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चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का दूरगामी  फैसला

चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का दूरगामी  फैसला

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चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का दूरगामी  फैसला, CJI, PM और लोकसभा में नेता विपक्ष की कमेटी करेगी शीर्ष नियुक्तियां चुनाव आयोग में शीर्ष नियुक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति अब पीएम, चीफ जस्टिस और लोकसभा में नेता विपक्ष की कमेटी करेगी. सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की पीठ ने 5-0 की सर्वसम्मति से दिए फैसले में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का चुनाव तीन सदस्यीय समिति की सलाह पर राष्ट्रपति करेंगे. न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा है, यह नियम तब तक जारी रहेगा जब तक संसद इन नियुक्तियों के लिए कानून नहीं बनाती. चुनाव आयोग के संचालन के लिए अलग से फंड बनाने का आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त सम्बंधित आज का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैस...
फीके पड़ते होली के रंग

फीके पड़ते होली के रंग

BREAKING NEWS, TOP STORIES, संस्कृति और अध्यात्म
पहले की होली और आज की होली में अंतर आ गया है, कुछ साल पहले होली के पर्व को लेकर लोगों को उमंग रहता था, आपस में प्रेम था। किसी के भी प्रति द्वेष भाव नहीं था। आपस में मिल कर लोग प्रेम से होली खेलते थे। मनोरंजन के अन्य साधानों के चलते लोगों की परंपरागत लोक त्यौहारों के प्रति रुचि कम हुई है। इसका कारण लोगों के पास समय कम होना है। होली आने में महज कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन शहर में होली के रंग कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। एक माह तो दूर रहा अब तो होली की मस्ती एक-दो दिन भी नहीं रही। मात्र आधे दिन में यह त्योहार सिमट गया है। रंग-गुलाल लगाया और हो गई होली। जैसे-जैसे परंपराएं बदल रही हैं, रिश्‍तों का मिठास खत्‍म होता जा रहा है। -प्रियंका सौरभ होली एक ऐसा रंगबिरंगा त्योहार है, जिसे हर धर्म के लोग पूरे उत्साह और मस्ती के साथ मनाते रहे हैं। होली के दिन सभी बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मि...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व का विराट दर्शन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व का विराट दर्शन

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण, साहित्य संवाद
हमलोगों को "हिंदू" कब से कहा जाया जाने लगा ये तो ठीक-ठीक नहीं पता पर मेरे ख्याल से ये नाम हमारे लिए सबसे उपयुक्त नाम है क्योंकि ये सर्वसमावेशी नाम है जो हमारी सामूहिक प्रकृति को सबसे ठीक से परिभाषित करती है। महाभारत के बाद से भारत कई अवैदिक मतों की उद्भव स्थली बनी। बौद्ध, जैन और सिख मत जन्में। अगर और ज्यादा विस्तृत रूप में कहें तो हिंदुत्व वो है जिसमें सनातनी, बौद्ध, जैन, निंबार्ककी, सिख (सिखों में भी सहजधारी, केशधारी) लिंगायत, गृहस्थ, संन्यासी, नास्तिक, वैदिक, अवैदिक, अज्ञेयवादी, निरंकारी, प्रकृति पूजक, मशान पूजक, सुधारवादी, जड़वादी, कैवल्य, रामस्नेही सबके सब इस के अंदर समाहित है। दिक्कत ये हुई कि ये सब जो पंथ-उपपंथ-मत- संप्रदाय आदि जन्में इन सबके अपने गुरु, अपने इष्ट, अपने प्रवर्तक और अपने तीर्थंकर हैं। इनके अपने तीर्थ हैं। अपनी परंपराएं हैं। अपने आश्रम और कर्मकांड हैं तो जब तक इन...
भाषाः गुजरात से सीखें सभी प्रांत

भाषाः गुजरात से सीखें सभी प्रांत

BREAKING NEWS, TOP STORIES, संस्कृति और अध्यात्म
डॉ. वेदप्रताप वैदिक गुजरात की विधानसभा ने सर्वसम्मति से जैसा प्रस्ताव पारित किया है, वैसा देश की हर विधानसभा को करना चाहिए। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि गुजरात की सभी प्राथमिक कक्षाओं में गुजराती भाषा अनिवार्य होगी। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा के छात्रों के लिए गुजराती पढ़ना अनिवार्य होगा। जो स्कूल इस प्रावधान का उल्लंघन करेंगे, उन पर 50 हजार से 2 लाख रु. तक का जुर्माना लगाया जाएगा। जो स्कूल इस नियम का उल्लंघन एक साल तक करेंगे, राज्य सरकार उनकी मान्यता रद्द कर देगी। गुजरात में बाहर से आकर रहनेवाले छात्रों पर उक्त नियम नहीं लागू होगा। मेरी राय यह है कि गैर-गुजराती छात्रों पर भी यह नियम लागू होना चाहिए, क्योंकि भारत के किसी भी प्रांत से आनेवाले छात्र-छात्राओं के लिए गुजराती सीखना बहुत आसान है। उसकी लिपि तो एक-दो दिन में ही सीखी जा सकती है और जहां तक भाषा का सवाल है, वह भी कुछ हफ्तों में ह...
चीनी कर्ज का मकड़जाल

