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कोरोना वायरसः वैश्विक आपातकाल

कोरोना वायरसः वैश्विक आपातकाल

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 आशुतोष कुमार सिंह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को स्वास्थ्य की दृष्टि से वैश्विक आपातकाल घोषित किया है। चीन में घातक कोरोना वायरस से अब तक 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। लाखों लोग इस वायरस के चपेट में हैं। इस वायरस के बढ़ते प्रकोप से स्वास्थ्य की दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है। भारत सहित तमाम देश इस वायरस से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर जुटे हैं। चीन में चिकित्सा का बड़ा केन्द्र वुहान इस वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित है। सबसे ज्यादा मौतें इसी शहर में हुई हैं। धीरे-धीरे इस वायरस का विस्तार बढ़ता जा रहा है। भारत में भी इस वायरस से संक्रमित कुछ लोगों की पहचान हुई है। यहां पर यह जानना जरूरी है कि कोरोना वायरस विषाणुओं का एक बड़ा समूह है, लेकिन इनमें से केवल छह विषाणु ही लोगों को संक्रमित करते हैं। इसके सामान्य प्रभावों के चलते सर्दी-जुकाम होता है, लेकिन ‘सिवीयर एक्यूट रे...
बदले-बदले से केजरीवाल!

बदले-बदले से केजरीवाल!

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उमेश चतुर्वेदी   लोकसभा चुनावों में भारी पराजय के महज आठ महीने बाद दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज कराने के बाद केजरीवाल एक बार फिर अलग तरह की राजनीति करते नजर आ रहे हैं। बेशक उनकी जीत पिछली बार की तुलना में कम रही, 67 सीटों की बजाय 62 सीटों पर ही उनकी पार्टी जीत पाई, लेकिन 70 सदस्यों वाली विधानसभा के हिसाब से यह फिर भी बड़ी जीत है। इस जीत में निस्संदेह बड़ी भूमिका शाहीनबाग आंदोलन ने भी निभाई। नागरिकता संशोधन कानून को वापस लेने के लिए 15 दिसंबर 2019 को शुरू हुआ आंदोलन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। इसका असर यह हुआ कि मुस्लिम बहुल सभी पांचों सीटों मटिया महल, सीलमपुर, ओखला, बल्लीमारान और मुस्तफाबाद से आम आदमी पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवार भारी मतों से जीते। जाहिर है कि पांचों जगह आम आदमी पार्टी की भारी जीत मुस्लिम मतदाताओं की एकतरफा वोटिंग की वजह से हुई। चुनाव नत...
मुसलमान कब करेंगे महंगाई, बेरोजगारी पर आंदोलन

मुसलमान कब करेंगे महंगाई, बेरोजगारी पर आंदोलन

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संसद ने जब से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को पारित किया है, देश के मुसलमानों का एक हिस्सा नाराज है। कम से कम जगह-जगह धरने प्रदर्शन कर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वे खफा हैं ।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बार-बार भरोसा देने के बाद भी कि इससे देश के मुसलमानों को भयभीत होने की कतई आवश्यकता नहीं है, वे शांत नहीं हो रहे हैं। वे सड़कों पर उतरे हुए हैं। अब दिल्ली में ही देख लीजिए किमुसलमान औरतें शाहीन बाग में सड़क को घेर कर बैठी हैं। उन्हें इस बात की रत्तीभर भी चिंता नहीं है कि उनके धरने के कारण राजधानी के लाखों लोग रोज अपने गंतव्य स्थलों पर कई घंटे देर से पहुंच रहे हैं। खैर,धरना देना तो उनका मौलिक अधिकार है। पर याद नहीं आ रहा कि देश के मुसलमानों ने कभी महंगाई, बेरोजगारी या अपने अपने इलाकों में नए-नए स्कूल, कालेज या अस्पताल खुलवाने आदि की मांगों को लेकर कभीसड़कों पर उतर कर कोई धरना-प्रदर...
दङ्गे-फ़साद की मानसिकता बनाता कौन है?

दङ्गे-फ़साद की मानसिकता बनाता कौन है?

