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विश्लेषण

भारत में मुस्लिम क्यों और कब से ‘असुरक्षित’?*

भारत में मुस्लिम क्यों और कब से ‘असुरक्षित’?*

TOP STORIES, राष्ट्रीय, विश्लेषण
बलबीर पुंज गत दिनों राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भारत को मुस्लिमों के लिए असुरक्षित बताते हुए कहा, "...हमने अपने अपने बेटा-बेटी को कहा कि उधर (विदेश) ही नौकरी कर लो, अगर नागरिकता भी मिले तो ले लेना.. अब भारत में माहौल नहीं रह गया है...।" विवाद बढ़ने पर सिद्दीकी ने खेद प्रकट तो किया, किंतु अपने वक्तव्य के मर्म पर अड़े रहे। भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, शेष विश्व में प्रवासी भारतीयों की संख्या तीन करोड़ से अधिक है, जिनमें से अधिकांश उज्जवल भविष्य, व्यक्तिगत विकास और अधिक धन अर्जित करने हेतु वर्षों से स्वदेश से बाहर है। इनमें से कई अपनी नागरिकता तक बदल चुके है। क्या इनके लिए यह कहना उचित होगा कि वे सभी भारत में 'असुरक्षा' या 'माहौल बिगड़ने' के कारण देश छोड़ने को विवश हुए?  साधारणत: किसी एक व्यक्ति के नकारात्मक विचारों की अनदेख...
सभ्य समाज में जीवन से हार मानते लोगों का बढ़ना

सभ्य समाज में जीवन से हार मानते लोगों का बढ़ना

विश्लेषण, सामाजिक
 -ललित गर्ग- महज 20 वर्ष की उम्र में मशहूर टीवी एक्ट्रेस तनीषा शर्मा ने अपने सीरियल की शूटिंग के सेट पर फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली। इसी तरह पिछले कुछ सालों में बालीवुड या टेलीविजन में अभिनय की दुनिया में अपनी अच्छी पहचान बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत, वैशाली ठक्कर, आसिफ बसरा और कुशल पंजाबी से लेकर परीक्षा मेहता जैसे अनेक कलाकारों ने आत्महत्या की। प्रश्न है कि इन स्थापित कलाकारों ने आत्महत्या क्यों की? आखिर मनोरंजन की दुनिया में अचानक आत्महत्या कर लेने की घटनाएं क्यों बढ़ रही है? निश्चित रूप से खुदकुशी सबसे तकलीफदेह हालात के सामने हार जाने का नतीजा होती है और ऐसा फैसला करने वालों के भीतर वंचना का अहसास, उससे उपजे तनाव, दबाव और दुख का अंदाजा लगा पाना दूसरों के लिए मुमकिन नहीं है। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता ...
भारतभूमि

भारतभूमि

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
दिल्ली में रहते हुए और लगभग तीन दशकों तक कभी कभार ही इधर उधर की यात्रा करते हुए मैं‌ इस भूमि से लगभग कटा रहा। किन्तु भारत के बड़े शहर इस भूमि को समझने का माध्यम-स्थल हो सकते हैं। दृष्टि होनी चाहिए। यहां के महानगर न्यूयॉर्क जैसे महानगर नहीं हैं। न्यूयॉर्क में अमीरी गरीबी की खाई है किन्तु सांस्कृतिक फांक नहीं है। यहां एक बड़ी सांस्कृतिक फांक है। सहजता से दृश्य भी। यहां सभ्यता और संस्कृति ग्राम्य जीवन के साथ प्रवहमान है। वह बड़े महानगरों में भी ग्राम्य चरित्र के साथ भासित होती है। मैंने इस महानगर में अतिसाधारण मनुष्यों के बीच होते हुए यह अनुभव किया है कि आधुनिकता ने हमें लीला नहीं है।‌ बल्कि भारतीयता यहां भाषा में अनुस्वार और अन्य वर्णों की तरह अनिवार्यत: उपस्थित है। किसी बुझते हुए घूरे को देखकर हम मान लेते हैं कि यह ठंडा पड़ चुका है।‌किन्तु जरा सा कुरेदने पर राख के नीचे से लहकती काष्...
क्यों मोहम्मद इकबाल को बनाया जाता है महान

