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साहित्य संवाद

युग परिवर्तन का वाहक है युवा या नवचेतना का संवाहक है युवा

युग परिवर्तन का वाहक है युवा या नवचेतना का संवाहक है युवा

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, सामाजिक, साहित्य संवाद
डॉ. शंकर सुवन सिंहयुवा शब्द युवक से लिया गया है। एक जवान व्यक्ति को युवा कहा जाता है किसी भी व्यक्ति का महत्व उसकेगौरव (भारीपन) में होता है। व्यक्ति का गौरव उसके युवापन में ही होता है। जवान अर्थात जव-आन (जिसकागौरव गतिशील हो वही जवान है) अर्थात जिसकी शान में गतिशीलता हो। ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण मेंचरैवेति शब्द का उल्लेख मिलता है जिसका अर्थ है चलते रहो। भारत की संस्कृति चरैवेति-चरैवेति के सिद्धांतपर आधारित है। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को सत्कर्मो में संलिप्त रहना चाहिए और अपने कर्मो कोबिना किसी फल की चिंता किये हुए करते रहना चाहिए। किसी भी व्यक्ति का गौरव उसके विचारों से नापाजाता है। तभी तो कहा गया है मन चंगा तो कठौती में गंगा अर्थात अगर व्यक्ति का मन शुद्ध है, किसी काम कोकरने की उसकी नीयत अच्छी है तो उसका हर कार्य गंगा के समान पवित्र है। संत कबीर ने कहा था मन केहारे हार है और मन ...
हिंदी नवजागरण के जनक : भारतेंदु हरिश्चंद्र

हिंदी नवजागरण के जनक : भारतेंदु हरिश्चंद्र

साहित्य संवाद
6 जनवरी, 1885 / पुण्यतिथि हिंदी साहित्य के इतिहास को चार भागों में बाँटा गया है :  ( 1 ) वीरगाथा काल,  ( 2 ) भक्ति काल,  ( 3 ) रीति काल  तथा ( 4 ) नवजागरण काल।  नवजागरण काल को ‘भारतेंदु युग’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसका नामकरण भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर हुआ है।  9 सितंबर 1850 को काशी में जन्मे भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी के जनक हैं। हिंदी खड़ी बोली में गद्य का प्रारंभ उन्हीं के समय से होता है।    भारतेंदु के समय देश अंग्रेजों के चंगुल में था।  हिंदी काव्य-जगत में रीतिकाल और सामंती प्रवृत्ति चरम पर थी, लेकिन उन्होंने  अपनी रचनाओं में जन-भावनाओं को रेखांकित किया। विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक विसंगतियों को उजागर करते हुए समाज-सुधार को साहित्य का लक्ष्य बनाया। ग़रीबी, पराधीनता और अंग्रेजों का अमानवीय व्यवहा...
अंग्रेजी गुड़क रही अब नीचे

अंग्रेजी गुड़क रही अब नीचे

विश्लेषण, साहित्य संवाद
भारत से अंग्रेजों को विदा हुए तो 75 वर्ष हो गए लेकिन भारत के भद्रलोक पर आज भी अंग्रेजी सवार है। देश का राज-काज, संसद का कानून, अदालतों के फैसलों और ऊँची नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। ज्यों ही इंटरनेट, मोबाइल फोन और वेबसाइट का दौर चला, लोगों को लगा कि अब हिंदी और भारतीय भाषाओं की कब्र खुद कर ही रहेगी। ये सब आधुनिक तकनीकें अमेरिका और यूरोप में से उपजी हैं। वहाँ अंग्रेजी का बोलबाला है। ये तकनीकें भारत में भी तूफान की तरह फैल रही थीं। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे लेकिन मोबाइल फोन, इंटरनेट या वेबसाइटों का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्हें मजबूरन अंग्रेजी (कामचलाऊ) सीखनी पड़ती थी लेकिन भारत के भद्रलोक को अब पता चला है कि उल्टे बाँस बरेली पहुंच गए हैं। हिंदी के श्रेष्ठ अखबार ‘भास्कर’ ने जो ताजातरीन सर्वेक्षण छापा है, वह भारतीय भाषा प्रेमियों को गदगदायमान कर रहा है। उसके अनुसार देश क...
मैंने उठते बैठते राम को ही जाना।

