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जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का पुनर्वास व मुस्लिम घुसपैठ

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का पुनर्वास व मुस्लिम घुसपैठ

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  यह कितनी पक्षपातपूर्ण कुटिलता है कि पुनर्वास नीति के अंतर्गत 20-25 वर्षों से आतंकी बने हुए कश्मीरी जो पीओके व पाकिस्तान में शरण लिये हुए थे/हैं को धीरे-धीरे वापस ला कर पुन: कश्मीर में लाखों रुपये व नौकरियां देकर बसाया जा रहा है। ये आतंकी अपनी नई पाकिस्तानी पत्नी व बच्चों के साथ वापस आकर कश्मीर की मुस्लिम जनसंख्या और बढ़ा रहे हैं। इनको संपूर्ण नागरिक अधिकार व अन्य विशेषाधिकार मिल जाते हैं। मुख्यधारा में लाने के नाम पर इन कश्मीरी आतंकियों को हथियार छोडऩे पर उस हथियार के अनुसार अलग अलग राशि भी दी जाती है। फिर भी यह सुनिश्चित नहीं रहता कि ऐसे वापसी करने वाले आतंकी कब पुन: आतंक की दुनिया मे लौट जाएंगे! राष्ट्रीय सहारा में छपे 27 मार्च 2013 के समाचार के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की विधान सभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि ''जम्मू-कश्मीर में सन् 1...
सांसद बनने की फिराक मेंसेना को बलात्कारी कहने वाला कन्हैया

सांसद बनने की फिराक मेंसेना को बलात्कारी कहने वाला कन्हैया

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कन्हैया कुमार अब बिहार की बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहा है। वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) का उम्मीदवार है। यह वही कन्हैया कुमार है, भारतीय सेना को बलात्कारी कहने से भी पीछे नहीं हटता। वो बार-बार कहता रहा है कि भारतीय सेना कश्मीर में बलात्कारों में लिप्त है। जरा सोचिए कि कन्हैया कुमार को अगर राष्ट्रकवि “दिनकर” की धरती बेगूसराय लोकसभा में निर्वाचित करके भेजती है तो राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” की आत्मा पर क्या गुजरेगी। बाकी किसी को जिताओ, एतराज नहीं, पर वतन के रखवालों के खिलाफ़ शर्मनाक बयानबाजी करने वाले कन्हैया को जिताना तो लोकतान्त्रिक अपराध होगा। भारतीय सेना पर कश्मीर में रेप जैसा जघन्य आरोप लगाने वाले कन्हैया कुमार के आरोप को देखने के लिए आप यू ट्यूब का सहारा भी ले सकते हैं। यानी वो यह तो कह ही नहीं कह सकता कि उसने भारतीय सेना पर कभी इतना गंभीर आरोप नहीं लगाया। उससे यह ...
दक्षिण में है अलग तरह का  राष्ट्रवाद

दक्षिण में है अलग तरह का राष्ट्रवाद

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  एक तरफ जहां उत्तर भारत में सर्जिकल अटैक और पाकिस्तान के अंदर घुस कर प्रहार करना राष्ट्रवाद की भावना को बलवती कर रहा है वहीं दूसरी तरफ दक्षिण के राज्यों में यह विषय चुनावी विमर्श का विषय नहीं बन पा रहा है। उत्तर भारत की राजनीति भावनात्मक रूप से चलती है तो दक्षिण के राज्यों की राजनीति विशुद्ध व्यक्तिगत स्वार्थों पर। दक्षिण के राज्यों में यह भावना पायी जाती है कि उत्तर भारतीय लोग उनका राजनीतिक अतिक्रमण करते रहते हैं। चूंकि भारत के प्रधानमंत्री अधिकतर उत्तर भारत से ही रहे हैं इसलिए उनकी इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता है। वर्तमान में गुजरात से आने वाले प्रधानमंत्री मोदी भी बनारस से जीत कर लोकसभा में पहुंचे हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द भी उत्तर प्रदेश से आते हैं। ऐसे में दक्षिण के राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के मुद्दे उत्तर भारत के चुनावी मुद्दों से अलग हैं। दक्षिण में अभी भी क्षे...
राष्ट्रवाद की  अग्निपरीक्षा