चीनी कर्ज का मकड़जाल

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बलबीर पुंज मानव सभ्यता चाहे कितना भी विकास कर लें, उसमें व्याप्त राक्षसी प्रवृतियां आज भी जस की तस है। कमजोर राष्ट्रों को पहले भी शक्तिशाली सेना और हथियारों के बल पर रौंदा गया है और अब भी ऐसा होता है। उद्देश्य वही है, केवल उसका स्वरूप बदल गया है। अब देशों को गुलाम बनाने या उनपर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए सैन्यबल से अधिक आर्थिक प्रपंचों का सहारा लिया जाता है। वर्तमान समय में ऐसे शोषण का मूर्त प्रतीक चीन के रूप में उभरा है। आज जहरीले सर्प रूपी चीन का काटा, पानी मांगने की स्थिति में भी नहीं रहता है। भारत के पड़ोस में श्रीलंका और पाकिस्तान, साम्राज्यवादी चीन की कुत्सित मानसिकता का नवीनतम शिकार है। यह ठीक है कि पाकिस्तान काफी हद तक अपने कुकर्मों के कारण संकटमयी स्थिति से गुजर रहा है, जहां पेट भरने के लिए रोटी की भारी किल्लत है, चायपत्ती का अकाल है, खाद्य-तेल की कमी है, तो बिजली का गहरा स...
भारतीय गृहणियों के घरु कार्य का आंकलन कर इसे सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाना चाहिए

भारतीय गृहणियों के घरु कार्य का आंकलन कर इसे सकल घरेलू उत्पाद में शामिल किया जाना चाहिए

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भारतीय अर्थशास्त्रियों द्वारा जैसी कि उम्मीद की जा रही थी एवं भारतीय रिजर्व बैंक ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था सम्बंधी अपने आंकलन में जो सम्भावना व्यक्त की थी, उसी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 की तृतीय तिमाही, अक्टोबर-दिसम्बर 2022, में देश के सकल घरेलू उत्पाद में 4.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 की प्रथम तिमाही, अप्रेल-जून 2022, में एवं द्वितीय तिमाही, जुलाई-सितम्बर 2022, में क्रमशः 13.2 प्रतिशत एवं 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। जबकि चौथी तिमाही, जनवरी-मार्च 2023, में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि की सम्भावना के चलते पूरे वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है। इसी प्रकार कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों जैसे गोल्डमेन सेच्स, मूडी, फिच, एशियाई विकास बैंक आदि ने भी वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारतीय अर्थव्य...
डगमगाती भविष्य-निधि अर्थात् बचत की बुनियाद

डगमगाती भविष्य-निधि अर्थात् बचत की बुनियाद

BREAKING NEWS, TOP STORIES, आर्थिक, राष्ट्रीय
एक समय था, जब भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार मध्य-वर्ग था तो उसके लिए सबसे पवित्र-पूंजी थी कर्मचारी भविष्य-निधि कोष। भविष्य-निधि अर्थात् बचत की बुनियाद। कोई नागरिक निजी तौर पर बचत करना चाहे, या न चाहे पिछली सरकारों ने उसके लिए बचत के प्रावधान को अनिवार्य बनाने की कोशिश की थी। कर्मचारी के इस खाते में बचत सरकार की भी जिम्मेदारी थी। लेकिन,अब सरकार का नागरिकों के प्रति यह अभिभावकीय अस्तित्व अस्त हो रहा है। इस बार के केंद्रीय बजट का मूल स्वर यही है कि “कर दिए जाओ और बचत की चिंता न करो।“हमारे सामने भारतीय अर्थव्यवस्था में छोटी बचतों का इतिहास उस वक्त दर्ज हुआ जब 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय दुनिया के बाजार धड़ाम से गिर रहे थे। बाजार के जानकारों ने उस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने का श्रेय घर-घर मौजूद बचतवादियों को ही दिया था। इस बचतवादी प्रवृत्ति का रखवाला था भविष्य-निधि कोष। आप आज जितन...
बिगड़ता मौसम, सबको सोचना होगा!

