
Posted Wed, 02/01/2012 - 21:12 by admin
- रामस्वरूप रावतसरे
आचार्य रजनीश ने कहा था हम होश में नहीं बेहोशी में जीना चाहते हैं। तभी तो युवाओं
को साहित्य के साथ सुरा व सिगरेट का भी रसास्वादन कराया जा रहा हैं। जयपुर लिटरेचर
फेस्टिवल पूरे विश्व के साहित्यकारों का ऐसा समागम है, जिसे यहां के युवा नजदीक से
देखना चाहते हंै। वे उनसे रूबरू भी होना चाहते है कि समाज को दिशा देने वाला
साहित्यकार सामने आने पर किस प्रकार का दिखता है। उससे रूबरू होने पर किस प्रकार के
आकर्षण की अनुभुति होती है। उन्होंने देखा कि किस प्रकार अपने आप में बड़ा कहलाने
वाले साहित्यकारों का साहित्य सुरा व सिगरेट का साथ लेकर सीढ़ियां चढ़ता है।
होटल डिग्गी पैलेस में २० से २४ जनवरी तक आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल में विश्व के
ख्यातनाम साहित्यकारों, लेखकों एवं कवियों की उपस्थिति देख कर प्रत्येक विचारवान
व्यक्ति के कदम उन्हें देखने व सुनने चल पड़े लेकिन वहां की अभद्रता का खुला तांडव
देख कर सभी यही सोचते होंगे, जैसे साहित्य साधक शिवकुमार शर्मा ÓशिवÓ का कहना है कि
लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों की नजरों में फिल्म वाले, राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी
ही साहित्यकार रह गये हंै।
लोकेश कुमार सिंह "साहिल" का कहना है कि यह लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य का फैशन शो ही
है जिसमें चकाचौंध के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता। डा. हरिराम आचार्य का कहना है कि
इस फेस्टिवल में स्कूली बच्चों को भी आमन्त्रित किया गया। शराब, सिगरेट तथा डीजे के
साथ उठने वाली धमाल से ये बच्चे कैसी सीख लेकर जायेंगे? आयोजक इनका किस संस्कृति और
सरोकारों से सामना करवा रहे हैं? प्रख्यात लेखिका रमा पाण्डे ने कहा कि साहित्य के
नाम पर रात को जो होता है वह सिर्फ डिस्को नाइट के अलावा कुछ भी नहीं है।
इकराम राजस्थानी का कहना है कि इतिहास सामने है। पहले के विचारकों, कवियों,
साहित्यकारों को लिखने या समझने के लिये शराब की आश्यकता नहीं पड़ी, पर फेस्टिवल में
यह सब खुलेआम हुआ। साहित्य समाज की विकृतियों को दूर कर बिखराव को समाप्त करता है,
पर यहां तो मर्यादाएं ही टूट गईं।
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने पं. झाबरमल शर्मा स्मृति
व्याख्यानमाला में बोलते हुए कहा कि इस प्रकार के लिटरेचर फेस्टिवल ना ही हों तो
समाज के लिये अच्छा है।
हम किस प्रकार का सामाजिक परिवेश बनाना चाहते हैं। क्या इस प्रकार के आयोजनों से
हमारी संस्कृति पुष्पित पल्लवित होगी या विखण्डन का वरण करेगी? हजारों साल पुरानी
हमारी श्रेष्ठ संस्कृति की गौरव गाथा को यों शराब व शबाब की दहलीज पर तो लाकर खड़ा
नहीं किया जा सकता। साहित्य समागम समझ को बढ़ाने वाला होना चाहिये, समझ को मदहोश
करने वाला नहीं।
खैर आयोजक शराब व सिगरेट को खुले मंचों में साहित्य के साथ जोड़ कर आगे कैसा
साहित्यान्वेश पाठक व श्रोता बनाना चाहते हैं, यह उन्हीं की समझ में आ सकता है।
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