बढ़ते प्रदूषण में यज्ञ परम्परा का योगदान
यज्ञ हमारी भारतीय संस्कृति में वैदिक काल से चला आ रहा एक धार्मिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है। यज्ञ परम्परा का वर्णन हमारे प्राचीन वैदिक ग्रन्थों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में सविस्तार उपलब्ध होता है। सर्वाधिक वर्णन यजुर्वेद में प्राप्त होता है। प्राचीन समय में प्राकृतिक विपदाओं से बचने, अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने और तत्कालीन प्राकृतिक देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बहुतायत से यज्ञ किए जाते थे। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार ब्रह्माजी ने मानव को सहयोग देकर यज्ञ परम्परा को प्रारम्भ किया। ऋग्वेद में कहा गया है ‘अग्रिमीडे पुरोहितं।Ó अग्रि को यज्ञ के मुँह की संज्ञा दी गई है अत: अग्रि में आहूति दी जाती है। यज्ञ ही विद्वानों के अनुसार श्रेष्ठतम कर्म है। गायत्री को माता तथा यज्ञ को पिता कहा गया है। विद्वानों ने यह भी कहा है ‘यज्ञो वै विष्णु:
वैदिककालीन प्राकृतिक शक्तियाँ जिन्हें देवत्व का स्वरूप दिया गया-
१. अग्रि – अग्नि के मुँह के रूप में स्वीकार किया गया। इसी में यज्ञ की बलि दी जाती है।
२. इन्द्र – इन्हें युद्ध का देवता माना जाता था। वर्षा और आकाशीय विद्युत के वे संवाहक थे।
३. सोम – यह एक प्रकार का औषधीय पौधा है। इससे एक पेय पदार्थ तैयार कर इसे इन्द्र को समर्पित किया जाता था। वर्तमान में भी सोम यज्ञ मेें इस प्रकार के पेय का निर्माण करते समय उसमें विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों का मिश्रण कर यज्ञ किया जाता है।
४. सूर्य – इससे सृष्टि को प्रकाश और ऊर्जा प्राप्त होती है, इसलिए यह इनका देवता है।
५. वायु – हवा का देवता है।
६. मरुत – तूफान के देवता हैं। इनके कुपित होने पर हाहाकार मच जाता है।
७. अश्विनी कुमार – इनकी संख्या दो है। ये सभी के चिकित्सक और शल्य क्रिया विशेषज्ञ माने गए हैं।
८. उषा – ये भोर (प्रात:काल, विद्वान) की देवी हैं।
९. पृथ्वी – इसे भूमि की देवी की संज्ञा दी गई है।
१०. अदिति – इन्हें देवताओं की माता माना गया है।
११. पूषण – ये पशुओं के देवता माने गए हैं।
ये सभी दैवीय शक्तियों के देवता हैं। इनमें से कुछ ऋग्वेदीय देवता तथा कुछ उत्तर वैदिककालीन देवता हैं।
यज्ञ में उपयोग की जाने वाली सामग्री – गाय का शुद्ध घी, कपूर, जौ, तिल, गूगल, चन्दन चूर्ण, जड़ी बूटी आदि। समिधा- पलाश, चन्दन, आम, गूलर, बड़ आदि पवित्र वृक्षों की लकड़ियों का यज्ञ में हवन करते समय उपयोग किया जाता है जिन्हें समिधा कहते हैं। यज्ञ वेदी का निर्माण या हवन पात्र, गाय का शुद्ध घी, शहद, शकर या मिश्री, कलश, आम्र पत्र, रांगोली, लाल वस्त्र, दीपक, मौली, रोली, अक्षत, पूजन सामग्री, ताम्बूल, लकड़ी का लम्बा चम्मच, जिसे स्त्रुआ कहते हैं। बैठेने के आसन और ताम्रपत्र।
यज्ञ से लाभ – यज्ञ में विभिन्न सामग्री की आहूति देने से जो धुआँ उठता है वह पर्यावरण को शुद्ध करता है। वातावरण में फैली अशुद्धियों को शुद्ध करता है। मलमूत्र की गंध को शुद्ध करता है। सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करता है। वातावरण में फैली अशुद्धि को शुद्ध करता है। मृत जीव जन्तुओं से फैली अशुद्धि को दूर करता है। आचार्य मनु का कथन है कि यज्ञ एक चिकित्सकीय पद्धति है। यह सरल और उपयोगी है। इससे रोगों के विषाणु नष्ट होते हैं। विषैली गेसें नष्ट होती हैं। यज्ञ वर्षा में भी सहायक है। मनु महाराज आगे कहते हैं- ‘ऋषि यज्ञं, देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा। नृपयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति: समाचरेत्।