राष्ट्रवाद की अग्निपरीक्षा

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  2019 का लोकसभा चुनाव मोदी के राष्ट्रवाद पर आकर टिक गया है। एक ओर मोदी की मजबूत राष्ट्रवाद की परिकल्पना है तो दूसरी तरफ कमजोर विपक्ष है। एक तरफ मोदी के द्वारा पांच साल में कराये गए कार्यों की रूपरेखा है तो दूसरी तरफ इस दौरान पूरी तरह बिखर चुका विपक्ष है। एक तरफ अबकी बार 400 पार का नारा है तो दूसरी तरफ महागठबंधन के जरिये स्वयं को जीवित रखने के लिए संघर्ष करता विपक्ष है। इन सबके बीच 'मैं भी चौकीदार’ का नारा लगाते भाजपाई सिर्फ और सिर्फ मोदी के नाम को जपते दिख रहे हैं। चाय से चौकीदार का यह खेल खेलने में मोदी की टीम सफल होती दिख रही है। 2014 में अपने शपथ ग्रहण के दौरान मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रतिनिधियों को बुलाकर एक नयी तरह की मोदी कूटनीति की शुरुआत की थी। अभिनंदन की समय से वापसी उसी कूटनीति का एक परिणाम थी। इस समय सभी इस्लामिक देश भारत के साथ दिखाई दे रहे हैं। समय के साथ साथ मोदी...
तो क्या मारे जाते रहेंगे ईमानदार सरकारी कर्मचारी

तो क्या मारे जाते रहेंगे ईमानदार सरकारी कर्मचारी

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पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ से सटे खरड़शहर मेंविगत दिनों जोनल लाइसेंसिंग अथॉरिटी में अधिकारी नेहा शौरी की उनके दफ्तर में ही दिन दहाड़े गोली मार कर की गई हत्याने सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ जैसे ईमानदार सरकारी अफसरों की नृशंस हत्यायों की यादें ताजा कर दी। नेहा शौरी  एक बेहद मेहनती और कर्तव्य परायण सरकारी अफसर थीं। बेईमानों को कभी छोड़ती नहीं थीं। इसका खामियाजा उन्हें जान देकर देना पड़ा।कहा जा रहा है किसन 2009 में जब नेहा रोपड़ में तैनात थीं, उस दौरान उन्होंने आरोपी के मेडिकल स्टोर पर छापेमारी की थी और घोर अनियमितताओं को पाकर उसका लाइसेंस कैंसिल कर दिया था। इसी का बदला लेने के लिए आरोपी उनपर सुनियोजित हत्या के मकसद से हमला किया। तो नेहा की हत्या ने एक बार फिर से यह सिद्ध कर दिया है कि अब इस देश में ईमानदारी से काम करना कठिन होता जा रहा है। अगर सरकारी बाबू ईमानदार नहीं होगा तो उसे मार दिया जाएगा या...
तो नाम लेवा तक नहीं रहेगा लेफ्ट दलों का

तो नाम लेवा तक नहीं रहेगा लेफ्ट दलों का

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लेफ्ट पार्टियों को लेकर इस चुनावी माहौल के कोलाहाल में किसी तरह की कोई खास हलचल सामने नहीं आ रही है। हां,बिहार में बेगूसराय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(भाकपा) ने कन्हैया कुमार को टिकट जरूर दे दिया है।  फिलहाल लेफ्ट दलों से कोई भी अन्य दल  सीटों कातालमेल करने के लिए भी तैयार नहीं है। चार लेफ्ट पार्टियों को 2004 के लोकसभा चुनावों में 59 सीटों पर विजय हासिल हुई थी। लोकसभा चुनावों में वह शायद वामपंथी पार्टियों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। पर 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे मात्र 11सीटें ही मिलीं। एक तरह से कहा जा सकता है कि उन्हें देश के मतदाता ने धूल चटा मिला दिया । उसके बाद से लेफ्ट पार्टियों के सीताराम येचुरी, डी.राजा और वृंदा करात जैसे नेता सिर्फ सेमिनार सर्किट में ही देखे जाते हैं। वहां पर ये अपने विचार व्यक्त करके खुश हो जाते हैं। ये अंतिम  बार कब श्रमिक, किसान या गरीब-गुरुबा के हक में ल़ड...
चुनाव, राष्ट्रवाद और राजनीति

चुनाव, राष्ट्रवाद और राजनीति

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देश का राजनीतिक माहौल नए रंग ले रहा है। वजह घिसे पिटे चुनावी नारों व मुद्दों का हवा हो जाना है। देश की जनता आंदोलित है। वजह देश की सुरक्षा, राष्ट्रीय अस्मिता, स्वाभिमान व सेना के शौर्य जैसे संवेदनशील मुद्दों का हावी हो जाना है। पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद बालकोट में वायुसेना की सर्जिकल स्ट्राइक व विंग कमांडर अभिरंजन कुमार प्रकरण में मिली भारतीय राजनय को मिली जय विपक्षी पार्टियों को पच नहीं रही है। उनकी खिसकती राजनीतिक जमीन के बीच कश्मीर में अलगाववादी नेताओं व संगठनों, बर्मा में उत्तर पूर्व के अलगाववादी व आतंकवादी नेताओं व संगठनों व अंतरिक्ष में भी सर्जिकल स्ट्राइक की क्षमता हासिल करने की खबरों ने दुश्मनों व महा शक्तियों को हिला दिया और लोकसभा चुनावों के चढ़ते माहौल के बीच विपक्षी पार्टियों की राजनीति को बेरंग कर दिया। अब पूरा देश आंदोलित है व राष्ट्ररक्षा व सेना के शौर्य व बलिदान के मुद्...
कल तक वो रीना थी लेकिन आज “रेहाना” है