क्यों मोहम्मद इकबाल को बनाया जाता है महान

TOP STORIES, विश्लेषण
आर.के. सिन्हा उर्दू के शायर मोहम्मद इकबाल एक बार फिर से खबरों में हैं। दरअसल वे इस बार खबरों में इसलिए हैं, क्योंकि; उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के फरीदपुर स्थित एक सरकारी स्कूल में 'मदरसे वाली प्रार्थना' कराये जाने का आरोप लगाते हुए एक स्कूल के प्रधानाचार्य और शिक्षा मित्र के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है। इन पर आरोप है कि ये  सरकारी स्कूल में 'मेरे अल्लाह, मेरे अल्लाह' बोल वाली एक प्रार्थना कराकर दूसरे धर्मों की धार्मिक भावनाएं आहत कर रहे थे। इन पर जो भी कार्रवाई होनी होगी वह तो हो ही जाएगी। वैसे जिस रचना पर बवाल मचा है वह कहते हैं कि मोहम्मद इकबाल ने ही लिखी थी। अब कुछ सेक्युलरवादी यह कह रहे हैं कि मोहम्मद इकबाल तो बहुत महान शायर थे। उनकी लिखी रचना को स्कूल में पढ़े जाने पर बवाल करना गलत है। इकबाल को महान बताने वालों को पता नहीं है कि ये...
भारत में शिक्षा का सुधार अत्यन्त आवश्यक*

भारत में शिक्षा का सुधार अत्यन्त आवश्यक*

TOP STORIES, विश्लेषण, साहित्य संवाद
शिक्षा देश की रीढ़ की हड्डी होती है। किसी भी देश की प्रगति तथा वहाँ के नागरिकों का भविष्य वहाँ की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ही निर्भर करता है। भारत सरकार इस तथ्य से भली-भांति परिचित है इसीलिए शिक्षा नीति के अन्तर्गत समय-समय पर परिवर्तन किए जाते रहें हैं। नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत शिक्षा को 5 + 3 + 3 + 4 के चरणों में बांटा गया है। पूर्व प्राथमिक स्तर 3 वर्ष एवं कक्षा 1 व 2 को आधारभूत शिक्षा के अन्तर्गत रखा गया है जिसमें 3 से 5 वर्ष तक के बच्चों को बिना किसी बस्ते के बोझ के खेल-कूद के माध्यम से शिक्षा के प्रति रूचि बढ़ाने का प्रयास किया गया है। 6 से 8 वर्ष की अवस्था में बच्चे की औपचारिक शिक्षा को आरम्भ करने का प्रावधान रखा गया है उस अवस्था में बच्चा परिपक्व हो जाता है और उसको स्वयं का ज्ञान होना प्रारम्भ हो जाता है। अक्सर यह देखा गया है कि 8 से 11 वर्ष की आयु के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल अथवा ...
देखिये ! आत्महत्या करते देश के भविष्य को

देखिये ! आत्महत्या करते देश के भविष्य को

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
निश्चित ही यह आंकड़े ह्रदय विदारक है | भारत में दुर्घटनावश एवं आत्महत्या में करने वाले लोगों की राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिपोर्ट-2021सामने है | यूँ तो यह रिपोर्ट इस साल अगस्त में जारी हुई है। जो यह दर्शाती है कि पिछले साल देश भर में 13000 से अधिक छात्रों ने जान दी है। वास्तव में, 2016-2021 के दौरान छात्र-आत्महत्या के मामलों में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 1832 मौतों के साथ महाराष्ट्र सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद मध्य प्रदेश (1,308) तमिलनाडु (1246) आते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच सालों में छात्र आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।अफ़सोस सरकारें दुःख व्यक्त करने से अधिक कुछ भी नहीं कर रहीं हैं | हाल ही में राजस्थान के कोटा में दाखिला परीक्षा की तैयारी कर रहे तीन किशोर छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या ने पूरे देश को सकते में डाल दिया। उनमें दो, अंकुश और उज्ज्वल बिहार से थे और...
तकनीकी के साथ – योगी आदित्यनाथ !

तकनीकी के साथ – योगी आदित्यनाथ !

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
- प्रशांत पोळ  १९ मार्च, २०१७ को रविवार था. भारतीय तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण सप्तमी थी. इस दिन लखनऊ के काशीराम स्मृति उपवन में, एक भगवे वस्त्र पहने हुए ४४ वर्ष का युवा, भारत के सबसे बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा था.  भारतीय जनता पार्टी का, योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय, अनेकों को अचरज भरा लगा था. कुछ तथाकथित बुध्दिजीवियों ने तो खुलकर कहा की ‘उत्तर प्रदेश में तो अब परंपरावादी, दकियानूसी और धार्मिक कट्टरता का राज चलेगा.‘ एक भगवाधारी संत के मुख्यमंत्री बनने पर ऐसी प्रतिक्रियाएं देश के विभिन्न भागों से निकल कर आ रही थी. उत्तर प्रदेश पहले से अविकसित राज्य की श्रेणी में था. उद्योगों की संख्या बहुत कम थी. इसलिए रोजगार के अवसर भी नगण्य थे. उत्तर प्रदेश के युवा, रोजगार की तलाश में देश के अन्य शहरों में जाते थे. पर्यटन ...
ये तनातनी और न्याय के लिए भटकते नागरिक

