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वायु प्रदूषण से लड़खड़ाता स्वास्थ्य

वायु प्रदूषण से लड़खड़ाता स्वास्थ्य

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
वायु गुणवत्ता बहुत खराब होने का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। इससे रेस्पिरेटरी इश्यू, हार्ट प्रॉब्लम बढ़ने के अलावा और भी कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।हाई लेवल के वायु प्रदूषण के कारण कई तरह के प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणाम हो सकते हैं। इससे श्वसन संक्रमण, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। जो पहले से ही बीमार हैं, उन पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। बच्चे, बुजुर्ग और गरीब लोग इसके ज्यादा शिकार होते हैं। जब पार्टिकुलेट मैटर  2.5 होता है, तो यह फेफड़ों के मार्ग में गहराई से प्रवेश करने लगता है। -प्रियंका सौरभ वायु प्रदूषण का भारत में मानव स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। यह बीमारी के लिए दूसरा सबसे बड़ा जोखिम कारक है और वायु प्रदूषण की आर्थिक लागत सालाना 150 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। भारत में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में वाहन उत्...
कब खरीदकर पढ़ी जाएंगी किताबें ?

कब खरीदकर पढ़ी जाएंगी किताबें ?

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
आर.के. सिन्हा आप जब इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे तब राजधानी में विश्व पुस्तक मेला शुरू हो गया होगा। कोरोना के कारण विश्व पुस्तक मेला बीते कुछ सालों से आयोजित नहीं हो पा रहा था। जाहिर है कि पुस्तक मेले के फिर से आयोजन से शब्दों के शैदाइयों के चेहरे खिले हुए हैं। वे अपने मन-पसंद की किताबें सस्ते दामों पर खरीदेंगे। पर ये भी सच है कि इस डिजिटल दौर में किताबों से पाठकों की दूरियां निश्चित रूप से बढ़ी हैं। बहुत बड़ी संख्या में पाठक अपने मोबाइल पर ही अपनी दिलचस्पी की सामग्री पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं। वे किताबें खरीदने की जरूरत ही नहीं महसूस करते। बेशक, किताबों को फिर से प्रासंगिक तो बनाना ही होगा। वह कितना अज्ञानी समाज होता है जहां पर किताबों के महत्व को सही ढंग से नहीं समझा जाता। आमतौर पर हमारे यहां कहानियों, कविताओं,उपन्यासों, जीवनियों से जुड़ी किताबें बहुतायत में छपती ह...
मातृभाषा सांस्कृतिक और भावात्मक एकता का माध्यम

मातृभाषा सांस्कृतिक और भावात्मक एकता का माध्यम

EXCLUSIVE NEWS, राष्ट्रीय, सामाजिक
अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस- 21 फरवरी, 2023 पर विशेष-ः ललित गर्ग :-दुनिया भर में भाषा की सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में पूरी जागरूकता विकसित करने, उसकी समझ और संवाद के आधार पर एकजुटता को प्रेरित करते हुए मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिये यूनेस्को द्वारा हर वर्ष 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देना। यूनेस्को द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आन्दोलन दिवस को अन्तरराष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन् 1952 से मनाया जाता रहा है। बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। 2008 को अन्तरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए, संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर दोहराया है। 2023 के अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा द...
भारत : इंसाफ़ से पीड़ित बचपन

भारत : इंसाफ़ से पीड़ित बचपन

BREAKING NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
भारत सरकार ने संसद में यह जानकारी देते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं कि देश भर में बच्चों के खिलाफ अपराध की धाराओं के तहत दर्ज पचास हजार से ज्यादा मामलों में बच्चों को न्याय का इंतजार है। किसी भी देश और समाज में अपराधों पर काबू पाने की कड़ी व्यवस्था के बावजूद अगर आपराधिक घटनाओं पर लगाम नहीं लग पाती, तो यह सरकार और तंत्र की नाकामी का ही सबूत कहा जाएगा है। जिस देश में बच्चों के खिलाफ न सिर्फ अपराध की घटनाएं लगातार जारी हों, और उनमें न्याय मिलने की दर भी काफी धीमी हो तो यह एक बेहद अफसोसनाक स्थिति है। इसे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही कहा जा सकता है। सबको पता है कि हमारे देश में बच्चों के बहुस्तरीय उत्पीड़न और उनके यौन शोषण जैसे अपराधों की रोकथाम में जब पहले के बनाए गए कानूनी प्रावधान नाकाफी साबित हुए, तब पाक्सो यानी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम जैसी विशेष व्यवस्था की गई। इसके विपर...
क्यों झेल रही निराशा, स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा?

