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विश्लेषण

अंगदान न होने से देश में हर साल पांच लाख मौतें

अंगदान न होने से देश में हर साल पांच लाख मौतें

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
दुर्भाग्य ! देश में 640 चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल हैं, जिनमें अंग प्रत्यारोपण और स्तंभ कोशिका से उत्पादन का काम किया जा सकता है, लेकिन चंद चिकित्सा संस्थानों में ही अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन की शल्य क्रिया सुविधा उपलब्ध है। अब इनमें अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन के पाठ्यक्रम भी नवीन चिकित्सा शिक्षा में जोडे गए हैं। चौंकिए मत ! देश में अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। इसके मुकाबले वर्ष 2022 में पंद्रह हजार अंगों का प्रत्यारोपण ही हो सका है। लोगों की जान बचाने के लिए जरूरत और उपलब्धता के बीच की इस खाई को पाटना जरूरी है। इसके दो ही उपाय हैं। पहला,अंगदान के लिए लोगों को जागरूक किया जाए और दूसरा, स्तंभ कोशिकाओं यानी स्टेम सेल के जरिए अंगों का उत्पादन बढ़ाया जाए।इस प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने के लिए भारत सरकार ‘एक राष्ट्र-एक नीति’ लागू करने जा रही ह...
मुद्रा स्फीति पर अंकुश क्यों जरूरी

मुद्रा स्फीति पर अंकुश क्यों जरूरी

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कोरोना महामारी के बाद से पूरे विश्व में मुद्रा स्फीति बहुत तेजी से बढ़ी है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति 7 प्रतिशत के ऊपर एवं थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति 13 प्रतिशत के ऊपर निकल गई थी। कई विकसित देशों में तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति 10 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंची थी जो कि पिछले 50 वर्षों की अवधि में सबसे अधिक महंगाई की दर है। मुद्रा स्फीति से आश्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि एवं मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी होने से है। मुद्रा स्फीति विशेष रूप से समाज के गरीब एवं निचले तबके तथा मध्यम वर्ग के लोगों को बहुत अधिक प्रभावित करती है। क्योंकि, इस वर्ग की आय एक निश्चित सीमा में रहती है एवं इसका बहुत बड़ा भाग उनके खान-पान पर ही खर्च हो जाता है। यदि मुद्रा स्फीति तेज बनी रहे तो इस वर्ग के खान-पान पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। अतः, मुद्रा स्फ...
पक्ष – विपक्ष के झगड़े – अनुज अग्रवाल

पक्ष – विपक्ष के झगड़े – अनुज अग्रवाल

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
Anuj Agarwal संसद सत्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी पर अदाणी को लेकर तीखे व अपमानजनक आरोपों के बाद प्रधानमंत्री मोदी पर कांग्रेसी नेताओं की अपमानजनक टिप्पणियों का एक सिलसिला सा चल पड़ा।कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा को जब इसी मामले में पुलिस में धरा तो बड़े हंगामे व नाटकों के बाद उनको माफ़ी माँगनी पड़ी। राहुल गाँधी इधर विदेशों में अपने भाषणों में भारत में लोकतंत्र ख़तरे में है, जाँच एजेंसियों का दुरपयोग हो रहा है व संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता छिन गई है जैसे आरोप लगा अपनी व देश की मज़ाक़ बनवा रहे हैं।इधर कुछ दिन पूर्व एक पूर्व बसपाई व भाजपाई नेता जो अब समाजवादी पार्टी में हैं कि रामचरितमानस को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी एक घटिया राजनीतिक बहस में बदल गयी और राम व रामचरितमानस पर श्रद्धा व विश्वास करने वाले वोट के इन लालची नेताओं की गिरी हुई हरकतों को देख ठगे ...
नडेला से अजय बांगा तक – क्यों सफल होते भारतवंशी

