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एम्स को एम्स ही रहने दो

एम्स को एम्स ही रहने दो

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एम्स को एम्स ही रहने दो  आर.के. सिन्हा अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर भले ही कह गए हों कि नाम में क्या रखा है, पर कुछ नामों की तो बात ही अलग होती है। वे नाम सम्मान और आदर के लायक होते हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भी इसी तरह का एक स्थापित नाम है। एम्स यानी देश भर के मरीजों का भरोसा और विश्वास। यहां पर देशभर से हर रोज सैकड़ों रोगी और उनके संबंधी इस विश्वास के साथ आते हैं कि वे यहां से सेहतमंद होकर ही घर लौटेंगे। एम्स भी उनके भरोसे पर खरा उतरने की हरचंद कोशिश करता है। यहां के डॉक्टर, नर्स और बाकी स्टाफ हरेक रोगी को स्वस्थ करने के लिए अपनी जान लगा देते हैं। अब एम्स का नाम बदलने की कवायद शुरू हो गई है। सन 1956 में स्थापित एम्स के नाम को बदलने की वैसे तो कोई जरूरत तो नहीं है। एम्स के डॉक्टरों का भी मानना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। एम्स के डॉक्टरों का कहना है जब दुनि...
अहिंसा और शांति ही जीवन का सौन्दर्य है

अहिंसा और शांति ही जीवन का सौन्दर्य है

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अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं अहिंसा दिवस,  21 सितम्बर 2022 पर विशेष अहिंसा और शांति ही जीवन का सौन्दर्य है   ललित गर्ग  विश्व शांति दिवस अथवा अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस प्रत्येक वर्ष 21 सितम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतंत्रता, शांति, अहिंसा और खुशी का एक आदर्श माना जाता है। यह दिवस मुख्य रूप से पूरी पृथ्वी पर शांति और अहिंसा स्थापित करने के लिए मनाया जाता है। पहला शांति दिवस कई देशों द्वारा राजनीतिक दलों, सैन्य समूहों और लोगों की मदद से 1982 में मनाया गया था। इस साल 40वां अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस 21 सितंबर 2022 को बुधवार के दिन मनाया जा रहा है, जिसकी थीम ‘जातिवाद खत्म करें, शांति का निर्माण करें‘ है। शांति सभी को प्यारी होती है। अहिंसा एवं शांति जीवन का सौन्दर्य है। इसकी खोज में मनुष्य अपना अधिकांश जीवन न्यौछावर कर देता है। किंतु यह काफी निराशाजनक है कि आज ...
स्वास्थ्य सेवाओं को वंचित एवं गरीब तबके तक पहुँचाया जाये।

स्वास्थ्य सेवाओं को वंचित एवं गरीब तबके तक पहुँचाया जाये।

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स्वास्थ्य सेवाओं को वंचित एवं गरीब तबके तक पहुँचाया जाये। सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों के साथ साथ हाशिए पर स्थित लोगों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है| ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य तंत्र का अधिक से अधिक आधुनिकीकरण होना चाहिए। हालाँकि भारत ने स्वास्थ्य पर काफी तरक्की की है पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। निजी क्षेत्र आज लगभग 60%  स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करता है जो कई बार आम आदमी की पहुँच से बाहर होती है। हमें सार्वजनिक क्षेत्र को सुद्रढ़ करना होगा। निवेश बढाने के साथ-साथ हमें स्वास्थ्य सुविधाओं  को गाँवों तक ले जाना होगा। नयी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वन के लिए हमें पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक कुशलता की आवश्यकता होगी। -प्रियंका सौरभ रोगी सुरक्षा की वैश्विक समझ को बढ़ाने, स्वास्थ्य देखभाल की सुरक्षा में सार्वजनिक जुड़ाव बढ़ाने और रोगी सुरक्षा बढ़ाने और रोगी के नुकसा...
हर जगह वायरल होती निजता, कैसे जियेंगे हम?

