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कोरोना की नई लहर से कितना डर?

कोरोना की नई लहर से कितना डर?

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*विनीत नारायणपिछले कुछ दिनों से चीन में कोरोना की नई लहर को लेकर काफ़ी भयावह दृश्य सामने आए हैं। कोरोना के नये वेरिअंट नेचीन में अपना आतंक दिखाना शुरू कर दिया है। चीन के अलावा कई और देशों में भी इस नये वेरिअंट के मरीज़ पाए गए हैं।दुनिया भर में डर का माहौल बना हुआ है। भारत समेत कई देशों ने कोरोना के इस नये जिन्न से निपटने के लिए सभीसावधानियाँ बरतनी शुरू कर दी हैं। भारत के सभी राज्यों के मुख्य मंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जनता से सावधान रहनेकी अपील कर रहे हैं। सबके मन में प्रश्न है कि हमें इस नए वेरिअंट से कितना डरना चाहिए?सोशल मीडिया पर चीन में आई कोरोना की नई लहर से ऐसे आँकड़े सुनने को मिल रहे हैं कि इस लहर में दस लाख सेअधिक लोगों की मौत हो सकती है। चीन की 60 प्रतिशत आबादी इसकी चपेट में आ जाएगी। ये भी कि दुनिया भर की 10प्रतिशत आबादी इस नई लहर का शिकार हो जाएगी। ये सब दावे कितने सच्...
इन ईसाई शख्सियतों पर करता देश नाज

इन ईसाई शख्सियतों पर करता देश नाज

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देश के 10 खास ईसाई कौन विवेक शुक्ला क्रिमसम का पर्व मनाया जा रहा। चर्च और ईसाइयों के घर सजे हुए हैं। केक के आर्डर तो पहले ही दिए जा चुके थे। यह मौका है जब हम अपने उन ईसाइयों की बात करें जिन पर देश नाज करता है। इस लिहाज से पहला नाम सुप्रीम कोर्ट के वकील हरीश साल्वे का लेंगे। वे जब कोर्ट में हाथ हिला-हिलाकर जिरह करते हैं तो उनकी जुबान पर सरस्वती होती है। वे भारत सरकार से लेकर रिलायंस और टाटा ग्रुप के लिए पैरवी कर चुके हैं। डॉ. टेसी थॉमस भी देश के  ईसाई समाज सेहै। उन्हें भारत में मिसाइल वुमन के नाम से जाता है। वह अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की अहम जिम्मेदारी संभालने वालीं देश की पहली महिला साइंटिस्ट हैं। अभी वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ( डीआरडीओ) में महानिदेशक एयरोनॉटिकल प्रणाली हैं। टेसी मिसाइल के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथप्रदर्शक साबित हुई हैं। टेसी थॉमस 1988 में डीआरड...
सामाजिक नीति के बजाय जाति आधारित वोट-बैंक की राजनीति

सामाजिक नीति के बजाय जाति आधारित वोट-बैंक की राजनीति

BREAKING NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
सामाजिक नीति के बजाय जाति आधारित वोट-बैंक की राजनीति ग्राम स्तर पर भी पंचायत राज चुनावों में जाति व्यवस्था हावी रही है। जोधपुर संभाग में चुनाव के दौरान जाति आधारित मुद्दों जैसे जाटों को आरक्षण आदि के लिए पार्टियां चलती हैं। इसी तरह उड़ीसा में भूमिहार, कायस्थ और राजपूत चुनाव के समय अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं और अपनी जाति के उम्मीदवारों को कार्यालय में देखने की इच्छा रखते हैं।  जाति भारत में राजनीति को प्रभावित नहीं कर रही है, बल्कि इसका प्रभाव अधिक बलपूर्वक और प्रभावी ढंग से है। स्वतंत्र भारत में यह आशा की जाती थी कि जाति धीरे-धीरे अपना प्रभाव समाप्त कर देगी। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि चीजें हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी हैं और जाति अभी भी राजनीति को प्रभावित करती है। -डॉ सत्यवान सौरभ भारत में सामाजिक संरचना की प्रमुख विशेषता जाति व्यवस्था है। जाति व्यवस्था अपने सबसे सा...
इन राष्ट्रवादी ईसाइयों पर है भारत को नाज

