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इमारतों की भूकंपीय-भेद्यता आकलन की नयी पद्धति

इमारतों की भूकंपीय-भेद्यता आकलन की नयी पद्धति

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नई दिल्ली, 25 नवंबर (इंडिया साइंस वायर): बड़े पैमाने पर इमारतों या फिर अन्य संरचनाओं की मजबूती का आकलन करने के लिए अक्सर रैपिड विज़ुअल स्क्रीनिंग (आरवीएस) की जाती है। आरवीएस दृश्य सूचना का उपयोग यह तय करने के लिए करता है कि कोई इमारत कितनी सुरक्षित है और भूकंप सुरक्षा को बढ़ाने के लिए तत्काल इंजीनियरिंग सुधार एवं मरम्मत की कितनी आवश्यकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के शोधकर्ताओं ने हिमालय क्षेत्र में भूकंप झेलने की इमारतों की क्षमता का आकलन करने के लिए एक नया तरीका विकसित किया है। भूकंप के प्रति इमारतों की संवेदनशीलता का पता लगाने की यह पद्धति सरल है, जो भूकंप के प्रति भवनों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक सुदृढ़ीकरण और मरम्मत कार्यों की प्राथमिकता तय करने में उपयोगी हो सकती है।  व्यापक क्षेत्र सर्वेक्षणों के माध्यम से, शोधकर्ताओं ने मंडी के हिमालय क्...
धरती संरक्षण की राह तलाशती दुनिया

धरती संरक्षण की राह तलाशती दुनिया

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विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस -26 नवम्बर 2022-ललित गर्ग-विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस  प्रतिवर्ष 26 नवम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने एवं लोगों को जागरूक करने के सन्दर्भ में सकारात्मक कदम उठाने के लिए मनाते हैं। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के द्वारा आयोजित किया जाता है। पिछले करीब दो-तीन दशकों से ऐसा महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण से जुड़ी हुई है, बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, भयंकर तूफान, सुनामी और भी कई प्राकृतिक आपदाओं का होना आदि ज्वलंत समस्याएं विकराल होती जा रही है। ये समस्याएं जितनी गंभीर होती जा रही है, इससे निपटने के गंभीर प्रयासों का उतना ही अभाव महसूस हो रहा है। अमीर एवं शक्तिशाली देश इस वैश्विक समस्या के प्रति उदासीन है। गरीब देश इस समस्या से जूझ रहे हैं और उनके पास इसके निदान के ...
चुनाव आयोग और ये व्यवस्था के प्रश्न ?

चुनाव आयोग और ये व्यवस्था के प्रश्न ?

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चुनाव आयोग और ये व्यवस्था के प्रश्न ?* देश की व्यवस्था अजीब है,हर चुनाव के बाद ई वी एम पर सवाल खड़े होते रहे हैं, अब देश के चुनाव आयुक्त पर ही सवाल उठने लगे हैं | देश के सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त के तौर पर अरुण गोयल की नियुक्ति के लिए अपनायी प्रक्रिया पर सवाल ही नहीं उठाया बल्कि यह तक कहा कि उनकी फाइल को ‘जल्दबाजी' में मंजूरी दी गयी। सुप्रीम कोर्ट अदालत ने यहाँ कहा कि गोयल की नियुक्ति से जुड़ी फाइल को ‘बहुत तेजी से' क्लियर किया गया।इस पर केंद्र सरकार ने अटॉर्नी जनरल के जरिए कोर्ट से ‘थोड़ा रुकने' के लिए कहा तथा मामले पर विस्तारपूर्वक गौर करने का अनुरोध किया। सवाल देश की व्यस्था पर है, ७५ साल बाद भी देश पारदर्शी चुनाव व्यवस्था क्यों नहीं बना सका ? देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया वैसे भी सवालों की जद में है | सुप्रीम कोर्ट ने इसी सप्ताह ध्यान दिलाया था कि मुख्य ...
भारतीय ज्ञान परंपरा के लोप का अधिकार शासक और शासन को नहीं है

भारतीय ज्ञान परंपरा के लोप का अधिकार शासक और शासन को नहीं है

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-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकजसभी प्राणी और सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें। वे सब स्वधर्म में निरत रहें, इसमें राजा को व्यवधान नहीं डालना चाहिये। प्रजा को स्वधर्म में प्रवृत्त रखने से प्रजा भी सुखी रहती है और शासक भी सुखी रहता है। दोनों इस लोक में भी सुखी रहते हैं और परलोक में भी सद्गति प्राप्त करते हैं। आर्य मर्यादा को व्यवस्थित रखना और वर्णों और आश्रमों की व्यवस्था सुचारू चलती रहे यह देखना शासन का काम है। जो शासन और जो प्रजा इस प्रकार अपनी मर्यादा में रहते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते। सदा आनन्दित ही रहते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि राजा का काम समाज का अपने मन से पुनर्गठन करना नहीं है। ऐसा पुनर्गठन पाप है। परंतु लोगों की सर्वसम्मति से तथा व्यापक संवाद के द्वारा और शिष्ट परिषदों तथा विद्वत् परिषदों में सम्पन्न विमर्श एवं निर्णयों के द्वारा पुनर्गठन होता रह सकता है।किसी भी स्थिति में भा...
भागी हुई लड़कियों का बाप.. सबसे निरीह होता हैं !!

