
Posted Wed, 02/01/2012 - 23:34 by admin
प्रदीप कुमार
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भारत विश्व का सर्वाधिक समृद्ध देश है। इसका कारण भारत की
आध्यात्मोन्मुखी संस्कृति है जिसकी धारा हजारों वर्षों से अबाध बह रही है। अगर हम
अतीत और वर्तमान की संस्कृतियों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि प्रत्येक संस्कृति
का एक केन्द्र और केन्द्रीय मूल्य होता है जिसके इर्द-गिर्द उसका उद्भव और विकास
होता है। चीन की संस्कृति का मूल कन्फ्यूशियस की विचारधारा में था जिससे प्रशासन एवं
जन सामान्य के लिए नैतिक और व्यावहारिक नियमों का विस्तृत विवरण है। इनके कारण ही
चीन के इतिहास में अनेकों शक्तिशाली साम्राज्यों का जन्म हुआ। वर्तमान चीन उस
परम्परा का उदाहरण है। पश्चिमी संस्कृति का केन्द्र और प्रयत्न पदार्थीय संसार को
पूर्णता देने में है। विज्ञान की ऊर्जा से पे्ररित वर्तमान में पदार्थीय विकास
विश्व इतिहास में एक अनोखा उदाहरण है। भारतीय संस्कृति का आधार सदा से आध्यात्मिक
था और है। इसका कारण सम्भवत: भारत की उपजाऊ धरती, वर्षा ऋतु और गर्म जलवायु थी जिसमें
व्यक्ति को जीवन यापन के लिए अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता था। यदि व्यक्ति के पास
समय हो तो उससे कला विज्ञान और आध्यात्म का विकास होता है।
भारतीय समाज में आध्यात्मिक विभूतियों को सदा ही सर्वोच्च स्थान मिला। इसी कारण
जातीय विभाजन में ब्राह्मण यानि ब्रह्म पथ का अनुसरण करने वालों को श्रेष्ठ पदवी
मिली।
ऋषि राजा से बेहतर था। भारतीय दैनिक जीवन, नृत्य, संगीत, कला और त्यौहारों में
अध्यात्म समाया है। इस कारण से भारतीय अध्यात्म, धर्म नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति है
जिसमें अनीश्वरवाद से लेकर पेड़ों और पत्थर की पूजा तक सब निहित है और जीवित है।
वैदिक धर्म से लेकर योग और भक्ति तक, पुरातन ऋषियों की ऋचाओं और सूत्रों से श्री
अरविन्द और कृष्णामूर्ति के दर्शन तक अध्यात्म की परम नदी अविरल प्रवहित है।
अध्यात्म की इस परम्परा के जीवित रहने का एक और कारण भी है। ऋषि न केवल दार्शनिक थे
बल्कि वैज्ञानिक थी। उन्होंने देह, मानस और आत्मा के साथ नए-नए प्रयोग किए ताकि
अध्यात्म सम- सामयिक एवं प्रासांगिक बनी रहे। ऋषि वास्तव में एक वैज्ञानिक होता है
जो चेतना की ऊर्जा से यह पहचानता है कि संसार और समाज परिवर्तन किस दिशा में अग्रसर
है। उन पथ दिशाओं को पहचानता है कि संसार और समाज परिवर्तन किस दिशा मेंं अग्रसर
है। उन पथ दिशाओं को पहचान कर वह नए विचारों, दर्शन और ध्यान विध्यिों की रचना करता
है। ऋषि का कार्य व्यक्ति को परिवर्तन करना नहीं बल्कि उसमें सुसुप्त परिवर्तन की
सम्भावना को तथ्य में बदल देना है। श्री अरविंद एक ऐसे ही ऋषि वैज्ञानिक थे जिनका
समग्र एवं पूर्ण योग संसार के कोने-कोने में फैल रहा है।
किन्तु अध्यात्म की इस समृद्ध एवं ऐश्वर्यमय परम्परा के बावजूद, भारत मे कोई ऐसी
संस्था, केंन्द्र, अकादमी या विश्वविद्यालय नहीं है जहां साधक, विद्यार्थी और
मुमुक्षु को पुरातत्व या अनुभूति का अवसर मिल सके। भारत के इतिहास में नालन्दा
