Posted Sun, 09/02/2012 - 19:17 by admin
- वाई पी सिंह (से.नि. आईपीएस)
अप्रैल, २०११ के बाद अन्ना के आंदोलन से मेरे दूर रहने के कई कारण हैं। पहला कारण
है कि मेरा मानना है कि किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता को सरकारी कमिटि में शामिल नहीं
होना चाहिए अन्यथा परिणामों की समीक्षा करते हुए उन्हें अपने ही आदर्शों की समीक्षा
करनी पड़ती है। भारतीय पुलिस सेवा को छोड़ते समय मेरा यह दृढ़ निश्चय था कि मैं किसी
भी सरकारी कमिटि का हिस्सा नहीं बनूंगा। इसका कारण भी स्पष्ट है। यदि सामाजिक आलोचक
ही सरकारी कमिटि में शामिल हो जाएंगे तो इसके कार्यों र्की समीक्षा कौन करेगा। फिर
तो अंतिम परिणामों की समीक्षा करते समय उसके अपने स्वार्थ ही आड़े आएंगे और जिसके
कारण उसे कुछ अनचाहे समझौते भी करने पड सकते हैं। जैसे कि अन्ना टीम के साथ हुआ।
असहमत होने के बावजूद उन्हें लोकपाल बिल पर बनी समिति द्वारा बनाए गए बिल की प्रशंसा
करनी पड़ी।
अन्ना ने जब २००३ में अपना अनशन शुरू किया था तो उनके साथ बैठने वाला मैं पहला
व्यक्ति था। उस समय मैं आईपीएस था और मुंबई में स्टेट रिजर्व पुलिस फोर्स में
कमांडेंट के पद पर काम कर रहा था। उस अनशन में शामिल होने से मेरे कैरियर को काफी
नुकसान हुआ था। किसी आईपीएस आधिकारी द्वारा अपने कैरियर को दांव पर लगा कर ऐसा कदम
उठाने की यह पहली घटना थी। इससे पहले शायद ही किसी आईपीएस या आईएएस अधिकारी ने पद
पर रहते हुए किसी सत्ताविरोधी आंदोलन में शामिल होने का साहस दिखाया हो। यह एक
विडंबना ही है कि आईपीएस या आईएएस अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद सत्ताविरोधी
आंदोलनकारी बन जाते हैं। इसे साबित करने के लिए मैं १ जून, २००३ के टाइम्स ऑॅफ
इंडिया में छपी एक खबर का हवाला देना चाहूंगा। यह खबर इस प्रकार है - 'श्री सिंह
जिनकी सेना में भ्रष्टाचार पर लिखी एक पतली सी पुस्तक कारनेज बाई एंजेल्स ने सत्ता
प्रतिष्ठानों में हलचल मचा दी है, ने कहा - अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन
में शामिल होने से मुझे बतौर पुलिस अधिकारी अपना प्रदर्शन को बेहतर बनाने में सहायता
मिलेगी। भ्रष्टाचार के विरूद्ध लडऩे वाले योद्धा से एक घंटे लंबी बैठक के बाद श्री
सिंह ने कहा - यदि मुझे पेड़ लगाने होंगे तो मैं किसी वनस्पतिविज्ञानी से मिलूंगा।
स्टेट रिजर्व पुलिस के ग्रुप ङ्कढ्ढढ्ढढ्ढ के कमांडेंट श्री सिंह ने बताया कि वे
स्थानांतरण और पदोन्नति को एक कमिटि द्वारा किए जाने के अपने प्रस्ताव को आगे बढाने
के लिए श्री हजारे से मिलने गए थे। श्री सिंह ने कहा - सरकार उच्च न्यायालय के एक
सेवानिवृत्त न्यायाधीश, लोकायुक्त, एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता और दो पूर्व
पुलिस आयुक्तों की एक कमिटि बना सकती है जो पुलिस के प्रमुख पदों पर नियुक्ति के
लिए सूची तैयार करे। अंतिम निर्णय सरकार पर छोडा जा सकता है।Ó
परंतु कुछ दिनों बाद मुझे लगा कि मेरा रास्ता अलग है और इसलिए मैंने अन्ना के