क्यों झेल रही निराशा, स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा?

BREAKING NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
आशा कार्यकर्ता अपने निर्दिष्ट क्षेत्रों में घर-घर जाकर बुनियादी पोषण, स्वच्छता प्रथाओं और उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में जागरूकता पैदा करते हैं। वे मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि महिलाएं प्रसव पूर्व जांच कराती हैं, गर्भावस्था के दौरान पोषण बनाए रखती हैं, स्वास्थ्य सुविधा में प्रसव कराती हैं, और बच्चों के स्तनपान और पूरक पोषण पर जन्म के बाद का प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। फिर भी आशा को श्रमिकों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है और इस प्रकार उन्हें प्रति माह 18,000 रुपये से कम मिलता है। वे भारत में सबसे सस्ते स्वास्थ्य सेवा प्रदाता हैं। प्रोत्साहन राशि की प्रतिपूर्ति में देरी से आशा कार्यकर्ताओं के आत्म-सम्मान को ठेस पहुंची है और इसका असर उनके सेवा वितरण पर पड़ा है। केवल सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल और संबंधित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन पर सर्...
आखिर क्यों देश में दहेज हत्या के मामले आसमान छू रहे हैं?

आखिर क्यों देश में दहेज हत्या के मामले आसमान छू रहे हैं?

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
भले ही लोग जानते हैं कि दहेज एक अपराध है, फिर भी समाज में यह बुराई अभी भी मौजूद है। हाल ही में एक युवती ने दहेज प्रताड़ना की शिकायत के बाद आत्महत्या कर ली। उसके मामले में, 102 गवाह थे और उसके वॉयस नोट सहित 53 सबूत उसके पति को भेजे गए थे जहाँ उसने अपने ससुराल वालों से हुई यातना की शिकायत की थी। यह सिर्फ उसकी ही नहीं बल्कि कई अन्य महिलाएं हैं जो दहेज की धमकियों का सामना करती हैं और मर जाती हैं क्योंकि उनके परिवार दहेज की मांगों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। अंतर यह है कि ऐसी घटनाएं प्रकाश में नहीं आती क्योंकि पीड़ित इसके बारे में चुप रहने का फैसला करते हैं। शोध के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में, सजा दर बहुत कम है और दुख की बात यह है कि इन मामलों में शायद ही कोई दोषी साबित होता है। - डॉ सत्यवान सौरभ दहेज, एक सांस्कृतिक प्रथा जो कई भारतीय समुदायों में गहराई से निहित है, दुल्हन के साथ द...
सोचिये चैटजीपीटी पर; कितने खतरे, कितने अवसर।

सोचिये चैटजीपीटी पर; कितने खतरे, कितने अवसर।

BREAKING NEWS, TOP STORIES, राष्ट्रीय, सामाजिक
जब भी कोई नया अविष्कार या तकनीक आती है तो उसको लेकर तमाम संभावनाएं या आशंकाएं जताई जाती है। चैटजीपीटी को लेकर भी इन दिनों बहस छिड़ी हुई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मानव जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल के दिनों में, यूएस-आधारित नवीनतम एआई उपकरणों में से एक, चैटजीपीटी (जनरेटिव प्री-ट्रेन्ड ट्रांसफॉर्मर) ने लोकप्रियता हासिल की। क्योंकि इसने शिक्षा प्रणाली पर इसके प्रभाव और छात्रों के लिए वरदान या अभिशाप पर गहन बहस शुरू कर दी। शिक्षाविदों के अनुसार, इसे छात्रों के नियमित कार्यों को सुव्यवस्थित करने के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग करें, लेकिन निर्भर न हों या इसके गुलाम न बनें, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे सीखने की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है। -प्रियंका सौरभ चैटजीपीटी, ओपन एआई का नया चैटबॉट, एक 'संवादात्मक' एआई है जो मानव की तरह ही प्रश्नों का उत्तर देता है। यह (जन...
श्रद्धा जैसे एक और कांड से रूह कांप गयी

