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Cartooning politicians is sin while portraying Hindu goddesses naked secularism in India

Cartooning politicians is sin while portraying Hindu goddesses naked secularism in India

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It refers to the strict but justified observations of vacation-bench of Supreme Court on 15.05.2019 finding that Supreme Court order of 14.05.2019 to release Priyanka Sharma was not immediately implemented by West Bengal government. It is also violation of Supreme Court order that she was forced to sign a written apology before her release. Other recent happening in West Bengal including large-scale poll-related violence look like that the state is not a part of India especially when state Chief Minister calls democratically elected Prime Minister of the country not as Prime Minister. It is also beyond understanding that no pseudo-secular politician objects to portraying Hindu goddesses nude by internationally renowned artist Maqbool Hussain, but a young politician was thrown into jail ...
EC must have banned poll-campaign in West bengal from immediate effect

EC must have banned poll-campaign in West bengal from immediate effect

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Rallies and road-shows be totally banned for future elections: TV debates and press-conferences be promoted It refers to confusing decision of Election Commission of India ECI on 15.05.2019 announcing a total ban on poll-campaign in West Bengal but with effect from 10 pm on 16.05.2019 rather than mandatory from 5 pm on 17.05.2019 considering heavy violence during road-show by BJP President Amit Shah on 14.05.2019. But it is beyond understanding why ECI did not impose ban with immediate effect just after its announcement on 15.05.2019. Election-rallies and road-shows are insensible style of poll-campaign involving extra-large heavy expenditure on unproductive mode of poll-campaign. Ban on banners and posters has provided remarkable results resulting in stopping wastage of money and keepin...
आतंक के विरुद्ध सोशल मीडिया

आतंक के विरुद्ध सोशल मीडिया

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राजधानी दिल्ली के मोती नगर के बसई दारापुर गांव में युवा बेटी पर अभद्र टिप्पणी करने का विरोध करने पर 51 साल के ध्रुव राज त्यागी की मोहम्मद आलम व उसके पिता जहांगीर खान आदि ने मिलकर निर्मम हत्या कर दी तथा पिता को बचाने आये 19 वर्षीय पुत्र अनमोल त्यागी को भी चाकुओं से बुरी तरह घायल किया जो चिकित्सालय में मौत से लड़ रहा है। यह दर्दनाक जिहादी घटना दिल्ली में मतदान की पूर्व देर रात्रि 11 मई की है। निःसंदेह मुसलमानों का दुःसाहस बढ़ता जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में ही गैर मुस्लिम बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं। नित्य प्रति दिन कहीं न कहीं हिन्दू व सिख आदि अबलाओं पर मुस्लिम समुदाय के लड़के अत्याचार करते रहते हैं और बचाव में आने वाले परिजनों की हत्या से भी नहीं चूकते। "बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओ" के लिए समर्पित सरकार कब तक ऐसे जिहादी कृत्यों पर मौन रहेगी ? इस्लामिक आतंकवाद के इस रूप को न समझना आत्मघाती हो ...
भारत विरोधियों का दुःसाहस…

भारत विरोधियों का दुःसाहस…

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भारत को बदनाम करके कमजोर करने वाला विशेष वर्ग ऐसे विभिन्न प्रकार के झूठे व मिथ्या आरोप लगाने का विशेषज्ञ है। अमरीका की प्रसिद्ध "टाइम" पत्रिका में पाकिस्तानी कट्टरपंथी राजनीतिज्ञ दिवंगत सलमान ताशीर व भारत की वरिष्ठ पत्रकार सुश्री तवलीन सिंह के पुत्र आतिश ताशीर के श्री नरेन्द्र मोदी के विषय में लिखे लेख के शीर्षक "इंडियाज डिवाइडर इन चीफ" से ही यह ज्ञात होता है कि लिखने वाला भारत विरोधी पूर्वाग्रहों से ही ग्रस्त है। उन्हें वर्तमान भारत का कोई ज्ञान नहीं। वह पाकिस्तान की जन्मजात भारत विरोधी शत्रु मानसिकता से बाहर निकलने की मनस्थिति में नहीं है। श्री नरेंद्र मोदी को भारत का मुख्य विभाजक बता कर लेखक किसको मूर्ख बनाना चाहता है?भारत भक्तों को यह भली प्रकार समझ में आ गया है कि मोदी जी के सशक्त प्रशासकीय कार्यकुशलता के परिणामों से भारत का खोया हुआ सम्मान आज विश्व में पुनः स्थापित हो रहा है। हो स...
Cyclone Fani: The Untold Story

