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दिल दा मामला है

दिल दा मामला है

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दिल दा मामला है *रजनीश कपूर मशहूर पंजाबी गायक गुरदास मान का दुनिया भर में चर्चित गाना ‘दिल दा मामला है’ आज एक बार फ़िर से चर्चा में है। इसलिए नहीं कि अचानक यह गाना फिर से लोकप्रिय होने लगा है। इसलिए कि आजकल सोशल मीडिया में ऐसी तमाम ख़ौफ़नाक खबरें सामने आ रही हैं जिनमें हंसते-खेलते लोगों को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। ज़्यादातर देखा गया है कि दिल का दौरा या हार्ट अटैक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों आता है। दिल का दौरा पड़ने के और कारणों में से प्रमुख है मधुमय या शुगर के मरीज़ और ब्लड प्रेशर के मरीज़। इन मरीज़ों में हार्ट अटैक की संभावना काफ़ी अधिक होती है। इसके साथ ही धूम्रपान करने वाले व्यक्ति भी दिल के मरीज़ कब बन जाते हैं इसका पता नहीं चलता। इसका कारण यह है कि धूम्रपान करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को ...
लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक

लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक

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लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक- ललित गर्ग-गुजरात के दिसम्बर-2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव प्रचार में आम आदमी पार्टी ने ‘रेवड़ी कल्चर’ का सहारा लिया तो राजनीतिक हलकों में यह विषय एक बार फिर चर्चा में आ गया। इन दिनों उच्चतम न्यायालय से लेकर राजनीति क्षेत्रों में ‘रेवड़ी कल्चर’ को लेकर व्यापक चर्चा आम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुक्त की संस्कृति पर तीखे प्रहार करते रहे हैं। मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है, खासकर तब जब चुनाव नजदीक हों। ‘फ्रीबीज’ या मुफ्त उपहार न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में वोट बटोरने का हथियार हैं। यह एक राजनीतिक विसंगति एवं विडम्बना है जिसे कल्याणकारी योजना का नाम देकर राजनीतिक लाभ  की रोटियां सेंकी जा रही है। यह तय करना कोई मुश्किल काम नहीं है कि कौनसी कल्याणकारी योजना है और कौनसी मुफ्तखोरी यानी ‘रेवड़ी कल्...
ये देश है, सड़क दुर्घटनाओं का

ये देश है, सड़क दुर्घटनाओं का

BREAKING NEWS, EXCLUSIVE NEWS, विश्लेषण
ये देश है, सड़क दुर्घटनाओं का* वैसे तो यह एक विकास और स्वास्थ्य संबंधी विषय है, पर डेढ़ लाख मौतों के बाद भी भारत में अभी भी इसे महज कानून-व्यवस्था का मामला माना जाता है | इस विषय पर आई अधिकारिक जानकारी भी चौकानें वाली है |राष्ट्रीय अपराध आंकड़ा ब्यूरो (एनसीआरबी) से आई जानकारी के अनुसार वर्ष २०२१ में लगभग १ लाख ५५ व्यक्तियों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई है। सडक दुर्घटनाओ में घायलों की संख्या अधिक यानी लाख ७१ हजार रही, भारत में कुल सड़क दुर्घटनाओं की गिनती ४ लाख से ऊपर है।हर वर्ष राष्ट्रीय अपराध आंकड़ा ब्यूरो द्वारा जारी रिपोर्ट का जिक्र बस एक खबर की तरह ली जाती है इसके बाद शेष पूरे वर्ष इस पर नाममात्र या किसी प्रकार की सार्वजनिक चर्चा नहीं होती। जबकि सरकार भरपूर कर वसूल करती है | ब्यूरो की इस रिपोर्ट में राज्य-वार आंकड़े और विस्तृत जानकारी में दुर्घटनाओं में शामिल वाहनों की किस्में भ...
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष

विश्लेषण
 विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष आत्महत्या मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण क्यों है ?अब समय आ गया है कि हम अपने शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र को नए अर्थों, जीवन जीने के नए विचारों और नई संभावनाओं को संजोने के तरीकों से नए सिरे से तलाशने की कोशिश करें जो अनिश्चितता के जीवन को जीने लायक जीवन में बदल सकें। आत्महत्या को रोका जा सकता है। आत्महत्या के बारे में सोचने वाले युवा अक्सर अपने संकट की चेतावनी के संकेत देते हैं। माता-पिता, शिक्षक और मित्र इन संकेतों को समझने और सहायता प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थिति में हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन चेतावनी के संकेतों को कभी भी हल्के में न लें या इन्हें गुप्त रखने का वादा न करें। माता-पिता आत्महत्या जोखिम मूल्यांकन के महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं क्योंकि उनके पास अक्सर मानसिक स्वास्थ्य इतिहास, पारिवारिक गतिशीलता, हाल की दर्दन...
याकूब मेमन- हत्यारे को हीरो बनाने वाले कौन?

