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जीसस के समय में रोमन धर्म

जीसस के समय में रोमन धर्म

धर्म, विश्लेषण
---------------------------------------------------लेखक : राजेश आर्य, गुजरात रोमन धर्म - एक रूपरेखा : पढनें में यह थोडा विचित्र लगेगा, पर हम हमारे धर्म विषयक वर्तमान सभी विचारों को एक तरफ रख कर ही रोमन संसार में धर्म का स्वरूप और कार्य ठीक तरह से समझ सकते है। आज हमारी धर्म (मजहब या रिलीजन) की क्या अवधारणा है? प्रायः हम हमारे धर्म को पवित्र शास्त्र (वेद, बाईबल, कुरआन, आदि), संगठन या पदानुक्रम (जैसे कि विभिन्न ईसाई सम्प्रदाय, पोप, बिशप, पादरी, आदि), कर्म और उनके फल, परलोक में विश्वास, विभिन्न पूजा या उपासना पद्धति, नैतिक प्रतिबद्धता, मजहबी मान्यता (जैसे कि जीसस परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है, जीसस ने हमारे पापों के लिए स्वयं का बलीदान दिया, आदि), धर्म और राज्य का अलगाव, आदि के संदर्भ में समझते है, पर एकमात्र यहूदी मत के अपवाद को छोड़कर, रोमन संसार के किसी भी धर्म पर इनमें से एक भी बिंदु...
क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं?

क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं?

राज्य, विश्लेषण, सामाजिक
क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं? ललित गर्ग  केरल के पथानामथिट्टा में अमीर बनने की चाहत में तांत्रिक के कहने पर दो महिलाओं की बलि देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। मामले में नरभक्षण का भी संदेह जताया जा रहा है। संदेह है कि आरोपियों ने महिलाओं के लाश के टुकड़े पकाकर खाए। यह खौफनाक एवं डरावना घटनाक्रम एक शत प्रतिशत शिक्षित प्रांत के लिये लज्जाजनक होने के साथ-साथ नये भारत, सशक्त भारत पर नये सिरे से चिन्तन करने की जरूरत को व्यक्त करते हुए अनेक ज्वलंत प्रश्न खड़े करता है। निश्चित ही इस क्रूर घटनाक्रम से देश कांप उठा है। देश में धर्म के नाम पर बिखरी विसंगतियों एवं असुविधाजनक स्थितियों पर नियंत्रित करने की जरूरत है। ऐसे अनेक तांत्रिक एवं धर्म के ठेकेदार समृद्धि, सत्ता एवं सुख देने के नाम पर भोले-भाले लोगों को न केवल ठगते हैं, बल्कि उनसे आपराधिक कृत्य भी करवाते हैं। इ...
विकसित देशों की तुलना में भारत में तेजी से कम हो रही है गरीबी

विकसित देशों की तुलना में भारत में तेजी से कम हो रही है गरीबी

TOP STORIES, विश्लेषण
विकसित देशों की तुलना में भारत में तेजी से कम हो रही है गरीबी विकसित देशों के कुछ अर्थशास्त्रियों ने भारत के विरुद्ध जैसे एक अभियान ही चला रखा है और भारत के आर्थिक विकास को वे पचा नहीं पा रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था ने अप्रेल-जून 2022 तिमाही में 13.5 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की है और वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने जा रहा है। इस प्रकार भारत न केवल आज विश्व की सबसे तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था बन गया है बल्कि भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन गया है। परंतु, फिर भी इन अर्थशास्त्रियों द्वारा मानव विकास सूचकांक में भारत को श्रीलंका से भी नीचे बताया जाना, आश्चर्य का विषय है। यह विरोधाभास इन अर्थशास्त्रियों को कहीं दिखाई नहीं दे रहा है, जबकि श्रीलंका की हालत तो जग जाहिर है एवं आर्थिक दृष्टि से भारत एवं श्रीलंका की तुलना ही न...
जन-जन तक विज्ञान प्रसार