Cyclone Fani: The Untold Story

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A Down To Earth magazine investigation points to an emerging threat facing the world’s vulnerable regions – climate change is changing the chemistry of cyclones in ways we do not understand yet. At speeds which are almost impossible to tackle Despite being better prepared this time, experts were left guessing by Fani about its trajectory till 24 hours before landfall. Cyclones are becoming more unpredictable and hence, deadlier A slowing down of wind speeds across the world is said to be one of the key reasons New Delhi, May 14, 2019: “All these years, we have been talking and warning persistently about the increasing intensity and ferocity of extreme weather events like cyclones, brought about by climate change. What we have now started noticing is another extremely disturbing ...
बम धमाकों में हर बार इस्लाम के ही चीथड़े उड़ाते हैं आतंकवादी!

बम धमाकों में हर बार इस्लाम के ही चीथड़े उड़ाते हैं आतंकवादी!

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रमज़ान का महीना शुरू हो गया है। प्रार्थना करता हूं कि दुनिया में शांति कायम रहे, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से यह चलन देखा जा रहा है कि रमज़ान के महीने में इस्लामिक आतंकवादियों की हिंसा काफी बढ़ जाती है। मेरी नज़र में सबसे भयावह घटना तीन साल पहले बांग्लादेश में हुई थी, जब कुरान की आयतें न पढ़ पाने पर कई लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा दुनिया भर में अंजाम दी जा रही वारदात की क्रोनोलॉजी याद रखना बेहद मुश्किल है, क्योंकि आए दिन कहीं न कहीं वे बेगुनाह लोगों को मार रहे हैं। कुछ दिन पहले श्रीलंका में हुए धमाकों में सैकड़ों लोग मारे गए थे। बुधवार, 8 मई को फिर पाकिस्तान के लाहौर में एक सूफी दरगाह के बाहर धमाका हुआ है और कई लोग मारे गए हैं। कई लोगों को यह बात कड़वी लगेगी, लेकिन इस्लामिक आतंकवादी जब भी कहीं कोई धमाका करते हैं, हवाओं में ख़ुद इस्लाम के ही चीथड़े उड़ते हैं।...
वामपंथी रुदन

वामपंथी रुदन

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फेसबुक पर इन चुनावी दिनों में कई घोषित वामपंथियों (इनमें साहित्यकार, जिन्हें मैं साहित्यविकार कहता हूँ, और रिपोर्टर टाइप पत्रकार आदि शामिल हैं) का रुदन पढ़ रहा हूँ। सभी एक दूसरे को कॉपी पेस्ट किए जा रहे हैं। इसमें उन्हें महारत हासिल है। मौलिक लेखन की प्रतिभा तो कहीं दिखती नहीं है। इनके रुदन को पढ़िए। एक ही बात सभी लिखे जा रहे हैं। पिछले पाँच वर्ष में देश तथा समाज में अनाचार मच गया है। वे अकेले हो गए हैं, जीवन का सारा रस सूख गया है, प्रकृति के प्रति कोई प्रेम कहीं नहीं बचा है। संस्कृति नष्ट हो गई  है, नदी, हवा, पेड़-पौधे, सभी समाप्त हो रहे हैं। सभी लोग एक दूसरे से घृणा करने लगे हैं। इसका कारण एक ही है। एक ऐसा व्यक्ति सत्ता में बैठा है, जो सब रस सोखे ले रहा है, घृणा फैला रहा है, प्रकृति को नष्ट कर रहा है, सौन्दर्य को समाप्त कर रहा है, व्यक्तियों को अकेला कर रहा है। इस रुदन को पढ़ने से प...
दबाव एवं हिंसा की त्रासदी का शिकार बचपन