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मैं टीवी आमतौर पर नहीं देखता। परसों कई दिनों बाद देखा। दिल्ली के दङ्गों पर सवेरे एनडीटीवी पर रवीश कुमार की एक रिपोर्ट और शाम को जी-न्यूज़ पर सुधीर चौधरी की एक दूसरी रिपोर्ट। ‘आजतक’ भी खोला, पर वहाँ कुछ दूसरी चीज़ चल रही थी, जिसके ज़िक्र का यहाँ सन्दर्भ नहीं बनता। रवीश कुमार की रिपोर्टिङ्ग आमतौर पर मैं पसन्द करता हूँ, उनका समर्थन भी करता रहा हूँ, पर कल निराशा हाथ लगी। मैं सवेरे नौ बजे के बाद वाली रवीश जी की सिर्फ़ एक रिपोर्ट की बात कर रहा हूँ, इसलिए मेरी बात को सिर्फ़ वहीं तक सीमित करके देखें, क्योंकि हो सकता है कि उन्होंने दूसरी और तरह की कुछ बढ़िया रिपोर्टिङ्ग भी की हो। फिलहाल, रवीश की इस रिपोर्ट को शातिराना ढङ्ग की बेहूदा रिपोर्टिङ्ग कहूँगा। बॉडी लैङ्ग्वेज तक ईमानदार नहीं लग रही थी। ठीक इसके उलट, सुधीर चौधरी की रिपोर्टिङ्ग बढ़िया थी और यह सच को सच की तरह दिखा रही थी। इन दोनों को देखने ...
देश में उपस्थित मिनी पाकिस्तान से हारते दिखे नरेंद्र मोदी

देश में उपस्थित मिनी पाकिस्तान से हारते दिखे नरेंद्र मोदी

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कश्मीर से लगायत दिल्ली, लखनऊ, अहमदाबाद आदि समूचे देश में पुलिस पर पत्थरबाजी कौन लोग और क्यों करते हैं? यह भी क्या किसी से कुछ पूछने की ज़रूरत है? जुमे की नमाज के बाद शहर दर शहर बवाल समूचे भारत में क्यों होता है? मोहर्रम में दंगे क्यों होते हैं? होली और दुर्गा पूजा के विसर्जन जुलूस पर हमला कौन करता है? कभी किसी मंदिर, किसी चर्च, किसी गुरूद्वारे से किसी ख़ास मौके पर या सामान्य मौके पर किसी ने किसी को बवाल या उपद्रव करते हुए देखा हो तो कृपया बताए भी। अपने भाई को क्या बार-बार बताना होता है कि यह हमारा भाई है? तो यह भाईचारा, सौहार्द्र, गंगा-जमुनी तहजीब का पाखंड क्यों हर बार रचा जाता है। यह तो हद्द है। इस हद की बाड़ को तोड़ डालिए। इकबाल, फैज़ अहमद फ़ैज़, जावेद अख्तर, असग़र वजाहत जैसे तमाम-तमाम नायाब रचनाकार भी अंतत: क्यों लीगी और जेहादी जुबान बोलने और लिखने लगते हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मै...
किसने भूमिका तैयार की दिल्ली के दॅंगों की?

किसने भूमिका तैयार की दिल्ली के दॅंगों की?

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अब तो आग की लपटों से बाहर निकल आई है दिल्ली। अब मासूमों को मारने के लिए सड़कों पर उतरे मौत के सौदागर अपना सुनियोजित काम करके पतली गली से निकल चुके हैं। लेकिन, तीन-चार दिनों तक दिल्ली में मानवता बार-बार मरती रही। दर्जनों लोग मार डाले गए और सैकड़ों घायल हुए। हजारों दूकानें और घर राख में तब्दील कर दिए गए। इतना सब कुछ होने के बावजूद अब भी यहां पर ‘मेरा-तुम्हारा’ करने वाले सक्रिय हैं। वे अब भी दुखी हैं इस बात से हैं कि किछ उनके मजहब वाले  भी दंगों में शिकार हुए। उन्हें दूसरे मजहब के मानने वाले मृतकों या घायलों को लेकर किसी तरह का सहानुभूति का भाव ही नहीं है। तो इतना पत्थर दिल बन गये हैं हमारे  समाज के कुछ नकाबपोश। गंगा-जमुनी तहजीब की बातें मानों बेमानी सी ही लगती है।  बहरहाल, दिल्ली के दंगों के लिए एक खास समूह कपिल मिश्र की गिरप्तारी की मांग कर रहा है। उन्हें इन दंगों के लिए दोष दे र...
सरकार और प्रशासन की नाकामी है दिल्ली दंगे

