महिला विमर्श : ऐसे न्याय को न्याय नहीं कहा जा सकता
देश में बड़े जोर –शोरसे ८ मार्च को महिला दिवस बनाया जा रहा है, इससे पूर्व आया एक न्यायालयीन निर्णय एक बार सोचने पर विवश और विचलित कर रहा है | यह बात विचलित करती है कि यदि किसी नाबालिग लड़की के साथ ज्यादती करने वाले व्यक्ति को पीड़िता के साथ विवाह करने का अवसर न्यायिक व्यवस्था द्वारा दिया जाये। इसे कैसे न्याय की संज्ञा दी जाये ?
वास्तव में यह प्रस्ताव शीर्ष अदालत के स्तर पर लैंगिक संवेदनशीलता को नहीं दर्शाता। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि आरोपी को पीड़िता के साथ शादी के लिये मजबूर नहीं किया जा रहा है| फिर भी यह विचार फिर भी अमान्य व असंवेदनशील की कहा जा रहा है। सही मायनो में अदालत की यह टिप्पणी न केवल अपराधियों का हौसला बढ़ाती है बल्कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा को कमतर दर्शाती है।
अनेक अर्थों में इस तरह का प्रस्ताव देना मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के वर्ष 2020 में दिये गये उस ...