दबाव एवं हिंसा की त्रासदी का शिकार बचपन

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आज का बचपन केवल अपने घर में ही नहीं, बल्कि स्कूली परिवेश में बुलीइंग यानी दबाव एवं हिंसा का शिकार है। यह सच है कि इसकी टूटन का परिणाम सिर्फ आज ही नहीं होता, बल्कि युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यह एक महाबीमारी एवं त्रासदी का रूप ले लेता है। यह केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया की एक बड़ी समस्या है। लंदन के लैंकस्टर यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट स्कूल के अर्थशास्त्र विभाग में असोसिएट रह चुकीं एम्मा गॉरमैन ने इस पर लम्बा शोध किया है। उन्होंने अपने इस शोध के लिए यूके के 7000 छात्र-छात्राओं को चुना। उन्होंने पहले उनसे तब बात की जब वे 14-16 की उम्र के थे। उसके बाद तकरीबन दस वर्षों तक उनसे समय-समय पर बातचीत की गई। गॉरमैन ने पाया कि किशोरावस्था की बुलीइंग यानी बच्चों को अभित्रस्त करना, उन पर अनुचित दबाव डालना या धौंस दिखाना, चिढ़ाना-मजाक उड़ाना या पीटना की घटनाओं ने बच्चों के भीतर के आत्मविश्वास, स्वतंत्र व्यक्...
विश्व उन्नति का दारोमदार मजदूर के कंधों पर

विश्व उन्नति का दारोमदार मजदूर के कंधों पर

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मजदूर दिवस/मई दिवस समाज के उस वर्ग के नाम है जिसके कंधों पर सही मायने में विश्व की उन्नति का दारोमदार होता है। कर्म को पूजा समझने वाले श्रमिक वर्ग के लगन से ही कोई काम संभव हो पाता है चाहे वह कलात्मक हो या फिर संरचनात्मक या अन्य लेकिन विश्व का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा हो जहां मजदूरोें का शोषण न होता हो। बंधुआ मजदूरों खासकर महिला और बाल मजदूरों की हालत और भी दयनीय होती है जिन्हें अपनी मर्जी से न अपना जीवन जीने का अधिकार होता है और न ही सोचने का। ऐसे में मजदूरों की स्थिति में सुधार आवश्यक भी है और उसका अधिकार भी। दुनियाभर के मजदूरों को कई श्रेणियों में बांटा जाता रहा है जैसे कि संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूर, कुशल-अकुशल आदि। समय-दर-समय मजदूरों की स्थिति में कुछ सुधार आया तो कुछ मामलों में स्थिति और भी बदतर हुई है। सुधारवाद की बात करें तो मजदूरों का पारिश्रमिक तय किया जाने लगा, उसके अधिकारों क...
ये घोषणाएं और संकल्प जुमलों के पहाड़ हैं

ये घोषणाएं और संकल्प जुमलों के पहाड़ हैं

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चुनाव के तीन दिन पहले संकल्प-पत्र और सप्ताह भर पहले घोषणा-पत्र जारी करने का अर्थ क्या है? देश की दो प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने यही किया है। दूसरी छोटी-मोटी प्रांतीय पार्टियों ने भी कोई आदर्श उदाहरण उपस्थित नहीं किया है। इन पार्टियों के नेताओं से पूछिए कि आपके 50-50 पृष्ठों के इन घोषणा-पत्रों को कौन पढ़ेगा? क्या देश के 70-80 करोड़ मतदाता उसे पढ़कर मतदान करेंगे? इन दलों के नेता और कार्यकर्ता भी उन्हें पढ़ेंगे, इसमें संदेह है। चुनाव अभियान तो पिछले डेढ़-दो माह से चला हुआ है। उसमें जनहित के कौनसे मुद्दों पर सार्थक बहस हो रही है, यह सबको पता है। फिर भी इन संकल्प-पत्रों और घोषणा-पत्रों का महत्व है। जो भी पार्टी जीतती है, उसकी खिंचाई उसके विरोधी घोषणा-पत्रों के आधार पर करते हैं। उसका कुछ न कुछ असर भी जरुर दिखाई पड़ता है। 2019 के जो चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण छपे हैं, उनके आधार पर यह कहना...