याकूब मेमन- हत्यारे को हीरो बनाने वाले कौन?

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याकूब मेमन- हत्यारे को हीरो बनाने वाले कौन? आर.के. सिन्हा यह सिर्फ अपने भारत में ही संभव है कि मुंबई बम धमाकों के साजिशकर्ता याकूब मेमन को नायक बनाने की चेष्टा की जाती है। उसे सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा होती है, तो उसे बचाने के लिए देश के बहुत सारे स्वयंभू उदारवादी-सेक्युलरवादी रातों रात सामने आ जाते हैं। उसकी शव यात्रा में हजारों लोग शामिल भी होते हैं। फिर उसे फांसी हो जाती है। तब उसकी कब्र को सजाया जाता है। उसका इस तरह से रखरखाव होता है कि मानो वह कोई महापुरुष हो। मुंबई में याकूब मेमन की कब्र के ‘‘सौंदर्यीकरण’’ करने के ठोस सुबूत मिल रहे हैं और उसे एक इबादत गाह में बदलने की कोशिश की जा रही थी। जब इस तरह के आरोपों की सच्चाई सामने आई तो मुंबई पुलिस ने आतंकवादी की कब्र के चारों ओर लगाई गई ‘एलईडी लाइट’ को हटाया। याकूब मेमन को 2015 में नागपुर जेल में फांसी दी गई थी। उसे दक्षिण मुंबई के बड़...
भारत में बढ़ते साइबर अपराध और बुनियादी ढांचे में कमियां।

भारत में बढ़ते साइबर अपराध और बुनियादी ढांचे में कमियां।

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भारत में बढ़ते साइबर अपराध और बुनियादी ढांचे में कमियां। 'पुलिस' और 'सार्वजनिक व्यवस्था' राज्य सूची में होने के कारण, अपराध की जांच करने और आवश्यक साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का प्राथमिक दायित्व राज्यों का है। हालांकि भारत सरकार ने सभी प्रकार के साइबर अपराध से निपटने के लिए गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की स्थापना सहित कई कदम उठाए हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। चूंकि पारंपरिक अपराध के साक्ष्य की तुलना में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रकृति में पूरी तरह से भिन्न होते हैं, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से निपटने के लिए मानक और समान प्रक्रियाएं निर्धारित करना आवश्यक है। प्रत्येक जिले या रेंज में एक अलग साइबर-पुलिस स्टेशन स्थापित करना, या प्रत्येक पुलिस स्टेशन में तकनीकी रूप से योग्य कर्मचारी, आवेदन, उपकरण और बुनियादी ढांचे के परीक्षण ...
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस विशेष

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस विशेष

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(अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस विशेष) स्कूल न जाने वाले बच्चों में लड़कियों का आज भी बड़ा हिस्सा। हाई स्कूल के बाद 50 प्रतिशत लड़कियों की शादी हो जाती है और बाकी 12वीं में आ जाती हैं। इसके बाद इनमें से लगभग 25 प्रतिशत लड़कियाँ कॉलेज में दाखिला लेती हैं। यदि लड़कियों को 12वीं के बाद किन्हीं तरह की नौकरियाँ मिल जाती हैं तो वे भी पढ़ाई छोड़ देती हैं। माता-पिता अपनी लड़कियों की सुरक्षा को लेकर चिन्तित रहते हैं। उन्हें इस बात का भी डर रहता है कि ज़्यादा शिक्षित होने पर लड़कियाँ कहीं भाग न जाएँ। अपने सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार कम उम्र में विवाह, लड़कियों को घर और गाँव से बाहर जाने की अनुमति नहीं है क्योंकि यह एक सामाजिक वर्जना है, माता-पिता अपने कार्यस्थलों पर जाते हैं और घरेलू गतिविधियाँ छोटी बच्चियों द्वारा की जाती हैं, छोटे बच्चों की देखभाल की जाती है। -डॉ सत्यवान सौरभ पिछले दशकों में ...
गायों की हो रही है दुर्दशा