सरकार और प्रशासन की नाकामी है दिल्ली दंगे

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शाहीनबाग़ संयोग या प्रयोग हो सकता है लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान देश की राजधानी में होने वाले दंगे संयोग कतई नहीं हो सकते। अब तक इन दंगों में एक पुलिसकर्मी और एक इंटेलीजेंस कर्मी समेत लगभग 42 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। नागरिकता कानून बनने के बाद 15 दिसंबर से दिल्ली समेत पूरे देश में होने वाला इसका विरोध इस कदर हिंसक रूप भी ले सकता है इसे भांपने में निश्चित ही सरकार और प्रशासन दोनों ही नाकाम रहे। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि सांप्रदायिक हिंसा की इन संवेदनशील परिस्थितियों में भी भारत ही नहीं विश्व भर के मीडिया में इसकेपक्षपातपूर्ण विश्लेषणात्मक विवरण की  भरमार है जबकि इस समय सख्त जरूरत निष्पक्षता और संयम की होती है। देश में अराजकता की ऐसी किसी घटना के बाद सरकार की नाकामी, पुलिस की निष्क्रियता, सत्ता पक्ष का विपक्ष को या विपक्ष का सरकार को दोष देने की राजनीति इस द...
अपरिहार्य ‘हिंदुत्व

अपरिहार्य ‘हिंदुत्व

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  संघ प्रमुख मोहन भागवत का कथन कि 'राष्ट्रवाद’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका मतलब नाज़ी या हिटलर से निकाला जा सकता है, ऐसे में राष्ट्र या राष्ट्रीय जैसे शब्दों को ही प्रमुखता से इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने इस वक्त इस्लामी आतंकवाद, कट्टरपंथ और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे बड़ी चुनौती हैं। दुनिया के सामने जो बड़ी समस्याएं हैं, उनसे सिर्फ भारत ही निजात दिलवा सकता है। हिंदू ही एक ऐसा शब्द है जो भारत को दुनिया के सामने सही तरीके से पेश करता है। भले ही देश में कई धर्म हों, लेकिन हर व्यक्ति एक शब्द से जुड़ा है जो हिंदू है। ये शब्द ही देश की संस्कृति को दुनिया के सामने दर्शाता है। वास्तव में यही भारत, भारतीयता और हिंदुत्व का सही परिचय है- शांतिपूर्ण सह अस्तित्व, मानवतावादी दृष्टिकोण, प्रकृति केंद्रित विकास व सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की अवधारणा। ...
इनकम टैक्स देना शान के खिलाफ क्यो?

इनकम टैक्स देना शान के खिलाफ क्यो?

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अब यह कहने का मन करने लगा है कि हम हिन्दुस्तानियों को अपना इनकम टैक्स अदा करने में बड़ा ही कष्ट होता है। चूंकि,  नौकरीपेशा लोगों का टैक्स तो उनकी सैलरी से ही काट लिया जाता है, पर शेष लोग तो भारी- भरकम कमाने के बाद भी टैक्स देने से बचते ही रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में इस मसले की निशानदेही भी की थी। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि देश के सिर्फ 22,00 पेशेवरों ने साल 2019 के दौरान अपनी आय एक करोड़ रुपए से अधिक दिखाई। सच में यह आंकड़ा 130 करोड की आबादी वाले देश में तो बेहद छोटा ही नजर आता है। हालांकि उनके बयान पर कुछ हलकों में नाहक बवाल भी काटा गया। उसकी मीनमेख भी निकाली गई। मोदी का पेशेवरों से मतलब डाक्टरों, चार्टर्ड एकाउंटेटों,वकीलों आदि से था। दरअसल साल 2018-19 के दौरान भरी गई इनकम टैक्स रिटर्नों से पता चलता है कि मात्र कुल 5.78 करोड़ हिन्दुस्तानियों  ने ही अपन...
प्रारंभिक शिक्षा तो मातृभाषा में ही हो

प्रारंभिक शिक्षा तो मातृभाषा में ही हो

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निश्चित रूप से भाषा धरती की होती है, न किकिसी धर्म या फिरके की। पर इस छोटे से तथ्य की लम्बे समय से अनदेखी होती रही है। इसके अनेकों घातक परिणामभी सामने आए हैं। इसी तरह से किसी धर्म या वर्ग विशेष के ऊपर कभी कोई भाषा को थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।  बल्कि, हर बच्चे को उसकी अपनीमातृभाषा में पढ़ने का स्वाभाविक अधिकार मिलना चाहिए। याद रखा जाना चाहिए कि बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे आराम से किसी भी तरह की पढाई सीखता है,किसी भी तरह के ज्ञान को ग्रहण करता है। अच्छी बात यह है कि भारत में सभी जुबानों के प्रसार- प्रचार में सरकार सक्रिय रहती है। इसलिए भारत में भाषा के सवाल लगभग सर्वमान्य हो गए हैं। पर बीच-बीचमें कुछ राज्यों में कभी –कभी हिन्दी विरोधी स्वर सुनाई देने लगते हैं। हालांकि, हिन्दी को अब कहीं कोई थोप नहीं रहा। हिन्दी स्वाभाविक रूप से सर्वग्राह्य देश कीसर्वमान्य बोलचाल की भाषा के रूप में उभ...