भागी हुई लड़कियों का बाप.. सबसे निरीह होता हैं !!

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      वह इस दुनिया का सबसे अधिक टूटा हुआ व्यक्ति होता है। पहले तो वह महीनों तक घर से निकलता नहीं है, और फिर जब निकलता है तो हमेशा सर झुका कर चलता है। अपने आस-पास मुस्कुराते हर चेहरों को देख कर उसे लगता है जैसे लोग उसी को देख कर हँस रहे हैं। वह जीवन भर किसी से तेज स्वर में बात नहीं करता, वह डरता है कि कहीं कोई उसकी भागी हुई बेटी का नाम न ले ले... वह जीवन भर डरा रहता है। वह रोज मरता है। तबतक मरता है जबतक कि मर नहीं जाता।     पुराने दिनों में एक शब्द होता था 'मोछ-भदरा'। जिस पिता की बेटी घर से भाग जाती थी, उसे उसी दिन हजाम के यहाँ जा कर अपनी मूछें मुड़वा लेनी पड़ती थी। यह ग्रामीण सभ्यता का अलिखित संविधान था। तब मनई दो बार ही मूँछ मुड़ाता था, एक पिता की मृत्यु पर और दूसरा बेटी के भागने पर। बेटी का भागना तब पिता की मृत्यु से अधिक पीड़ादायक समझा जाता था। तब और अब में बस इतना इतना ही...
सबकी पहुँच में हो न्याय

सबकी पहुँच में हो न्याय

TOP STORIES, सामाजिक
डॉ. शंकर सुवन सिंहसामाजिक व्यवस्था का नियंत्रण कानून के द्वारा ही संभव है| क़ानून का उद्देश्य प्रत्येक पीड़िततक न्याय को पहुँचाना है। न्याय के बिना कानून की कल्पना करना व्यर्थ है। न्याय को अंग्रेजीमें जस्टिस कहते है|जस्टिस शब्द लैटिन भाषा के जस से बना है, जिसका अर्थ है- बाँधना याजोड़ना। न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक हैं। बिना न्याय के किसी भी व्यवस्था कासंचालन असंभव है| न्याय का व्यवस्था से स्वाभाविक सम्बन्ध है। न्यायिक व्यवस्था समुदायों औरसमूहों को एक सूत्र में बाँधती है| मेरियम के अनुसार, न्याय उन मान्यताओं तथा प्रक्रियाओं कायोग है जिनके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वे सभी अधिकार तथा सुविधाएँ प्राप्त होती हैं जिन्हेंसमाज उचित मानता है। न्याय, पीड़ित व्यक्ति को बल प्रदान करता है| पीड़ित व्यक्ति न्यायव्यवस्था का लाभ लेने के लिए दर दर की ठोकरें खाता है| न्यायिक प्रक्रिया सुगम और सरलहोनी ...
ईरान में हिजाब पर जन-आक्रोश

ईरान में हिजाब पर जन-आक्रोश

TOP STORIES, राष्ट्रीय, सामाजिक
*डॉ. वेदप्रताप वैदिक* ईरान में हिजाब के मामले ने जबर्दस्त तूल पकड़ लिया है। पिछले दो माह में 400 लोग मारे गए हैं, जिनमें 58 बच्चे भी हैं। ईरान के गांव-गांव और शहर-शहर में आजकल वैसे ही हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे कि अब से लगभग 50 साल पहले शंहशाहे-ईरान के खिलाफ होते थे। इसके कारण तो कई हैं लेकिन यह मामला इसलिए भड़क उठा है कि 16 सितंबर को एक मासा अमीनी नामक युवती की जेल में मौत हो गई। उसे कुछ दिन पहले गिरफ्तार कर लिया गया था और जेल में उसकी बुरी तरह से पिटाई हुई थी। उसका दोष सिर्फ इतना था कि उसने हिजाब नहीं पहन रखा था। हिजाब नहीं पहनने के कारण पहले भी कई ईरानी स्त्रियों को बेइज्जती और सजा भुगतनी पड़ी है। कई युवतियों ने तो टीवी चैनलों पर माफी मांग कर अपनी जान बचाई है। यह जन-आक्रोश तीव्रतर रूप धारण करता जा रहा है। अब लोग न तो आयतुल्लाहों के फरमानों को मान रहे हैं और न ही राष्ट्रपति इब्र...
अपनों से बेईमानी, पतन की निशानी।