इन राष्ट्रवादी ईसाइयों पर है भारत को नाज

TOP STORIES, सामाजिक
आर.के. सिन्हा क्रिसमस को आने में अब गिनती के दिन शेष हैं। गिरिजाघरों से लेकर सभी ईसाई परिवारों के घर सजने लगे हैं। इस तरह से यह कहा जा सकता है कि मान्यता है कि भारत में ईसाई धर्म की शुरुआत सबसे पहले केरल से हुई थी। माना जाता है कि ईसा मसीह के 12 प्रमुख शिष्यों में से एक सेंट थॉमस केरल में आए थे। भारत आने के बाद सेंट थॉमस ने 7 चर्च बनावाए। बहरहाल, यह क्रिसमस एक इस तरह का अनुपम अवसर है, जब हम जीवन के अलग-अलग भागों में भारत में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राष्ट्रवादी ईसाइयों की बात करें। इस लिहाज से पहला नाम डॉ. टेसी थॉमस का जेहन में आता है। उन्हें भारत में मिसाइल वुमन के नाम से जाता है। वह अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की अहम जिम्मेदारी संभालने वालीं देश की पहली महिला साइंटिस्ट हैं। अभी वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ( डीआरडीओ) में महानिदेशक एयरोनॉटिकल प्रणाली हैं। टेसी मिसाइल के क्षे...
टुकड़ों में कटता प्रेम और रिश्तों का संबंध – सिद्गार्थ शंकर गौतम

टुकड़ों में कटता प्रेम और रिश्तों का संबंध – सिद्गार्थ शंकर गौतम

TOP STORIES, सामाजिक
इन दिनों एक से एक वीभत्स हत्याओं की खबर आ रही हैं। ऐसी घटनाओं में हत्या ही नहीं की जा रही बल्कि हत्या के बाद वीभत्स तरीके से शवों को ठिकाने भी लगाया जा रहा है। नई दिल्ली में प्रेमी आफताब पूनावाला द्वारा श्रद्धा वॉकर की निर्ममतापूर्ण हत्या के बाद शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके फेंकने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि झारखण्ड के साहिबगंज में दिलदार अंसारी ने आदिवासी लड़की रुबिका पहाड़ी की हत्या कर शव के 50 टुकड़े किए और उन्हें जंगलों में फेंक दिया। उधर जयपुर में एक भतीजे ने अपनी चाची का खून किया और उनके शव को 10 टुकड़ों में काटकर उसे सूटकेस में भरकर जंगलों में फेंक आया। इससे पहले उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मोदी नगर इलाके में मकान मालिक उमेश ने अपने किरायेदार पीएचडी स्कॉलर अंकित खोकर की गला दबाकर हत्या करने के बाद उसके शव को टुकड़ों में काट कर फेंक दिया। दिल्ली में ही एक महिला प...
भारत सक्षम है मानव-एकता को बल देने में

भारत सक्षम है मानव-एकता को बल देने में

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
-ः ललित गर्ग:- अंतरराष्ट्रीय मानव एकता दिवस हर साल 20 दिसंबर को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों के बीच मानवीय एकता के महत्व को बताने के लिए, गरीबी पर अंकुश लगाना और विकासशील देशों में मानव और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है। संयुक्त राष्ट्र ने 22 दिसंबर 2005 को यह दिवस मनाने की घोषणा की थी। इस दिवस को विश्व एकजुटता कोष और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, जो दुनियाभर में गरीबी उन्मूलन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित हैं। इस दिवस को मनाते हुए हर व्यक्ति शिक्षा में योगदान देकर, गरीबों या शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम लोगों की मदद करके अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस दिवस के माध्यम से सरकारों को सतत विकास लक्ष्य के गरीबी और अन्य सामाजिक बाधाओं का जवाब देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विविधता में एकता दर्शाने, विभिन्न स...
ठाकुर रोशन सिंह का बलिदान 

ठाकुर रोशन सिंह का बलिदान 

TOP STORIES, सामाजिक
19 दिसम्बर 1927 : क्रांतिकारी रामप्रसाद  विस्मल, अशफ़ाकउल्ला और  ठाकुर रोशन सिंह का बलिदान  काॅकोरी कांड में मिली थी फाँसी  --रमेश शर्मा  भारत की स्वतंत्रता के लिये कितने बलिदान हुये, कितने क्राँतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी इसका समूचा विवरण इतिहास की पुस्तकों से भी नहीं मिलता । अंग्रेजों के सामूहिक अत्याचार से बलिदान हुये निर्दोष नागरिकों के आकड़े निकाल दें तब भी अंग्रेजों ने जिन्हें फाँसी पर चढ़ाया उनकी संख्या हजारों में है । ऐसे ही बलिदानी हैं क्राँतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान और राजेंद्र लाहिड़ी । इन चारों क्राँतिकारियों  को काॅकोरी कांड में फाँसी की सजा सुनाईं गयी, लेकिन क्राँतिकारी राजेन्द्र लाहिड़ी को निर्धारित तिथि के दो दिन पहले ही गौंडा जेल में फाँसी दे दी गयी । जबकि तीन क्राँतिकारियों राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर ...
जाति व्यवस्था से ज्यादा हीन या श्रेष्ठ मानना एक समस्या है।

