो गई।

अपना ही अभिनंदन ग्रंथ भी छपवा रहा है
भाटिया को आत्म प्रचार का पाखंड बहुत सुहाता है। ये वृंदावन की एक प्रेस में हजारों पृष्ठों का एक अभिनंदन ग्रंथ छपवा रहा है। जुगाड़ लगा कर वह दर्जनों सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं से अपना सम्मान भी करा चुका है।
आप खुद समझ सकते हैं कि अगर हम जागरुक नहीं हुए तो हमारे राष्ट्रीय अलंकरणों को भी इस तरह के निहित स्वार्थ और पाखंड वाले लोग किस तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये एक मुहिम भी है, जिसमें हम ये चाहेंगे कि आप समाज के इस तरह के लोगों को हमारी मदद से बेनकाब करें।
 

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