नडेला से अजय बांगा तक – क्यों सफल होते भारतवंशी

TOP STORIES, विश्लेषण
आर.के. सिन्हा भारत के सात समंदर पार से भारतवंशियों के सफलता की खबरें-कहानियां लगातार भारतीय मीडिया की सुर्खियां बनने लगी हैं। आप गौर करें कि भारतवंशी सिर्फ सियासत में ही झंडे नहीं गाड़ रहे हैं। ये तो हम 1960 के दशक से सुन रहे हैं। तब पहली बार कैरेबियाई टापू देश गुयाना में छेदी जगन राष्ट्राध्यक्ष बने थे। उनके बाद न जाने कितने भारतवंशी गुयाना, त्रिनिडाड, फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम में सर्वोच्च पदों पर पहुंचे। अब ब्रिटेन में भारतवंशी और इंफोसिस कंपनी के फाउंडर चेयरमैन एन.नारायणमूर्ति के दामाद श्रषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गए। अब बात सियासत से हटकर बिजनेस की करेंगे। आप जानते हैं कि बीते बीसेक सालों के दौरान इंदिरा नुई (पेप्सी), पराग अग्रवाल ( ट्विटर), विक्रम पंडित ( सिटी बैंक), सुंदर पिचाई ( गूगल),  सत्या नेडाला (माइक्रोसॉफ्ट), ...
हिरण पर क्यों लादें घांस ?

हिरण पर क्यों लादें घांस ?

विश्लेषण, सामाजिक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक हमारे राजस्थान और उत्तरप्रदेश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ आ रही है लेकिन ज़रा रूस की तरफ देखें। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन ने कल एक राजाज्ञा पर दस्तखत किए हैं, जिसके अनुसार अब रूस के सरकारी कामकाज में कोई भी रूसी अफसर अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेगा। इस राजाज्ञा में यह भी कहा गया है कि अंग्रेजी मुहावरों का प्रयोग भी वर्जित है। लेकिन जिन विदेशी भाषा के शब्दों का कोई रूसी पर्याय ही उपलब्ध नहीं है, उनका मजबूरन उपयोग किया जा सकता है। रूस ही नहीं, चीन, जर्मनी, फ्रांस, और जापान जैसे देशों में स्वभाषाओं की रक्षा के कई बड़े अभियान चल पड़े हैं। आजकल दुनिया काफी सिकुड़ गई है। सभी देशों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कूटनीति, आवागमन आदि काफी बढ़ गया है। इसीलिए इन क्षेत्रों से जुड़े लोगों को विदेशी भाषाओं का ज्ञान जरूरी है लेकिन भारत-जैसे अंग्रेजों के पूर्व...
भारत : अपराध और सजा की दर ?

भारत : अपराध और सजा की दर ?

EXCLUSIVE NEWS, विश्लेषण, सामाजिक
एनसीआरबी से आए आंकड़ों के बाद देश के राज्यों में सभी प्रकार के अपराधों कुल सज़ा दर बहस हुई।एक चिंतन शिविर भी गृह मंत्रालय द्वारा सूरजकुण्ड, फरीदाबाद में आयोजित हुआ। देश के सभी राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के गृह मंत्रियों ने इस चिन्तन शिविर में आपराधिक मामलों में सज़ा दर को बढ़ाने पर व्यापक विचार-विमर्श किया । राज्य एकमत थे कि आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि अधिकतम मामलों में अपराधियों को अदालतों से सज़ा मिले। किसी भी देश में आपराधिक मामलों में दोष सिद्धि दर वहां की आपराधिक न्याय प्रणाली की कार्यक्षमता एवं सामर्थ्य को दर्शाती है। भारत में दोष सिद्धि दर लगभग 68 प्रतिशत है, वहीं पाकिस्तान में ये 10 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। विकसित देशों जैसे इंग्लैंड व अमेरिका में दोष सिद्धि दर 80 प्रतिशत से भी अधिक है। यहां यह बताना जरूरी है कि हत्या, बलात्कार व हत्या के ...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व का विराट दर्शन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व का विराट दर्शन

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण, साहित्य संवाद
हमलोगों को "हिंदू" कब से कहा जाया जाने लगा ये तो ठीक-ठीक नहीं पता पर मेरे ख्याल से ये नाम हमारे लिए सबसे उपयुक्त नाम है क्योंकि ये सर्वसमावेशी नाम है जो हमारी सामूहिक प्रकृति को सबसे ठीक से परिभाषित करती है। महाभारत के बाद से भारत कई अवैदिक मतों की उद्भव स्थली बनी। बौद्ध, जैन और सिख मत जन्में। अगर और ज्यादा विस्तृत रूप में कहें तो हिंदुत्व वो है जिसमें सनातनी, बौद्ध, जैन, निंबार्ककी, सिख (सिखों में भी सहजधारी, केशधारी) लिंगायत, गृहस्थ, संन्यासी, नास्तिक, वैदिक, अवैदिक, अज्ञेयवादी, निरंकारी, प्रकृति पूजक, मशान पूजक, सुधारवादी, जड़वादी, कैवल्य, रामस्नेही सबके सब इस के अंदर समाहित है। दिक्कत ये हुई कि ये सब जो पंथ-उपपंथ-मत- संप्रदाय आदि जन्में इन सबके अपने गुरु, अपने इष्ट, अपने प्रवर्तक और अपने तीर्थंकर हैं। इनके अपने तीर्थ हैं। अपनी परंपराएं हैं। अपने आश्रम और कर्मकांड हैं तो जब तक इन...
होली है नफरत को प्यार में बदलने का रंग-पर्व

