-ललित गर्ग -हर रिश्ते को संवेदना से जीने के लिये जरूरी है प्रेम एवं विश्वास। प्यार एवं विश्वास दिलों को जोड़ता है। इससे कड़वे जख्म भर जाते हैं। प्यार की ठंडक से भीतर का उबाल शांत होता है। हम दूसरों को माफ करना सीखते हैं। इनकी छत्रछाया में हम समूह और समुदाय में रहकर शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। लेखिका रोंडा बायन कहती हैं कि जितना ज्यादा हो सके हर चीज, हर व्यक्ति से प्यार करें। ध्यान केवल प्यार पर रखें। पाएंगे कि जो प्यार आप दे रहे हैं, वह कई गुणा बढ़कर आप तक लौट रहा है। हम समाज में एक साथ तभी रह पाते हैं जब वास्तविक प्रेम एवं संवेदना को जीने का अभ्यास करते हैं। उसका अभ्यास सूत्र है-साथ-साथ रहो, तुम भी रहो और मैं भी रहूं। या ‘तुम’ या ‘मैं’ यह बिखराव एवं विघटन का विकल्प है। ‘हम दोनों साथ नहीं रह सकते’ यह नफरत एवं द्वेष का प्रयोग है। विरोध में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। जो व्यक्ति दूसर...
*रजनीश कपूर‘इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना’। मिर्ज़ा ग़ालिब के चर्चित शेरों में से यहएक ऐसा शेर है जो हमें दर्द सहने की नसीहत देता है। परंतु आजकल के भाग-दौड़ भरे दौर में हमारे शरीर में दर्द सहने कीशक्ति कम होती जा रही है। हम किसी भी उम्र के क्यों न हों, ज़रा सी दर्द को भगाने के लिए ‘पेन किलर’ के बिना नहीं चलसकते। पर क्या हम इन रंग बिरंगी गोलियों के दुष्प्रभाव से वाक़िफ़ हैं?आमतौर पर हम सिरदर्द जैसी छोटी सी पीड़ा पर, पेट या बदन दर्द पर तुरंत पेन किलर ले लेते हैं। बिना इस बात का ख़्यालहुए कि इन गोलियों का हमारे शरीर पर क्या असर पड़ेगा। हमारी ज़रा सी लापरवाही, इन दवाओं को जीवन भर का दर्दबना सकती हैं। जबकि पेट दर्द, सिर दर्द और बदन दर्द के लिए नानी-दादी के बताए ऐसे हज़ारों घरेलू नुस्ख़े हैं जिनसे तुरंतआराम मिल सकता है। परंतु मार्केटिंग के युग में ...
ललित गर्ग -
व्हाट्सअप, फैसबुक, इंस्टाग्राम हैक होने की घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, आम आदमी इन हमलों से भारी नुकसान झेल रहे हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि सरकार के पास इसके समाधान का तंत्र कमजोर एवं बेअसर है। इन सोशल मीडिया के हमलों के साथ-साथ साइबर हमलों ने भी खतरों की झड़ी लगा दी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सूचना क्रांति ने हमारा जीवन आसान बना दिया है। तकनीक के जरिए प्रत्येक क्षेत्र में नित नए कीर्तिमान एवं जीवन को आसान बनाने की स्थितियां भी कायम हुई हैं। लेकिन, जिस तरह से साइबर संसार एवं तकनीक का विस्तार हो रहा है, उससे तेज गति से साइबर अपराध बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए कई बार तो लगता है कि हम कहीं वैश्विक जंग का नया मैदान तैयार करने एवं आम आदमी से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं एवं संसाधनों को खतरे में तो नहीं डाल रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस साइबर संसार के विस्तार के साथ ही रा...
Vivek Shukla
Even as the media world is agog with the news that Radhika and Dr. Prannoy Roy have resigned as directors on the board of RRPR Holding Pvt. Ltd. with effect from November 29,I am transported back to 1984. Those were the days when India was still many years away from the din of private TV channels. Nobody knew that something like Twitter, Facebook and other social media platforms would invade our world soon. Telecom revolution too was far away.
Those days I was a student of Delhi University and during the summer vacation, I was working in a huge TV showroom of my friend’s family in the then Archana Cinema shopping arcade in Greater Kailash-part I. That TV showroom belonged to Weston Company and it also had a huge video Library too. Those were the days of VCR. Movie buffs...