बिगड़ता मौसम, सबको सोचना होगा!

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बीते कल भोपाल का तापमान 36 डिग्री था । अगले 4 दिनो में इसके 39 डिग्री तक पहुँचने की भविष्यवाणी मौसम विभाग कर रहा है। यह सब ऋतु-चक्र में आये बदलाव के कारण हैं । अब तो बारह महीने लोगों से हम यह सुनते आ रहे हैं- इस बार तो गर्मी ने हद कर दी... ऐसी गर्मी तो मैंने कभी नहीं झेली। बरसात में इस बार की बरसात ने तो हाहाकार मचवा दिया... जिधर देखो पानी ही पानी। इसी तरह जाड़ा - ऐसा जाड़ा कि हड्डियां हिलाकर रख दीं। बारह महीने ऋतुओं के बदलाव ने सभी को परेशान कर दिया है। पिछले साल जून में उत्तर भारत सहित देश के तकरीबन सभी हिस्सों में बेहाल कर देने वाली गर्मी पड़ी। दिल्ली में पारा जब 48 डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर पहुंचा तो लोगों पर ही इसका असर नहीं दिखा बल्कि पशु-पक्षी भी हलकान दिखे। इस साल राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली सहित तमाम प्रदेशों में कड़ाके की ठंड ने सबको बेहाल कर दिया। इस फर...
द मास्क ऑफ अफ्रीका

द मास्क ऑफ अफ्रीका

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सर वी एस नायपॉल ने अपनी पुस्तक "द मास्क ऑफ अफ्रीका" में अफ्रीकी आस्थाओं का एक अध्ययन प्रस्तुत किया है.पुस्तक में पश्चिम अफ्रीका के एक देश गेबॉन में एक पात्र है रोसेटाँगा-रेनयु, जो एक लॉयर और एकेडेमिक है. उसके पिता फ्रेंच थे, माँ अफ्रीकन. उसने पेरिस में लॉ की पढ़ाई की थी, वह एंथ्रोपोलॉजिस्ट भी था और यूनिवर्सिटी ऑफ गेबॉन में डीन था. रोसेटाँगा अफ्रीका के बारे में कहता है : मॉडर्न रेलिजन्स यहाँ सिर्फ सतह पर है. उसके नीचे घने जंगल हैं.हर अफ्रीकी के अंदर यह घना जंगल है. वे जंगल से डरते हैं, तो जंगल के साथ जीते भी हैं. वे पेड़ों से बातें करते हैं. उसे मन की बात, अपना दुख दर्द बताते हैं. जब कोई किसी पेड़ की डाल काटता है या छाल निकालता है तो उसे उस पेड़ की अनुमति माँगनी होती है. उसे बताना होता है कि वह यह लकड़ी या छाल किसलिए ले जा रहा है. यह जरूरी है. जंगल की एक अपनी ऊर्जा है. यह जीवन ऊर्...
सभ्यतागत चुनौती

सभ्यतागत चुनौती

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The Civilisational Challengeजापान को सिर्फ एक देश नहीं, एक विशिष्ट सभ्यता मानना गलत नहीं होगा. अपने इतिहास के प्रारंभिक कालखंड में जापानी संस्कृति लगभग पूरी तरह से चीनी संस्कृति की एक शाखा मात्र थी. चीन एक तरह से जापान का कल्चरल बिग ब्रदर था. पर दूसरी सहस्त्राब्दी के आते आते जापान ने अपनी विशिष्ट संस्कृति विकसित कर ली जो दुनिया की अन्य किसी भी संस्कृति से बिल्कुल ही अलग थी...लगभग विचित्र. यह एक बहुत ही पारंपरिक, सैन्य संस्कृति बन गयी. शिंतो बौद्ध धर्म और विलक्षण समुराई सैनिक इसकी खास पहचान थे. 16वीं सदी का जापान टुकड़ों में बँटा था. इसमें अनेक डेमियन सरदार (वारलॉर्ड) आपस में लड़ते रहते थे. उसी समय यूरोपियन व्यापारी और ईसाई मिशनरियाँ भी जापान पहुंचीं. उस दौर में जापान में पश्चिम से दो चीजें पहुंची...क्रिश्चियनिटी और बंदूकें. उनमें एक जापानी वारलॉर्ड हुआ ओडा नोबुनागा. उसे जापान का पहल...