होली है नफरत को प्यार में बदलने का रंग-पर्व

TOP STORIES, विश्लेषण, संस्कृति और अध्यात्म, सामाजिक
-ललित गर्ग -बदलती युग-सोच एवं जीवनशैली से होली त्यौहार के रंग भले ही फीके पड़े हैं या मेरे-तेरे की भावना, भागदौड़, स्वार्थ एवं संकीर्णता से होली की परम्परा में धुंधलका आया है। परिस्थितियों के थपेड़ों ने होली की खुशी को प्रभावित भी किया है, फिर भी जिन्दगी जब मस्ती एवं खुशी को स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना मांगती है तब प्रकृति एवं परम्परा हमें होली जैसा रंगारंग त्योहार देती है। इस त्योहार की गौरवमय परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए हम एक उन्नत आत्मउन्नयन एवं सौहार्द का माहौल बनाएं, जहां हमारी संस्कृति एवं जीवन के रंग खिलखिलाते हुए देश ही नहीं दुनिया में अहिंसा, प्रेम, भाई-चारे, साम्प्रदायिक सौहार्द के रंग बिखेरे। पर्यावरण के प्रति उपेक्षा एवं प्रदूषित माहौल के बावजूद जीवन के सारे रंग फीके न पड़ पाए।होली एक ऐसा त्योहार है, जिसका धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक-आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष मह...
दिल्ली दंगों का तीसरा साल, जख्म जो अब तक नहीं भरा

दिल्ली दंगों का तीसरा साल, जख्म जो अब तक नहीं भरा

EXCLUSIVE NEWS, Today News, TOP STORIES, विश्लेषण
आशीष कुमार 'अंशु' यह दिल्ली दंगे का तीसरा साल है। अब लोग धीरे धीरे उसे भूलने लगे हैं लेकिन जिन परिवारों को इस दंगे ने जख्म दिए हैं। वे भूलने की कोशिश करते हैं और फरवरी का महीना हर साल सबकुछ फिर से याद दिला देता है। 22 फरवरी 2020 तक सबकुछ सामान्य था और 23 तारीख से पूर्वनियोजित योजना बनाकर दिल्ली को आग में झोंक देने की साजिश रची गई। सामने आए कथित तौर पर साजिश रचने वाले दर्जनों नाम अब जमानत पर रिहा हैं। दिल्ली के इतिहास पर यह दंगा एक बदनुमा दाग बन कर छप गया है। जहां कुछ राजनीतिक चेहरे भी बेनकाब हुए जो यहां के दलितों और पीछड़ों को भरोसा दे रहे थे कि वे उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसा कोई कथित अम्बेडकरवादी पीड़ित परिवारों से मिलने नहीं आया। देखा गया कि भीम आर्मी के लोग इस मुद्दे पर अपना मुंह छुपाते रहे। इस पूरे मामले में आरोपियों में मुसलमानों का नाम शामिल था, संभव है कि भीम आर्मी के नेता यद...
India’s iron and steel industry capable of emitting less and producing more

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CSE conducts stakeholder meet on decarbonising India’s iron and steel sector. Underlines the need for better planning, new technologies and adequate finance to help the sector make the much-needed shift in today’s climate-stressed world Download CSE’s new report here: https://www.cseindia.org/decarbonizing-india-s-iron-and-steel-sector-report-11434 Follow the workshop proceedings here: https://www.cseindia.org/workshop-on-decarbonizing-india-s-iron-and-steel-sector-by-2030-and-beyond-11623 New Delhi, February 28, 2022: “The iron and steel industry is an emission-intensive sector. Our new analysis shows it is possible to bring down carbon dioxide (CO2) emissions from our iron and steel sector drastically by 2030, while more than doubling India’s output of s...