कल तक वो रीना थी लेकिन आज “रेहाना” है

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दिन की शुरुआत अखबार में छपी खबरों से करना आज लगभग हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन कुछ खबरें सोचने के लिए मजबूर कर जाती हैं कि क्या आज के इस तथाकथित सभ्य समाज में भी मनुष्य इतना बेबस हो सकता है? क्या हमने कभी खबर के पार जाकर यह सोचने की कोशिश की है कि क्या बीती होगी उस 12 साल की बच्ची पर जो हर रोज़ बेफिक्र होकर अपने घर के आंगन में खेलती थी लेकिन एक रोज़ उसका अपना ही आंगन उसके लिए महफूज़ नहीं रह जाता? आखिर क्यों उस आंगन में एक दिन यकायक एक तूफान आता है और उसका जीवन बदल जाता है?  वो बच्ची जो अपने माता पिता के द्वारा दिए नाम से खुद को पहचानती थी आज वो नाम ही उसके लिए बेगाना हो गया। सिर्फ नाम ही नहीं पहचान भी पराई हो गई। कल तक वो रीना थी लेकिन आज "रेहाना" है। सिर्फ पहचान ही नहीं उसकी जिंदगी भी बदल गई। कल तक उसके सिर पर पिता का साया था और भाई का प्यार था लेकिन आज उसके पास एक  "शौहर" है। ...
सरकार बनाने से पहले हजारों करोड़ का घोटाला?

सरकार बनाने से पहले हजारों करोड़ का घोटाला?

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क्या कांग्रेस गरीबों को न्याय दिलाने के नाम पर फर्जी आंकड़ा बताकर चुनाव के पहले ही भविष्य में घोटाला करने की तैयारी कर रही है? 5 करोड़ परिवारों को 12 हजार रूपए प्रति माह देने के लिए साल में साढ़े तीन लाख करोड़ का भार पड़ने की संभावना जताई जा रही, जबकि गरीब परिवारों की संख्या मात्र पांचवां हिस्सा, 1 करोड़ के करीब है। ऐसे में क्या ढ़ाई लाख करोड़ का घोटाला करने की रणनीति बनाई जा रही है? लोकसभा चुनाव में मतदाताओं को रिझाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने घोषणा की है कि जब सरकार बनेगी तो देश के 20 प्रतिशत आबादी जो ग़रीबी रेखा के नीचे रहती है याने 5% परिवार को प्रति माह 12,000 ₹ की दर से न्यूनतम वेतन की गारंटी दी जाएगी। कांग्रेस पार्टी से न्याय योजना के रूप में प्रचारित कर रही है लेकिन इस योजना में गंभीर त्रुटियां है सबसे बड़ी त्रुटि ग़रीबी रेखा के बीच रहने वाले लोगों की संख्या को लेकर है। रंगराजन स...
आचरण से वामपंथी और भाषणो में लोकतांत्रिक

आचरण से वामपंथी और भाषणो में लोकतांत्रिक

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आपको लगता है कि ममता बनर्जी के शासन संभालने के बाद बंगाल में वामपंथी शासन समाप्त हो गया था? यही बात अखिलेश शासन काल के लिये सोच कर देखिये, क्या वह एक लोकतांत्रिक दल होने के नाते समाजवादी विचारधारा पर काम कर रहा था? यही बात मध्य प्रदेश और राजस्थान की नई सरकार के बारे में विचार कर के देखें, क्या वो गांधी जी या शास्त्री जी वाली कांग्रेस की किसी भी विचारधारा से मेल खाते हुए शासन कर रहे हैं? कर्नाटक सरकार का शासन लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए शासन चला रहा है?  इन सब पर विचार करें तो यही आभास होता है कि लोकतांत्रिक दल होने के बाद भी इनकी कार्यशैली में वामपंथ ने तेजी से पैर पसार लिये हैं। लोकतंत्र का विलाप करने वाले अक्सर ‘जनता का, जनता के लिये, जनता के द्वारा’ का नारा लगाते हैं, क्या पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश की सत्ता के निर्णयों में इस सद्वाक्य का कोई भी आभास लगता ...