
Posted Wed, 02/01/2012 - 21:05 by admin
ब्याज दरें बढ़ाए जाने का असर विकास दर पर दिखने लगा है। वहीं आयात-निर्यात के
फर्जी आंकड़ों के बाद आईआईपी के आंकड़े भी सवालों के घेरे में हैं। डी आलोक का
विश्लेषण।
लू वित्त वर्ष की पहली छमाही में देश की आर्थिक विकास दर 7.3 फीसदी रही थी। लेकिन
यह ग्रोथ इतना असमान है कि देश की अर्थव्यवस्था किस ओर बढ़ रही है, इसका अंदाजा लगाना
मुश्किल होता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर पूंजीगत वस्तु क्षेत्र में तो तेजी का
रुख देखा गया है लेकिन खनन क्षेत्र में लगातार चौथे महीने गिरावट दर्ज की गई। अगर
आयात-निर्यात के मोर्चे पर आंकड़ों की पड़ताल की जाए तो पता चलता है कि इनमें हर महीने
आश्चर्यजनक बदलाव दिखाई दे रहे हैं। आयात-निर्यात के मोर्चे पर आंकड़ों की गड़बड़ी की
कहानी को भले ही सरकार ने सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी कह कर टाल दिया हो, लेकिन सबको पता है
कि कहानी इतनी सीधी नहीं है।
नवंबर में औद्योगिक उत्पादन 5.9 फीसदी की दर से बढ़ा है। इससे पहले अक्टूबर की आईआईपी
ग्रोथ -4.7 फीसदी (संशोधित) हो गई है, जो पहले -5.1 फीसदी थी। नवंबर में
मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का उत्पादन 6.6 फीसदी से बढ़ा। वहीं, पिछले साल नवंबर में
मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर आईआईपी -6 फीसदी रहा था। नवंबर में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर
आईआईपी 14.6 फीसदी रहा। पिछले साल नवंबर में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर आईआईपी 5.6 फीसदी
रहा था। वहीं कैपिटल गुड्स सेक्टर का उत्पादन फिर से निगेटिव ही रहा है लेकिन इस
बार गिरावट कम हुई है। नवंबर में कैपिटल गुड्स का उत्पादन -4.6 फीसदी रहा, जबकि
पिछले साल की समान अवधि में इस सेक्टर की ग्रोथ -25.5 फीसदी थी। आंकड़ों का
उतार-चढ़ाव यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। आइए अब बात
कर लें आयात-निर्यात की। देश का दिसंबर 2011 का निर्यात एक साल पहले इसी माह की
तुलना में 6.7 फीसदी बढ़कर 25 अरब डालर का हो गया। इस बार दिसंबर में आयात भी 19.8
फीसदी की वृद्धि से 37.8 अरब डॉलर रहा। आयात-निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा
का आंकड़ा देखें तो कुछ के आंकड़ों में काफी अधिक उतार-चढ़ाव है जो कुछ और ही कहानी बयां
कर रही है।
इस बीच देश की बिगड़ती आर्थिक सेहत पर वर्ल्ड बैंक ने भी अपनी मुहर लगा दी है। बैंक
ने दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर आधारित अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत के
लिए विकास दर का अनुमान घटाकर 6.8 फीसदी कर दिया है। बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत
का नाम लिए बगैर कहा कि दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाएं सुधारों के मामले में
नीतिगत अनिश्चितता और पंगु घरेलू पॉलिसी से जूझ रही हैं। गौरतलब है कि भारत सरकार
के अनुमानों के मुताबिक, मार्च 2012 को खत्म होने वाले कारोबारी साल में सकल घरेलू
उत्पाद (जीडीपी) विकास दर 7 से 7.5 फीसदी के बीच रहेगी। इससे पिछले कारोबारी साल
में विकास दर 8.5 फीसदी रही थी। दिलचस्प बात यह है कि विश्व बैंक ने अगले कारोबारी
साल यानी 2012-13 के लिए बहुत उत्साहजनक भविष्यवाणी नहीं की है। अगर इस संस्था की