अपनों से बेईमानी, पतन की निशानी।

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हम दूसरों की आर्थिक स्थिति पर ज्यादा ध्यान देते हैं। अपनी स्थिति से असंतुष्टि ही हमें बेईमानी की तरफ धकेलती है। गरीब लोग अमीर बनने के चक्कर में और अमीर लोग अधिक अमीर बनने के चक्कर में छोटा रास्ता पकड़ते हुए धड़ाधड़ सब कुछ पा लेना चाहते हैं। छोटे रास्ते का अंकुर ही भविष्य में बेईमानी का पौधा बन जाता है। चाहे गाँवों में जमीन-जायदाद के विवाद हों या फिर शहरों में लोगों का अपने पड़ोसियों से छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े हों, सभी जगह हम दूसरों का हक छीनना चाहते हैं। यह कभी-कभी भौतिक लाभ में मदद करता है; यह सजा आदि से बचने में मदद करता है। वहीं, झूठ बोलना भी परेशानी खड़ी कर सकता है। झूठ बोलना संज्ञानात्मक रूप से क्षीण हो सकता है, यह इस जोखिम को बढ़ा सकता है कि लोगों को दंडित किया जाएगा, यह लोगों को खुद को अच्छे लोगों के रूप में देखने से रोककर उनके आत्म-मूल्य को खतरे में डाल सकता है, और यह आ...
सच्चे राष्ट्रनायक है सावरकर – ह्रदय नारायण दीक्षित

सच्चे राष्ट्रनायक है सावरकर – ह्रदय नारायण दीक्षित

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भारत अखण्ड सम्प्रभुता और राष्ट्रीयता है। हम भारत के लोग प्राचीन राष्ट्र हैं। भारत खण्डों को जोड़ कर नहीं बना लेकिन कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी को संभवतः भारत टूटा फूटा दिखाई पड़ता है। इसीलिए वे भारत जोड़ने की अपील के साथ पद यात्रा पर हैं। उन्होंने राष्ट्रवादी विचार के महानायक विनायक दामोदर सावरकर पर अभद्र टिप्पणी की है। सावरकर को अंग्रेजी सत्ता का पेंशनर बताया है। कहा है कि ”उन्होंने अंग्रेजी सत्ता की मदद की। जेल से अपनी रिहाई कि लिए माफी मांगी थी।” राहुल गाँधी का वक्तव्य क्रांतिकारी सावरकर पर घटिया आरोप है। राहुल नहीं जानते कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक समिति के मंत्री पंडित बाखले ने सावरकर जन्म तिथि अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी को पत्र लिखा था। श्रीमती गाँधी ने मई 1980 के पत्र में बाखले को उत्तर दिया, ‘‘मुझे आपका पत्र मिला। सावरकर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अति सा...
पंज प्यारों की जमीन पर देखते-देखते ही कैसे ‘पगड़ी वाले ईसाई’ छा गए

पंज प्यारों की जमीन पर देखते-देखते ही कैसे ‘पगड़ी वाले ईसाई’ छा गए

TOP STORIES, राज्य, सामाजिक
पंजाब में 65000 पादरी, जिस चर्च के 14 साल पहले थे 3 मेंबर- अब हैं उसके 300000 सदस्य: पंज प्यारों की जमीन पर ‘पगड़ी वाले ईसाइयों’ की छाया कैसे.....सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंज प्यारों की जमीन पर देखते-देखते ही कैसे 'पगड़ी वाले ईसाई' छा गए। इस सवाल का जवाब देने में जितनी देरी होगी, धर्मांतरण माफिया की जड़ें उतनी ही मजबूत होती जाएगी। भारत धर्मांतरण (Religious Conversion) के घातक जाल में उलझा हुआ है। भोले-भाले जनजातीय समाज के लोगों को प्रलोभन दे ईसाई बनाने से मिशनरियों ने इस घातक जाल के धागे जोड़ने शुरू किए। अब यह एक ऐसे जाल के रूप में सामने आ चुका है, जिसमें दलित, पिछड़े, सर्वण… सब उलझे नजर आ रहे हैं। इस घातक जाल की जद में पंजाब (Religious Conversion In Punjab) भी है। इंडिया टुडे मैगजीन ने पंजाब में ईसाई धर्मांतरण पर कवर स्टोरी की है। इससे जो तथ्य सामने आए हैं, वे बताते हैं कि यदि इस पर लग...