गायों की हो रही है दुर्दशा

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गायों की हो रही है दुर्दशा भारतीय संस्कृति में जिस गाय को 'मां' की संज्ञा दी गई है, उसका ऐसा हश्र लम्पी बीमारी से पहले कभी नहीं हुआ। गायों की दुर्दशा को लेकर अब सिर्फ जिनके घर गाय है वो ही चिंतित हैं। क्या गाय बचाने की जिम्मेवारी सिर्फ पशुपालन विभाग की ही बनती है, बाकी समाज केवल तमाशा देखे। आज तथाकथित गौभगत और गाय के नाम पर लूटकर खाने वाले चाहे वो कोई भी हो लगभग गायब है। (इक्का-दुक्का को छोड़कर) मृत गायों को खुले में फेंकने से संक्रमण तेजी से फेल रहा है। कहीं यह महामारी न बन जाए। क्योंकि मृत गायों की दुर्गंध और प्रदूषण से आस-पास के लोगों में भी अन्य बीमारियां फ़ैल रही है। 'एक शाम, गायों के नाम' पर करोड़ों रुपए लेने वाले और गाय के ठेकेदार बागङबिल्ले सब कहाँ छुप गए? आखिर गायों की हो रही है दुर्दशा? गाय रो-रो कर पूछ रही है, कहां गए वह गौ सेवक? कहां गई वह राजनीतिक पार्टियां जो मेरे नाम पर सरक...
नाक से दिए जाने वाले कोविड-19 टीके के आपात उपयोग को नियामक मंजूरी

नाक से दिए जाने वाले कोविड-19 टीके के आपात उपयोग को नियामक मंजूरी

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नाक से दिए जाने वाले कोविड-19 टीके के आपात उपयोग को नियामक मंजूरी नई दिल्ली, 09 सितंबर (इंडिया साइंस वायर): जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और इसके सार्वजनिक उपक्रम; जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) के समर्थन से भारत बायोटेक द्वारा विकसित नाक से दिये जाने वाले (Intranasal ) कोविड-19 टीके के आपात उपयोग को नियामक मंजूरी मिल गई है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के ताजा वक्तव्य में यह जानकारी दी गई है। बीबीवी154 इंट्रानैसल COVID-19 वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग के लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) द्वारा मंजूरी दी गई है। बीबीवी154 नाक से दिया जाने वाला प्रतिकृति-अल्पता (इंट्रानैसल रेप्लिकेशन-डेफिसिएन्ट) वाले चिंपैंजी एडेनोवायरस सार्स-कोव-2 (SARS-COV-2) वेक्टरीकृत वैक्सीन है। इसमें स्थिर स्पाइक एसएआरएस–सीओवी-2 (वुहान वेरिएंट) को व्यक्त करने में सक्षम प्रतिकृ...
हिजाबः हिरन पर क्यों लादे घांस?

हिजाबः हिरन पर क्यों लादे घांस?

राज्य, विश्लेषण
*हिजाबः हिरन पर क्यों लादे घांस?* *डाॅ वेदप्रताप वैदिक* आजकल सर्वोच्च न्यायालय में बहस चल रही है कि कर्नाटक की मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनें या न पहनें? उच्च न्यायालय ने हिजाब पर पाबंदी को उचित ठहराया है। यहां बहस यह नहीं है कि हिजाब पहनना उचित है या नहीं? सिर्फ स्कूल की छात्राएं पहने या न पहनें, यह प्रश्न है। इस मुद्दे पर पहला सवाल तो यही उठना चाहिए कि हिजाब पहना ही क्यों जाए? क्या इसलिए पहना जाए कि डेढ़ हजार साल पहले अरब देशों की औरतें उसे पहनती थीं? उनकी नकल हिंदुस्तान की औरतें क्यों करें? क्या उन अरब औरतों की नकल हमारी लड़कियां करेंगी तो क्या वे बेहतर मुसलमान बन जाएंगी? हमारे भारतीय मुसलमान भी समझते हैं कि वे अरबों की तरह कपड़े पहनें, दाढ़ी रखें, टोपी पहनें तो वे बेहतर मुसलमान बन जाएंगे। मेरा निवेदन यह है कि बेहतर मुसलमान बनने के लिए अरबों की नकल करना जरुरी नहीं है। जरुरी है कुरान शरी...