श्रद्धा जैसे एक और कांड से रूह कांप गयी

TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
- ललित गर्ग-राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में फिर एक और श्रद्धा हत्याकांड जैसा त्रासद, अमानवीय एवं खौफनाक मामला सामने आया है। दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में एक युवती निक्की यादव की उसी के प्रेमी साहिल गहलोत द्वारा हत्या कर उसका शव ढाबे के फ्रिज में छुपाने के मामले ने रोंगटे खड़े कर दिये, रूह को कंपा दिया। समाज में बढ़ती हिंसक वृत्ति, क्रूरता एवं संवेदनहीनता से केवल महिलाएं ही नहीं बल्कि हर इंसान खौफ में है। मानवीय संबंधों में जिस तरह से महिलाओं की निर्मम हत्याएं हो रही हैं उसे लेकर बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं। विडंबना यह है कि समाज का दायरा जैसे-जैसे उदार एवं आधुनिक होता जा रहा है, जड़ताओं को तोड़ कर युवा वर्ग नई एवं स्वच्छन्द दुनिया में अलग-अलग तरीके से जी रहा है, संबंधों के नए आयाम खुल रहे हैं, उसी में कई बार कुछ युवक अपने लिए बेलगाम जीवन सुविधाओं को अपना हक समझ कर ऐसी हिंसक एवं अमानवीय घटनाओ...
महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज्यादा बीमारियां होने की संभावना, जानें कारण

महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज्यादा बीमारियां होने की संभावना, जानें कारण

TOP STORIES, राष्ट्रीय, सामाजिक
डॉ.गौरव जैनसीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन,धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशलिटी अस्पताल क्या आप जानते हैं कि औरतों की तुलना में मर्द ज्यादातर बीमारियों की चपेट में आते हैं। यदि बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं की तुलना की जाए, तो महिलाओं के बजाए पुरुषों में ज्यादा जीवन जीने की संभावना कम रहती है, क्योंकि उन्हें कई प्रकार की बीमारियां घेर लेती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, साल 2016 में महिलाओं की वैश्विक आबादी की औसत उम्र 72 साल थी। लेकिन लैंगिक आधार पर महिलाओं की औसत उम्र 74 साल दो महीने थी। वहीं, पुरुषों की औसत उम्र 69 साल आठ महीने थी। ह्यूमन मॉर्टेलिटी इंडेक्स के पास इस समय 40 देशों से जुड़े आंकड़े मौजूद हैं। इनमें स्वीडन और फ्रांस जैसे देशों के 1751 और 1816 के आंकड़े शामिल हैं। लेकिन रूस और जापान जैसे देशों के आंकड़े सिर्फ 20 वीं शताब्दी के उपलब्ध हैं। लेकिन इस डेटाबेस में हर साल महिल...

राष्ट्र-चिंतन उर्दू तो विखंडन की भाषा रही है

राष्ट्रीय, सामाजिक
विष्णुगुप्त अभी-अभी उर्दू को लेकर परतंत्रवाद-सेक्युलरवाद और परसंस्कृतिवाद की वैचारिक गुलामी देखने और समझने को मिली। अवसर था वरिष्ठ कवि महेश बंसल की जन्मतिथि पर आयोजित राष्टीय कवि सम्मेलन का। कवि सम्मेलन में मेरे अतिरिक्त डॉ सुरेश नीरव और डा सरस्वत मोहन मनीषी सहित देश भर से आये एक दर्जन से अधिक कवि शामिल थे। अधिकांश कवियों के शब्द और अंदाज उर्दू प्रेरित थे, संस्कृत निष्ठ हिन्दी के शब्द गायब थे। देश में उर्दू को लेकर वैचारिक परतंत्रता, अति सेक्युलरवाद और परसंस्कृतिवाद कोई नयी घटना-परिघटना नहीं है, यह तो मुगलकालीन विकृति है जो निरंतर जारी है। अंग्रेज के जमाने में भी उर्दू की विकृति जारी रही और आजादी के बाद भी उर्दू को देश की भाषा समझने का विकृति जारी रही। उर्दू में बोलना और उर्दू में लिखना तुष्टीकरण की एक बहुत बड़ी चाल थी, एक खास परसंस्कृति को संतुष्ट रखने का हथकंडा था, वह परसंस्कृति हिंस...