मैंने उठते बैठते राम को ही जाना।
जबसे पैदा हुए, बड़े हुए, संस्कार मार्जन होता रहा और भगवान राम जी के आदर्शों व कर्ममय जीवन का अनुसरण करते हम सब बढ़ते रहे।
कोई भी हिन्दू बिना राम जी के हिन्दू कैसे रह पायेगा ?
जो अपने माई बाप को माई बाप न माने उसके वजूद को क्या कहेंगे फिर....
लेकिन हिंदीपट्टी क्षेत्र में जितने सर्जक व संस्कृतिकर्मी दिखेंगे आपको सब पिता से द्रोह करने वाले, मातृहन्ता दिखेंगे !
बड़े बड़े नामवरी पुरुषों का तथाकथित जनवाद व प्रगतिशील आडम्बरी उद्घोष ऐसे ही निर्मूल दिखेगा !
एक बड़े प्रपंचक का उदाहरण देखिए लिखे दे रहा हूँ :
मुझे ज्ञानपीठ पुरस्कर्ता, कविवर कुंवरनारायण की तरह पाखण्ड नहीं रचना है कि ['अयोध्या 1992'] लिखकर वाल्मीकि और राम जी का करुण विलाप चित्रित करते हुए पूरे सन्दर्भ को एक खूबसूरत मक्कारी भरे लहजे में याद करूँ।
बाबरी विध्वंस पर बुक्का फाड़कर रोऊँ और 1992 ईस्वी से 464 वर्...