आर.के. सिन्हा
सुप्रीम कोर्ट में देश की आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी सिर्फ अंग्रेजी में ही जिरह करने की अनिवार्यता बताना उन तमाम भारतीय भाषाओं की अनदेखी और अपमान ही माना जाएगा, जिसमें इस देश के करोड़ों लोग आपस में संवाद करते हैं। अंग्रेजी से किसी को ऐतराज़ भी नहीं है। अंग्रेजी एक तरह से विश्व संवाद की एक भाषा है और हमारे अपने देश में भी इसका हर स्तर पर उपयोग होता है। जहाँ ज़रूरी होने में हर्ज भी नहीं है। पर सुप्रीम कोर्ट में तो सिर्फ इसी का उपयोग किया जा सकता है। यह सही कैसे माना जाए? यह तो अंग्रेजों की गुलामी को दर्शाने वाली व्यवस्था है जो तत्काल खत्म होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय पहले ही एक अलग ही तरह का शर्मनाक मामला देखने को मिला जहां हिंदी में दलील दे रहे एक शख्स को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने टोक दिया। दरअसल, शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ता शंकर लाल शर्मा जैसे ...
*डॉ. वेदप्रताप वैदिक*
कल भारत का संविधान-दिवस था और कल ही तमिलनाडु के एक व्यक्ति ने यह कहकर आत्महत्या कर ली कि केंद्र सरकार तमिल लोगों पर हिंदी थोप रही है। आत्महत्या की यह खबर पढ़कर मुझे बहुत दुख हुआ। पहली बात तो यह कि किसी ने हिंदी को दूसरों पर लादने की बात तक नहीं कही है। तमिलनाडु की पाठशालाओं में कहीं भी हिंदी अनिवार्य नहीं है। हाँ, गांधीजी की पहल पर जो दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा बनी थी, वह आज भी लोगों को हिंदी सिखाती है। हजारों तमिलभाषी अपनी मर्जी से उसकी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। आत्महत्या करनेवाले सज्जन चाहते तो वे इसका भी विरोध कर सकते थे लेकिन विरोध का यह भी क्या तरीका है कि कोई आदमी अपनी या किसी की हत्या कर दे। जो अहिंदीभाषी हिंदी नहीं सीखना चाहें, उन्हें पूरी स्वतंत्रता है लेकिन वे कृपया सोचें कि ऐसा करके वे अपना कौनसा फायदा कर रहे हैं? क्या वे अपने आप को बहुत संकुचित नही...
-राकेश दुबे
भारत की आज़ादी और भारत में आज़ादी को लेकर कभी भी और कहीं भी बहस होती रहती है | आज तक देश में किसी राजनीतिक दल ने उन विचाराधीन कैदियों की बात नहीं की जो जेलों में हैं | इनकी संख्या कोई छोटी- मोटी नहीं बल्कि 4.27 लाख से अधिक है | देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कुछ दिन पहले संविधान दिवस के अवसर पर बिना जमानत और सुनवाई के लंबे समय से जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का भावनात्मक निवेदन किया है | जिस कार्यक्रम में उन्होंने यह मुद्दा उठाया उसमें देश के प्रधान न्यायाधीश समेत सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश तथा केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी उपस्थित थे|
राष्ट्रपति की इस अपील को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने देशभर के राज्य सरकारों और जेल अधिकारियों को ऐसे तमाम कैदियों के बारे में 15 दिन के भीत...
*डॉ. वेदप्रताप वैदिक*
भारत,चीन और अमेरिका के बीच आजकल जो कहा-सुनी चल रही है, वह बहुत मजेदार है। उसके तरह-तरह के अर्थ लगाए जा सकते हैं। चीनी सरकार के प्रवक्ता ने एक बयान देकर कहा है कि उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा पर अमेरिकी और भारतीय सेना का जो ‘युद्धाभ्यास’ चल रहा है, वह बिल्कुल अनुचित है और वह 1993 और 1996 के भारत-चीन समझौतों का सरासर उल्लंघन है। सच्चाई तो यह है कि मई 2020 में चीन ने गलवान-क्षेत्र में अपने सैनिक भेजकर ही उक्त समझौतों का उल्लंघन कर दिया था। वास्तव में भारत-अमेरिका का यह युद्धाभ्यास चीन-विरोधी हथकंडा नहीं है। दोनों राष्ट्र इस तरह के कई युद्धाभ्यास जगह-जगह कर चुके हैं। यह चीन को धमकाने का कोई पैंतरा भी नहीं है। यह तो वास्तव में हिमालय-क्षेत्रों में अचानक आनेवाले भूंकप, बाढ़, पहाड़ों की टूटन, जमीन फटने जैसी विपत्तियों का सामना करने का पूर्वाभ्यास है। प्राकृतिक संकट से ग्र...