जन-जन तक विज्ञान प्रसार

BREAKING NEWS, CURRENT ISSUE, EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
‘जन-जन तक विज्ञान प्रसार’ नई दिल्ली, 10 अक्टूबर (इंडिया साइंस वायर): 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन भारत का उदय समूचे विश्व से औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की विदाई की प्रस्तावना सिद्ध हुआ। सदियों की पराधीनता से मुक्त हुए भारत ने द्रुत आर्थिक विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की राह चुनी। सन् 1958 में 'वैज्ञानिक नीति संकल्प पत्र' (साइंटिफिक पॉलिसी रेज़ोलुशन) पर भारतीय संसद ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई। लक्ष्य था; सभी समुचित संसाधनों द्वारा विज्ञान एवं वैज्ञानिक शोध का पोषण, विस्तार एवं उसकी निरंतरता सुनिश्चित करना। देशभर में प्रौद्योगिकी और विज्ञान शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध एवं विकास संस्थानों की स्थापना की मुहिम शुरू हुई। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद आज भारत विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के क्षेत्र में एक वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। एक आधुनिक स...
शरद पूर्णिमा और रत्नाकर से महर्षि बनने की यात्रा करने वाले महापुरूष वाल्मीकि-

शरद पूर्णिमा और रत्नाकर से महर्षि बनने की यात्रा करने वाले महापुरूष वाल्मीकि-

TOP STORIES, विश्लेषण, संस्कृति और अध्यात्म
शरद पूर्णिमा ( इस वर्ष 9 अक्टूबर 2022) पर विशेष शरद पूर्णिमा और रत्नाकर से महर्षि बनने की यात्रा करने वाले महापुरूष वाल्मीकि- शरद पूर्णिमा- आश्विन मास की पूर्णिमा का दिन शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार पूरे साल केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिंदू धर्म में लोग इस पर्व को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था और यह भी मान्यता प्रचलित है कि इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। इसी कारण से उत्तर भारत में इस दिन खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने का विधान है। महात्म्य- मान्यता है कि इस दिन कोई व्यक्ति यदि कोई अनुष्ठान करता है तो उसका अनुष्ठान अवश्य सफल होता है। इस दिन व्रत कर हाथियों की आरती करने पर उत्तम फल मिलते हैं। आश्विन मास की पूर्णिमा को आर...
अब नहीं आती अपनों की चिट्ठी-पत्री

अब नहीं आती अपनों की चिट्ठी-पत्री

BREAKING NEWS, EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण
(9 अक्टूबर विश्व डाक दिवस विशेष) अब नहीं आती अपनों की चिट्ठी-पत्री संचार क्रांति के इस युग में अब नहीं आती कहीं से भी अपनों की चिट्ठी-पत्री। बदलते दौर में घर से जाते समय अब कोई नहीं कहता कि पहुंतें ही चिट्ठी लिखना। आज की नयी पीढ़ी पत्र लेखन की कला से कोसो दूर है। वास्तव में नयी पीढ़ी यह भी नयी जानती कि डाकिया भी कोई होता है। चैटिंग के इस ज़माने में  न ही उसे पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र व लिफाफ की जानकारी है। आज इंटरनेट, फोन व मोबाइल ने अब लगभग चिट्ठी लिखने की परंपरा को समाप्त कर दिया है। बरसों पूर्व में घर से बाहर जाते समय कहा जाता था कि पहुंचतें ही पत्र लिखना। लेकिन अब न ही कोई कहता है और न ही पत्र लिखने की जरूरत है। भागदौड़ भरी जिंदगी में घर से निकलकर मंजिल तक...
तनाव पर भारी पड़ती मुस्कान

तनाव पर भारी पड़ती मुस्कान

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
तनाव पर भारी पड़ती मुस्कान या तनाव से मुक्ति का मंत्र है मुस्कान डॉ. शंकर सुवन सिंह दया शब्द को कई नामों से जाना जाता हैं जैसे करुणा, सहानुभूति, अनुकंपा, कृपा, रहम, आदि। परिस्थिति जन्य की गई सेवा दया कहलाती है। मनोस्थिति जन्य की गई सेवा करुणा कहलाती है। करुणा स्वभाव गत होती है। जिस इंसान में करुणा है उसके लिए बाहर की कोई भी परिस्थिति उस पर प्रभाव नहीं डाल पाती। सामान्य भाषा में कहें तो करुणा का ही प्रतिरूप है दया। एक मनोस्थति जन्य और दूसरा परिस्थति जन्य है। दया परिस्थति पर निर्भर करती है। करुणा मन की स्थिति पर निर्भर करती है। करुणावान व्यक्ति दयालु भी होता है। दयालु व्यक्ति करुणामयी हो ऐसा जरुरी नहीं। महावीर, गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरुष करुणामयी थे। इनमे दयालुता भी थी। हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थ रामचरित मानस के लेखक गोस्वामी तुलसीदास जी ने दया को धर्म का मूल कहा था। दया...
कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकते; क्षमा ताकतवर की विशेषता है।

कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकते; क्षमा ताकतवर की विशेषता है।

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
(राष्ट्रीय क्षमा और खुशी दिवस - 7 अक्टूबर) कमज़ोर कभी माफ नहीं कर सकते; क्षमा ताकतवर की विशेषता है। सामाजिक जीवन तभी संभव है जब हम बात करें, चर्चा करें और एक-दूसरे की छोटी-छोटी गलतियों को क्षमा करें। क्षमा के लिए एक आवश्यक मूल्य इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के लिए सम्मान है। आतंकवादी गतिविधियां, उग्रवाद, नक्सलवाद, सांप्रदायिक दंगे आदि खुद को बदले की कार्रवाई के रूप में और अतीत में की गई गलतियों को सुधारने की कोशिश करने वाले कृत्यों के रूप में सही ठहराते हैं। इस तरह के कृत्यों का उद्देश्य गलत के बजाय गलत करने वाले का सफाया करना ही संघर्षों को बढ़ाता है। आज, भारतीय समाज उस चौराहे पर है जहां विभिन्न समुदाय या वर्ग समाहित हो रहे हैं, इसलिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए क्षमा और स्वीकृति के कार्य का अभ्यास करना चाहिए। चूँकि शांति प्रत्येक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है जो बिना क...
रासायनिक उर्वरकों को कम करें, धरती के घाव भरें

रासायनिक उर्वरकों को कम करें, धरती के घाव भरें

TOP STORIES, विश्लेषण
रासायनिक उर्वरकों को कम करें, धरती के घाव भरें कीटनाशकों को सब्जी पर लगाया जाता है जो सीधे मानव या पशुओं के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग भूमिगत जल को नाइट्रेट से प्रदूषित कर सकता है और यह मनुष्यों या पशुओं के लिए बहुत खतरनाक है। नाइट्रेट केंद्रित पानी रक्त में कुछ हीमोग्लोबिन को स्थिर कर सकता है। संतुलित उपयोग पानी की कम खपत को भी प्रतिबिंबित करेगा, साथ ही साथ जल निकायों को अपवाह प्रदूषण से बचाएगा। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि विज्ञान केंद्रों के नेटवर्क के अलावा कृषि, सहयोग और किसान कल्याण और उर्वरक विभागों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से संतुलित उर्वरक के बारे में किसान जागरूकता को बढ़ाया जाना चाहिए। सिक्किम राज्य द्वारा दिखाए गए अनुसार प्राथमिकताओं और सब्सिडी को रासायनिक से जैविक खेती में बदलना समय की मांग है।-डॉ सत्यवान सौरभकीटों और रोगों ने मौजूदा...
अंग्रेजों के अत्याचारों पर ये खामोशी क्यों ?

अंग्रेजों के अत्याचारों पर ये खामोशी क्यों ?

EXCLUSIVE NEWS, विश्लेषण
अंग्रेजों के अत्याचारों पर ये खामोशी क्यों ? विनीत नारायण पिछले कुछ वर्षों से मुसलमानों को लेकर दुनिया के तमाम देशों में चिंता काफ़ी बढ़ गई है। हर देश अपने तरीक़े से मुसलमानों की धर्मांधता से निपटने के तरीक़े अपना रहा है। खबरों के मुताबिक़ चीन इस मामले में बहुत आगे बढ़ गया है। वैसे भी साम्यवादी देश होने के कारण चीन की सरकार धर्म को हेय दृष्टि से देखती है। पर मुसलमानों के प्रति उसका रवैया कुछ ज़्यादा ही कड़ा और आक्रामक है। इसी तरह यूरोप के देश जैसे फ़्रांस, जर्मनी, हॉलैंड और इटली भी मुसलमानों के कट्टरपंथी रवैए के विरुद्ध कड़ा रुख़ अपना रहे हैं। इधर भारत में मुसलमानों को लेकर कुछ ज़्यादा ही आक्रामक तेवर अपनाए जा रहे हैं। इस विषय पर मैंने पहले भी कई बार लिखा है। मैं अपने सनातन धर्म के प्रति आस्थावान हूँ। पर यह भी मानता हूँ कि धर्मांधता और कट्टरपंथी रवैया, चाहे किसी भी धर्म का हो, पूर...