ये तनातनी और न्याय के लिए भटकते नागरिक

BREAKING NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
इस न्यायालयीन प्रशासन के लिए किसे दोष दें ? हमारे देश भारत में,प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 20 न्यायाधीश हैं, जो बेहद कम हैं। वर्ष 2016 से अब तक की अवधि में, मुकदमों की लंबित संख्या जिला अदालतों में 2 करोड़ 65 लाख से बढ़कर 4 करोड़ 11 लाख हो गई है, जो कि 54.64 प्रतिशत की वृद्धि है। चार करोड़ मामले निचली अदालतों में जबकि 42 लाख दीवानी मामले और 16 लाख आपराधिक मामले उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। उच्चतम न्यायालय में भी 68435 मामले लंबित हैं।उच्च और सर्वोच्च नयालयों में जजों की नियुक्ति को लेकर तनातनी जारी है | सरकार और न्यायपालिका के बीच यह तनातनी कोई नयी बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से मामला गहराता दिख रहा है। ख़ास तौर पर केंद्रीय कानून मंत्री के उस बयान के बाद जिसमें उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम को लेकर गंभीर सवाल उठाए।   आंकड़ों की बात करें तो 30 नवंबर, 2022 तक उच्च न्यायलय के...
अध्यापकों को भी मिले ग्रेच्युटी की रक़म

अध्यापकों को भी मिले ग्रेच्युटी की रक़म

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
रजनीश कपूरकिसी भी कंपनी या प्रतिष्ठान में लंबे समय तक काम करने वाले व्यक्ति को सेवानिवृत होने पर पेंशन, प्रोविडेंट फंड के अलावाग्रेच्युटी की रक़म भी मिलती है। ग्रेच्‍युटी किसी कर्मचारी को कंपनी की ओर से मिलने वाला इनाम होता है। अगर कर्मचारीनौकरी की कुछ शर्तों को पूरा करता है तो ग्रेच्‍युटी का भुगतान एक निर्धारित फॉर्मूले के तहत निश्चित तौर पर दिया जाताहै। अगस्त 2022 तक सभी निजी स्कूल के अध्यापकों को इस सुविधा का लाभ नहीं मिलता था। हाल ही में देश के सर्वोच्चन्यायालय ने कई सालों से लंबित पड़े इस मामले में निजी स्कूल के अध्यापकों के हित में एक अहम फ़ैसला दिया है। जोअध्यापकों के पक्ष में है।याचिकाकर्ता ने अदालत से स्पष्ट करने की अपील की थी कि ‘पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972’ की धारा 2 के तहत निजीस्कूल के अध्यापकों को कर्मचारी माना जाए या नहीं? 29 अगस्त 2022 को सर्वोच्च न्यायालय की एक खण्डपी...
कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा, बन गई भारत तोड़ो यात्रा

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा, बन गई भारत तोड़ो यात्रा

राज्य, विश्लेषण
कांग्रेस कर रही है हिंदी, हिंदू व सनातन संस्कृति का अपमान मृत्युंजय दीक्षित कांग्रेस नेता राहुल गांधी की पुनर्स्थापना की महत्वाकांक्षी योजना, “भारत जोड़ो यात्रा” ने अब सौ दिन से अधिक दिन पूरे कर लिए हैं लेकिन यात्रा के दौरान हुयी गतिविधियों और राहुल गांधी के बयानों ने इसे “भारत तोड़ो यात्रा बना दिया है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि नफरत के इस बाजार में वह मोहब्बत का पैगाम लेकर चल रहे हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। यात्रा का अब तक का पूरा समय या तो ऐसे लोगों से मिलने में बीता है जो भारत और हिन्दू विरोधी रहे हैं या फिर भारत के प्रधानमंत्री को अपशब्द कहते किन्तु विगत कुछ दिनों में तो राहुल गांधी व उनके पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने  सभी मर्यादाओें को ताक पर रख कर विषवमन प्रारंभ  कर दिया है। चीनियों ने अरुणाचल के तवांग में शरारत करने की हिमाकत की जिनको हमारे व...