मैंने उठते बैठते राम को ही जाना।

धर्म, साहित्य संवाद
जबसे पैदा हुए, बड़े हुए, संस्कार मार्जन होता रहा और भगवान राम जी के आदर्शों व कर्ममय जीवन का अनुसरण करते हम सब बढ़ते रहे। कोई भी हिन्दू बिना राम जी के हिन्दू कैसे रह पायेगा ? जो अपने माई बाप को माई बाप न माने उसके वजूद को क्या कहेंगे फिर.... लेकिन हिंदीपट्टी क्षेत्र में जितने सर्जक व संस्कृतिकर्मी दिखेंगे आपको सब पिता से द्रोह करने वाले, मातृहन्ता दिखेंगे ! बड़े बड़े नामवरी पुरुषों का तथाकथित जनवाद व प्रगतिशील आडम्बरी उद्घोष ऐसे ही निर्मूल दिखेगा ! एक बड़े प्रपंचक का उदाहरण देखिए लिखे दे रहा हूँ : मुझे ज्ञानपीठ पुरस्कर्ता, कविवर कुंवरनारायण की तरह पाखण्ड नहीं रचना है कि ['अयोध्या 1992'] लिखकर वाल्मीकि और राम जी का करुण विलाप चित्रित करते हुए पूरे सन्दर्भ को एक खूबसूरत मक्कारी भरे लहजे में याद करूँ।  बाबरी विध्वंस पर बुक्का फाड़कर रोऊँ और 1992 ईस्वी से 464 वर्...
 इतिहास के दो स्वर्णिम व प्रेरणादायक पत्र ॥ 

 इतिहास के दो स्वर्णिम व प्रेरणादायक पत्र ॥ 

विश्लेषण, साहित्य संवाद
भारतीय इतिहास में दो ऐसे पत्र मिलते हैं जिन्हें दो विख्यात महापुरुषों (शिवाजी और गुरु गोविन्द सिंह) ने दो कुख्यात व्यक्तिओं (औरंगज़ेब और जयसिंह) को लिखे थे। इनमे पहिला पत्र "जफरनामा" कहलाता है जिसे श्री गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को भाई दया सिंह के हाथों भेजा था। यह दशम ग्रन्थ में शामिल है जिसमे कुल 130 पद हैं।  दूसरा पत्र छ्त्रपति शिवाजी ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा था जो उसे 3 मार्च 1665 को मिल गया था। इन दोनों पत्रों में यह समानताएं हैं की दोनों फारसी भाषा में शेर के रूप में लिखे गए हैं। दोनों की पृष्टभूमि और विषय एक जैसी है। दोनों में देश और धर्म के प्रति अटूट प्रेम प्रकट किया गया है। शिवाजी पत्र बरसों तक पटना साहेब के गुरुद्वारे के ग्रंथागार में रखा रहा। बाद में उसे "बाबू जगन्नाथ रत्नाकर" ने सन 1909 अप्रैल में काशी में काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित किया था। बाद में अ...
जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’

जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’

TOP STORIES, साहित्य संवाद
पुस्तक समीक्षा : कमलेश कमल ***************************** आचार्य शुक्ल ने लिखा था कि ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के आवरण चढ़ते जाएँगे, त्यों-त्यों कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी। विडंबना ही कही जाएगी कि जीवनोपयोगी और मानवमात्र के कल्याण के लिए समझी जाने वाली विधा 'कविता' पर कलम चलाने वाले आज सबसे अधिक हैं, लेकिन उनके द्वारा लिखी हुई कविताओं को पढ़कर पाठक को ऐसा लगता नहीं कि उन्हें इन कविताओं की किञ्चित् भी आवश्यकता है। अस्तु, कवित्वविहीन कविता के इस दुर्धर्ष काल में जब इंटर बटन दबा-दबाकर मिनटों में कविताएँ लिखी जा रही हों एवं आत्ममुग्धता के उच्छवास को साहित्य-सर्जना समझ लिया जाता हो; किसी शोधपूर्ण एवं गंभीर साहित्यिक ग्रंथ का प्रणयन किसी बड़ी साहित्यिक-परिघटना से कम नहीं है।  जिम्मेदारीपूर्वक कहना चाहूँगा कि आज के साहित्यिक-परिदृश्य में बहुत कम पक्वधी साहित्यकार ...
जरूरत है, चरित्र शिक्षा की  जिम्मेदार नागरिक होने के लिए।

जरूरत है, चरित्र शिक्षा की  जिम्मेदार नागरिक होने के लिए।

EXCLUSIVE NEWS, राज्य, विश्लेषण, साहित्य संवाद
नैतिकता के बिना शिक्षा बिना दिशासूचक जहाज की तरह है, जो कहीं भटक रहा है। एकाग्रता की शक्ति होना ही काफी नहीं है, बल्कि हमारे पास योग्य उद्देश्य होने चाहिए जिन पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। सत्य को जानना ही काफी नहीं है, बल्कि हमें सत्य से प्रेम करना चाहिए और उसके लिए त्याग करना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई कितना शिक्षित या धनवान है, यदि उसके अंतर्निहित चरित्र या व्यक्तित्व में नैतिकता का अभाव है। वास्तव में ऐसे व्यक्तित्व शांतिपूर्ण समाज के लिए खतरा हो सकते हैं। उदाहरण: मुसोलिनी, हिटलर सभी नैतिकता से रहित शिक्षा के उदाहरण हैं जो मानव जाति को उनके विनाश की ओर ले जा रही है। समकालीन समय में यह समान रूप से प्रासंगिक है। -प्रियंका सौरभ “एक बुरा चरित्र एक पंचर टायर की तरह है; जब तक आप इसे बदल नहीं लेते तब तक आप कहीं नहीं जा सकते।"  शिक्षा एक बच्चे के एक पूर्ण वयस्क बनन...
भारत इस दकियानूसी हवा से महफूज रहे