अप्रैल २०११ के आंदोलन से स्वयं को पृथक रखा। कई लोग मुझसे इस बाबत पूछते रहे हैं।
इसके कुछ विशेष कारण इस प्रकार हैं।
अन्ना अधिकारी के पद के रौब में आ जाते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उनका सोनिया
गाँधी से प्रभावित होना है। यह मेरा पिछले आठ वर्षों से अन्ना के साथ रहने का अनुभव
है कि वे अधिकारी के रौब में आ जाते हैं। यदि कोई वरिष्ठ राजनेता या मंत्री अन्ना
को बुला लेते हैं, तो इससे वे भाव-विभोर हो जाते हैं। सत्ता से प्रभावित हो जाने
वाला व्यक्ति भ्रष्टाचार से नहीं लड सकता। सोनिया गाँधी की उन्होंने जो प्रशंसा की
है, यह उसका ही एक उदाहरण है। उनकी यह प्रशंसा किसी चाटुकार के प्रतीत होते हैं जो
एक भ्रष्ट सरकार को ईमानदार सिद्ध करने की कोशिश कर रहा है।
अन्ना को लाल बत्ती वाली सरकारी गाडिय़ों में घूमना बहुत पसंद है जोकि किसी भी
सामाजिक कार्यकर्ता के लिए उचित नहीं है। ९ अगस्त, २००३ के आंदोलन के बाद अन्ना लाल
बत्ती में घूमने लगे। आईपीएस की नौकरी छोडऩे के बाद मैं एक ही बार लाल बत्ती वाली
गाड़ी में बैठा हूं और वह भी अन्ना के साथ। अन्ना सरकारी मेहमाननवाजी भी बडे शौक से
स्वीकारते रहे हैं और सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरते रहे हैं जो उच्चाधिकारियों के
लिए बने होते हैं। अन्ना को वश में करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने अन्ना की खूब
मेहमाननवाजी की। वे अक्सर मुंबई आते थे और मालाबार हिल के हाई मॉउंट जैसे पॉश सरकारी
गेस्ट हाउसों में ठहरते थे। सरकार के साथ संघर्ष करने वाले किसी कार्यकर्ता के लिए
यह काफी आपत्तिजनक है। सरकारी सुविधाओं का उपभोग करने वाला सरकार से कैसे संघर्ष कर
सकता है।
इतना ही नहीं, अन्ना को वश में करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने अन्ना को संवैधानिक
सीमाओं से आगे जाकर अधिकार दिए। उस समय तो सभी सीमाएं पार हो गईं जब अन्ना मंत्रालय
भवन की छठी मंजिल पर स्थित मुख्यमंत्री के कांफ्रेंस हॉल में बैठ कर आईएएस अधिकारियों
की बैठक लेने लगे। मंत्रियों और सचिवों को निर्देश दिए गए थे कि वे अन्ना की जरुरतों
के अनुसार उन्हें रिपोर्ट किया करें। अन्ना के लोगों को काम करने के लिए मंत्रालय
में कमरे दिये गये। सभी नियमों को धता बताते हुए मंत्रालय के अंदर अन्ना का
कार्यालय चल रहा था। लगता था मानो अन्ना एक समानांतर सरकार चला रहे हों। अन्ना ने
सरकार से संघर्ष करते हुए सरकारी सचिवालय से ही कार्य करने का इतिहास बनाया है। मेरे
जैसे व्यक्ति जोकि अपनी नौकरी के दौरान भी ३-४ बार ही सचिवालय गया हो, के लिए यह
अकल्पनीय है।
अन्ना ने हमसे आदर्श घोटाले के लिए ताकि वे इसमें शामिल दो केंद्रीय मंत्रियों
विलासराव देशमुख व सुशील शिंदे को हटाये जाने की मांग कर सकें। फिर अचानक वे शांत
हो गए। यह काफी गंभीर मामला था। पहले तो उनके ही लोगों ने बारंबार उन कागजों की
मांग की थी और जब मैंने उन्हें इस आशा में वे कागजात दे दिए कि वे उन दोनों
केंद्रीय मंत्रियों को कैबिनेट से निकाले जाने की मांग करेंगे तो आश्चर्यजनक रूप से