जाति व्यवस्था से ज्यादा हीन या श्रेष्ठ मानना एक समस्या है।

सामाजिक
जाति आधारित व्यवसाय कोई समस्या नहीं है लेकिन एक व्यवसाय को हीन या श्रेष्ठ मानना एक समस्या है। हर पेशे का सम्मान होना चाहिए। महात्मा गांधी की "ब्रेड लेबर" (हर किसी को कुछ शारीरिक श्रम करना चाहिए) और "ट्रस्टीशिप" (पूंजीपतियों का समाज के प्रति ऋण) की अवधारणा इसी पर आधारित है। इससे जाति आधारित समस्याओं को एक हद तक कम किया जा सकता है। लोगों के दिमाग से अंतर्विवाह और शुद्ध रक्त की प्रथा को मिटा देना चाहिए। सभी को जाति, धर्म या किसी अन्य पहचान के बावजूद व्यक्ति से विवाह करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यह पहचान आधारित समस्याओं को भी कम कर सकता है। जाति व्यवस्था कोई अभिशाप नहीं है। लेकिन एक जाति को श्रेष्ठ या प्रभुत्वशाली मानने को बंद कर देना चाहिए। जाति को निजी स्थान तक सीमित रखा जाना चाहिए और सार्वजनिक डोमेन में नहीं लाना चाहिए। साक्षरता का स्तर बढ़ाना और मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना ...
शिक्षा से खिलवाड़ करने वाले शिक्षकों के दाग -ः ललित गर्ग:

शिक्षा से खिलवाड़ करने वाले शिक्षकों के दाग -ः ललित गर्ग:

समाचार, सामाजिक
राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने एवं तरह-तरह के कानूनों के प्रावधानों के बावजूद आजादी का अमृत महोत्सव मना चुके राष्ट्र के शिक्षा के मन्दिर बच्चों पर हिंसा करने, पिटने, सजा देने के अखाडे़ बने हुए है, शिक्षक अपनी मानसिक दुर्बलता एवं कुंठा की वजह से बच्चों के प्रति बर्बरता की हदें लांघ रहे हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार शिक्षा में अभिनव क्रांति करने का ढ़िढोरा पीट रही है, लेकिन अपने शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं पर सवार हिंसा की मानसिकता को दूर करने का कोई सार्थक उपक्रम नहीं कर पायी है। यही कारण है कि दिल्ली में एक प्राथमिक विद्यालय की एक शिक्षिका ने पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची को न केवल बुरी तरह पीटा, बल्कि कैंची से वार करते हुए उसे पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया। ऐसी क्रूर, हिंसक एवं बर्बर घटना को अंजाम देने वाली शिक्षिका को बच्चों को पढ़ाने-लिखाने लायक माना जा सकता है? बात केवल दिल्ली...
बदलिए, शिक्षा जगत की तदर्थ तस्वीर को

बदलिए, शिक्षा जगत की तदर्थ तस्वीर को

सामाजिक
देश के शिक्षा जगत की तस्वीर बहुत उज्जवल नहीं है | स्कूलों से लेकर देश के उच्च शिक्षा के केंद्र शिक्षकों की कमी से गुजर रहे हैं | मध्यप्रदेश सरकार ने आगामी विधानसभा चुनाव को दृष्टि में रखकर स्कूलों में रिक्त विभिन्न श्रेणी के अध्यापकों के पद भरने के आश्वासन को हकीकत में बदलने का निर्णय लिया है, आगामी ३० दिसम्बर से सरकार इसमें जुट रही है | वैसे देखा जाये तो स्कूल से लेकर  केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) उच्च शिक्षा के श्रेष्ठ एवं आधारभूत संस्थान  शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं|   देश की प्रगति में स्कूल से लेकर इन शिक्षा और  शोध व अनुसंधान केन्दों का योगदान किसी से छिपा नहीं है | सरकार राज्य की हो या केंद्र की महत्वपूर्ण योगदान वाले इन संस्थानों अपनी विचारधारा के अनुरूप चलाना चाहती है , इससे ही इन रिक्तियों का नि...