भारत इस दकियानूसी हवा से महफूज रहे

राष्ट्रीय, साहित्य संवाद
अफगानिस्तान से चली दकियानूसी हवा का झोंका भारत भी आ सकता है, दुआ कीजिये भारत इससे महफूज रहे |खुद को अफगानिस्तान का हमदर्द बताने वाला पाकिस्तान भी तालिबान के इस कदम से परेशान है।अफगानिस्तान में महिलाओं के लिये विश्वविद्यालय के दरवाजे बंद करने की  वैसे तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में निंदा हो रही है। लेकिन इसके बावजूद तालिबानी शिक्षा मंत्री अपने फैसले के पक्ष में कुतर्क दे रहे हैं कि ये शिक्षा इस्लामिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। इस फैसले से छात्राओं में घोर निराशा है,उन्हें लगता है कि उनके भविष्य का पुल तालिबान ने बारूद से उड़ा दिया है। बीते मंगलवार को तालिबान  द्वारा की गई घोषणा पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। बीते वर्ष अगस्त में जब तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया था तो दलील दी गई थी कि पिछले तालिबानी दौर के प्रतिबंधों की पुनरावृत्ति नहीं...
मुफ्त अनाजः बहुत अच्छा लेकिन….?*

मुफ्त अनाजः बहुत अच्छा लेकिन….?*

राज्य, साहित्य संवाद
*डॉ. वेदप्रताप वैदिक* देश के 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और लगभग 25 लाख पूर्व सैनिकों को पेंशन में फायदे की घोषणा, जो सरकार ने अभी-अभी की है, उसका कौन स्वागत नहीं करेगा? ऐसी घोषणा अब से पहले किसी सरकार ने की हो, मुझे याद नहीं पड़ता। पिछली सरकारों ने संकट-कालों में तरह-तरह की रियायतों की घोषणाएं जरूर की हैं लेकिन 80 करोड़ लोगों को साल भर तक 35 किलो अनाज मुफ्त मिलेगा, यह बहुत बड़ी सौगात है। कोराना-काल के दो वर्षों में भी सरकार ने असमर्थ लोगों को एकदम कम दाम पर अनाज देकर काफी मदद पहुंचाई थी लेकिन अब उन्हें भी वह अनाज मुफ्त मिला करेगा। आप यह पूछ सकते हैं कि इतना अनाज सरकार मुफ्त में बांट देगी लेकिन वह इसे करेगी कैसे? इस समय सरकारी भंडार में लगभग 4 करोड़ टन अनाज भरा पड़ा है। उसे अपने लोगों का पेट भरने के लिए विदेशों के आगे झोली फैलाने की जरूरत नहीं है। इंदिरा गांधी राज के वे दिन अब नही...
भारत में शिक्षा का सुधार अत्यन्त आवश्यक*

भारत में शिक्षा का सुधार अत्यन्त आवश्यक*

TOP STORIES, विश्लेषण, साहित्य संवाद
शिक्षा देश की रीढ़ की हड्डी होती है। किसी भी देश की प्रगति तथा वहाँ के नागरिकों का भविष्य वहाँ की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ही निर्भर करता है। भारत सरकार इस तथ्य से भली-भांति परिचित है इसीलिए शिक्षा नीति के अन्तर्गत समय-समय पर परिवर्तन किए जाते रहें हैं। नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत शिक्षा को 5 + 3 + 3 + 4 के चरणों में बांटा गया है। पूर्व प्राथमिक स्तर 3 वर्ष एवं कक्षा 1 व 2 को आधारभूत शिक्षा के अन्तर्गत रखा गया है जिसमें 3 से 5 वर्ष तक के बच्चों को बिना किसी बस्ते के बोझ के खेल-कूद के माध्यम से शिक्षा के प्रति रूचि बढ़ाने का प्रयास किया गया है। 6 से 8 वर्ष की अवस्था में बच्चे की औपचारिक शिक्षा को आरम्भ करने का प्रावधान रखा गया है उस अवस्था में बच्चा परिपक्व हो जाता है और उसको स्वयं का ज्ञान होना प्रारम्भ हो जाता है। अक्सर यह देखा गया है कि 8 से 11 वर्ष की आयु के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल अथवा ...