मानें तो 2012-13 के दौरान भी भारत की विकास दर 6.8 फीसदी ही रहेगी। इसके बाद
कारोबारी साल 2013-14 में यह उछलकर 8 फीसदी हो सकती है।
सरकार की ओर से वृद्धि दर के अनुमानों को घटाने के बाद अब रेटिंग एजेंसी फिच ने
चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को घटा दिया है। रेटिंग
एजेंसी के मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष में देश की वृद्धि दर 7 फीसदी रह सकती है।
इससे पहले फिच ने 7.5 फीसदी वृद्धि दर रहने का अनुमान लगाया था। फिच ने वृद्धि दर
का अनुमान घटाने के पीछे तर्क यह दिया है कि भारत में ऊंची ब्याज दरों के कारण मांग
में कमी का दौर चल रहा है। इसके अलावा आर्थिक मंदी के नकारात्मक असर से भारत भी
अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिये चालू वित्त वर्ष के दौरान सात फीसदी से अधिक
वृद्धि दर हासिल करना काफी मुश्किल होगा।
हाल में औद्योगिक संस्था फिक्की की एक बैठक को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री प्रणव
मुखर्जी ने यह स्वीकार किया था कि संसद में सहमति नहीं बन पाने की वजह से सरकार
आर्थिक सुधार से जुड़े प्रमुख कानून को आगे नहीं बढ़ा सकी। गौरतलब है कि गुड्स एंड
सर्विसेज टैक्स (जीएसटी), डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) और एफडीआई पॉलिसी पर नियमों
में ढील से जुड़े विधेयक संसद में लंबित पड़े हैं।
पिछले दिनों नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने दलहन आयात कार्यक्रम के बारे में
अपनी जो रिपोर्ट पेश की, वह सरकार द्वारा किए गए एक और गोरखधंधे की ओर इशारा करती
है। सीएजी ने अगर दालों के आयात के सरकारी फैसले और संबंधित कंपनियों पर उंगली उठाई
है तो उसके पुख्ता आधार हैं। आमतौर पर ऐसे मामलों को नीति या फैसले की खामी मान कर
नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है। मगर सीएजी ने नीयत में खोट की ओर भी इशारा किया है
और यही इस रिपोर्ट का सबसे संगीन पहलू है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि साल 2006
से 2011 के दौरान 53.10 लाख टन के आयात और बिक्री के लक्ष्य के मुकाबले इस दौरान
30.04 लाख टन दालों का आयात किया गया और 26.95 लाख टन की बिक्री की गई। इसका लक्ष्य
दालों की कीमतों में स्थिरता लाना था। इस कार्यक्रम की वजह से दालों की कीमत में तो
स्थिरता नहीं आई, हालांकि सरकारी कंपनियों को 1200 करोड़ रुपए का भारी नुकसान जरूर
हो गया।
सीएजी की इस रिपोर्ट के अनुसार दालों के आयात के फैसले का मकसद उनकी उपलब्धता बढ़ाने
से ज्यादा आयातक कंपनियों को लाभ पहुंचाना था। इस पूरे मामले में आश्चर्यजनक बात यह
रही कि आयात तो सरकारी एजेंसियों के जरिए किया गया, लेकिन बिक्री के लिए राज्य
एजेंसियों के बजाय खुले बाजार में नीलामी की प्रक्रिया को अपनाया गया। सरकारी
एजेंसियों ने आयात की गई जितनी दाल बेची, उसका लगभग तीन-चौथाई हिस्सा सिर्फ चार बड़ी
कंपनियों पास गया और इस पूरी प्रक्रिया में छोटी कंपनियों को एक तरह से जान-बूझ कर
बाहर रखा गया। दालों की कीमतें आसमान छू रही थीं और दूसरी ओर आयातित दालों को बाजार
तक पहुंचाने में बिचौलियों ने कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से लगभग चार महीने का समय
लगा दिया।
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