उन्होंने इस विषय पर चुप्पी साध ली।
अन्ना ने मुझसे लवासा हिल स्टेशन की भी विस्तृत जानकारी ली थी जोकि हमारे ही अथक
प्रयासों से अवैध सिद्ध किया गया था। इसके लिए मेधा पाटेकर और उसके साथियों ने एक
पीआईएल दाखिल की थी जो मेरी ही तैयार की हुई थी। उसमें यह भी साबित किया जा चुका था
कि उसमें शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के २१ प्रतिशत शेयर हैं। सुप्रिया सुले ने
इस कई हजार करोड की कंपनी के ये शेयर बेच दिए जिसकी कीमत केवल ४२ करोड रूपये दिखाई
गई, जबकि उसकी वास्तविक कीमत ५०० से लेकर १००० करोड की होनी चाहिए थी। अन्ना ने इसकी
भी सारी जानकारी मुझसे ली परंतु इस पर शरद पवार का इस्तीफा मांगने की बजाय फिर
चुप्पी साध ली और यह लडाई लडने के लिए हमें अकेला छोड दिया।
अन्ना जो २००३ से करते आ रहे हैं, आज उसकी ही पुनरावृत्ति शुरू हो गई है। अन्ना और
उनके लोगों ने एक कमिटि में एकाधिकार करने की चेष्टा की और जिस प्रकार वे राज्य
सचिवालय में काम करते रहे थे, वैसे ही यहां केंद्रीय सचिवालय में करने की कोशिश होने
लगी। परंतु इसे असफल होना ही था। मुझे लगता है कि अब यह स्पष्ट हो गया होगा कि मैंने
अन्ना के आंदोलनों से स्वयं को अलग क्यों कर लिया।
बाबा को मिला राजनीतिक समर्थन
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाबा रामदेव का समर्थन करते हुए कहा कि विदेशी
बैंकों में जमा काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर योग गुरु बाबा रामदेव
के आंदोलन के साथ और उसका समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को
लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार है और अगर मुद्दा सही हो और सार्वजनिक हो तो
उसका समर्थन है। इसी समर्थन के कारण जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष शरद यादव ने भी
आंदोलन स्थल पर जाकर उनका मंच साझा किया। नीतीश ने कहा कि ऐसे सार्वजनिक आंदोलनों
का जो भी मजाक बनायेंगे वे खुद एक दिन मजाक बन जायेंगे। बाबा रामदेव के आंदोलन को
सपा के मुलायम सिंह यादव और बसपा के मायावती ने भी समर्थन दिया है। मुलायम सिंह
यादव ने कहा कि जो भी काला धन वापस लाने की बात करेगा हम उसका समर्थन करते हैं। काला
धन वापस आना ही चाहिए चाहे जैसे आए। उधर मायावती ने भी कहा है कि कालाधन वापस आना
ही चाहिए। सरकार को भी इस मामले में कड़े कदम उठाना चाहिए। बहरहाल मायावती राजग
नेताओं को मंच पर आने देने पर बाबा रामदेव की आलोचना की और कहा कि उन्हें किसी भी
राजनीतिक दल को मंच पर नहीं आने देना था। इसकी बजाय सभी राजनीतिक दलों से उन्हें
समर्थन लेना चाहिए था। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने भी अन्ना हजारे और
बाबा रामदेव का समर्थन करते हुए कहा कि हर भारतीय को भ्रष्टाचार के खिलाफ
विरोध-प्रदर्शन करने का लोकतांत्रिक अधिकार हासिल है। हर व्यक्ति को अपने अधिकारों
का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलना चाहिए।
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