विश्वविद्यालय ऐसे समग्र केन्द्र का उदाहरण था। यद्यपि भारत में अनेकों आश्रम एवं
केन्द्र हैं किन्तु या तो वे विशेष गुरु या सम्प्रदाय की प्रणाली और विचारधारा पर
आधरित हैं या इतने परम्परावादी और क्लिष्ट हैं कि आधुनिक समय मे प्रासंगिक नहीं।
गुरु-शिष्य परम्परा अतीत में अनमोल थी जिसके माध्यम से अध्यात्म और कला के क्षेत्र
में ज्ञान प्रवाह बना रहा किन्तु धीरे-धीरे यह परम्परा रुढ़िवादिता, जड़ता और धन एवं
वैभव में बन्दी हो गयी, विशेषकर वर्तमान में जहां समाज और संस्कृति के हर पक्ष में
ज्ञान के क्षेत्र में लोकतंत्र का उदय हो रहा है। भारत में ज्ञान के क्षेत्र में
लोकतंत्र का प्रभाव आर्युवेद एवं संगीत में गहराई से हुआ।
अतीत में आयुर्वेद कुछ वैद्यों और उनके शिष्यों तक ही सीमित था। संगीत के क्षेत्र
में केवल कुछ घराने थे और संगीत की शिक्षा वह परम्परा टूटी। आज आयुर्वेद और संगीत
की शिक्षा कोई भी वह व्यक्ति जो इच्छुक एवं सक्षम है विद्यालयों में प्राप्त कर
सकता है। इस कारण से भारत के हर शहर में आयुर्वेदिक डाक्टर उपलब्ध हैं और संगीतकार
संसार के कोने कोने में जाकर भारतीय संगीत का प्रकाश फैला रहे हैं।
ऐसा ही परिवर्तन अध्यात्म के क्षेत्र में जरूरी है। अध्यात्म एक निर्मल एवं
पारदर्शी शिक्षा बन सकता है जिससे अंधविश्वास, व्यर्थ का रहस्यवाद और पराप्रकृतिवाद
समाप्त हो जाए।
जहां संसार से सम्बन्धित शिक्षा व्यक्ति को समाज में सक्षम बनाती है वैसे ही
आध्यात्मिक शिक्षा उसे आन्तरिक प्रकाश एवं शक्ति देती है, दुख और भय से मुक्त करती
है। हर व्यक्ति के हृदय और आत्मा में पावनता की लौ जलाती है जिसके दर्शन के लिए उसे
संसार और समाज को छोड़ने की जरूरत नहीं, गुरुओं के पैरों पर पड़ने और अपना मन-धन
समर्पित करने की आवश्यकता नहीं है। आध्यात्मिक शिक्षा व्यक्ति को अपने मान सम्मान
पर खड़ा होना सिखलाएगी।
उपरोक्त कारणों से भारत में एक ऐसे केन्द्र की आवश्यकता है जहां
द्यअध्यात्म के सभी पहलुओं की समग्र शिक्षा मिल सके।
द्यवह शिक्षा आचार्य विद्यार्थी सम्बन्ध पर आधारित हो, गुरु शिष्य परम्परा पर नहीं,
ताकि संवाद और तर्क को शिक्षा और अध्ययन में स्थान मिल सके और किसी भी विषय पर
निर्भय होकर प्रश्न पूछे जा सकें।
द्यशिक्षा केवल किताबी न हो। उसमें योग, ध्यान और प्राणायाम शामिल हो ताकि चिन्तन,
मनन के साथ-साथ अनुभूति भी हो।
द्यअध्यात्म केवल पारम्परिक एवं रुढ़िवादी न हो। उसमें नवीन प्रयोगों के लिए समुचित
स्थान हो। अध्यात्म का जुड़ाव विज्ञान के साथ हो ताकि अध्ययन अनुभूति वर्तमान एवं
भविष्य के लिए प्रासंगिक बनी रहे।
द्यअन्य शिक्षाओं की तरह आध्यात्मिक शिक्षा के लिए एक शुल्क निश्चित हो ताकि
केन्द्र को दान पर निर्भर न होना पड़े। भारत में अधिकतर दान भ्रष्टता से कमाए धन से
आता है। शुल्क के कारण केन्द्र आत्मनिर्भर होगा और उसके भ्रष्ट होने के अवसर कम
होंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि धन-दान वर्जित होगा किन्तु उसका स्वीकार तब हो जब वह
ईमानदारी से कमाया हो।
क्या ऐसा सम्भव है? बिना संदेह के- हाँ।
ई-मेल - pkumar38@cogeco.ca
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