वर्तमान समय में अत्यधिक प्रदूषण फैला हुआ है। वाहनों से निकलने वाले धुएँ से शुद्ध प्राण वायु मानव को प्राप्त नहीं हो रही है। खेतों में जलाई जाने वाली पराली, कारखानों से उठने वाले हानिकारक धुआं, विमानों से अशुद्ध गैस का फैलना, परमाणु परीक्षण से दूषित वायु मण्डल, विज्ञान के नित नूतन परीक्षण से पर्यावरण को अत्यधिक दूषित कर रखा है, कचरे से फैलने वाला प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि का क्षरण, अल्पवृष्टि, अनावृष्टि, अति वृष्टि, हरे भरे वृक्षों को मार्ग चौड़ीकरण के लिए काटना, सीमेंट से निर्मित उच्च अट्टालिकाएँ भी वायु मंडल को दूषित कर रही हैं। बड़ी संख्या में यज्ञ का आश्रय लेकर वातावरण को शुद्ध किया जा सकता है।
भारत में प्रतिदिन तो नहीं परन्तु प्रत्येक शुभ कार्य में यज्ञ किया जाना अनिवार्य है। नूतन गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार, पुत्रेष्टि यज्ञ आदि अनेक ऐसे आयोजन हैं, जिसमें यज्ञ अवश्य ही किया जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में यज्ञ को औषधि के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। यज्ञ से शरीर और आत्मा शुद्ध होती है। वर्तमान समय में वैज्ञानिक भी यज्ञ से उठने वाले धुएँ की उपयोगिता पर खोज कर रहे हैं। वे भी इस निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं कि पर्यावरण की शुद्धि के लिए यज्ञ अति आवश्यक है।
प्राचीन समय में अश्वमेघ यज्ञ, राजसूय यज्ञ, पेय यज्ञ, हविर् यज्ञ आदि किए जाते थे। इनमें राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर राज्य का विस्तार करते थे। वर्तमान समय में ब्रह्म यज्ञ, देवयज्ञ, पितृ यज्ञ, बलि वैश्व देव यज्ञ, सोम यज्ञ, अतिथि यज्ञ आदि किए जाते हैं।
हम सभी सनातन धर्मावलंबियों को चाहिए कि यदि वे प्रतिदिन हवन नहीं कर सकते हों तो माह में एक बार कोई भी एक दिन निश्चित करके हवन अवश्य करें। आधुनिक समय में तो विभिन्न धातुओं के हवन पात्र भी बाजार में उपलब्ध हैं। हवन सामग्री भी बाजार से क्रय की जा सकती है। घर में हवन करने से नकारात्मक ऊर्जा, सूक्ष्म कीटाणुओं तथा रोगाणुओं को नष्ट किया जा सकता है। इससे घर के सदस्यों की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ेगी और नीरोगी काया रहेगी। हवन के महत्व को समझकर हमें उचित निर्णय लेना चाहिए।
हमारी संस्कृति में आज भी प्रत्येक घर में सुबह पूजने के पश्चात शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर आरती की जाती है। इसीप्रकार सायंकाल के समय भी निर्धारित अवधि में तुलसीजी को दीपक तथा भगवान की आरती की जाती है। इससे भी परिवार में सकारात्मकता का आगमन होता है।
यह सनातन धर्मावलंबियों के लिए हर्ष का विषय है कि भारत के प्रमुख मंदिरों में समय-समय पर १००८ कुण्डीय विशाल यज्ञ समारोहों का आयोजन किया जाता है जिसमें वृद्धजनों के साथ ही युवा पीढ़ी भी अपनी आहूति बड़ी श्रद्धा के साथ देकर पर्यावरण को शुद्ध करने में अपना योगदान देते हैं।