हर जगह वायरल होती निजता, कैसे जियेंगे हम?

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हर जगह वायरल होती निजता, कैसे जियेंगे हम? चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक छात्रा द्वारा अपनी हॉस्टल की साठ से अधिक छात्राओं के नहाते वक्त के न्यूड वीडियो रिकॉर्ड कर अपने पुरुष मित्र को भेजना और फिर उनका दुनिया में वायरल होना किसी भी समाज को जानवर से बदतर बताता है, पांवो से जमीन खिसक जाती है ऐसी घटनाएं सुनकर, आखिर कौन है दोषी इन कुकृत्यों का? अब गंभीर सवाल ये है कि महिलाओं के नितांत प्राइवेट वीडियो, अतरंगी तस्वीरें या एमएमएस क्यों लीक हो रहे हैं? इसका जवाब ढूंढने से पहले कुछ बुनियादी बातों के बारे में समझने की कोशिश करते हैं। आज के दिन सेक्सटॉर्शन के लिए भारत क्या, अमेरिका, ब्रिटेन वगैरह में भी अलग से कानून नहीं है। सेक्सटॉर्शन का मतलब - किसी के कंप्यूटर, मोबाइल वगैरह में सेंध लगाकर इंटीमेट तस्वीर, वीडियो वगैरह चुराना या वेबकैम वगैरह से वीडियो बना लेना और फिर विक्टिम को ब्लैकमेल करना। इसके लिए ...
नौकरियों में आरक्षण खत्म हो*

नौकरियों में आरक्षण खत्म हो*

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नौकरियों में आरक्षण खत्म हो* *डॉ वेदप्रताप वैदिक* सर्वोच्च न्यायालय में आजकल आरक्षण पर बहस चल रही है। उसमें मुख्य मुद्दा यह है कि आर्थिक आधार पर लोगों को नौकरियों और शिक्षा-संस्थानों में आरक्षण दिया जाए या नहीं? 2019 में संसद ने संविधान में 103 वाँ संशोधन करके यह कानून बनाया था कि गरीबी की रेखा के नीचे जो लोग हैं, उन्हें 10 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जाए। यह आरक्षण उन्हीं लोगों को मिलता है, जो अनुसूचित और पिछड़ों को मिलनेवाले आरक्षण भी शामिल नहीं हैं। याने सामान्य श्रेणी या अनारक्षित जातियों को भी यह आरक्षण मिल सकता है। उसका मापदंड यह है कि उस गरीब परिवार की आमदनी 8 लाख रु. साल से ज्यादा न हो। याने लगभग 65 हजार रु. प्रति माह से ज्यादा न हो। एक परिवार में यदि चार लोग कमाते हों तो उनकी आमदनी 16-17 हजार से कम ही हो। ऐसा माना जाता है कि गरीबी रेखा के नीचे जो लोग हैं, उनकी संख्या 25 प्रतिशत के...
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के चलते भारत की आर्थिक विकास दर में हो रही वृद्धि

स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के चलते भारत की आर्थिक विकास दर में हो रही वृद्धि

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स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के चलते भारत की आर्थिक विकास दर में हो रही वृद्धि किसी भी देश में स्वस्थ नागरिक उस देश के लिए एक बहुत बड़ी पूंजी मानी जाती है। नागरिकों के स्वस्थ रहने से देश की अर्थव्यवस्था को सीधे सीधे दो लाभ होते हैं। एक, देश के स्वस्थ नागरिकों की उत्पादकता तुलनात्मक रूप से अधिक रहती है। दूसरे, यदि नागरिक बीमार हैं तो उनको स्वस्थ रखने के लिए अधिक खर्च करना होता है, जो कि एक तरह से अनुत्पादक खर्च की श्रेणी में गिना जाता है, और बीमार नागरिकों की उत्पादकता तो कम होती ही है। इस बीच यदि देश में उत्तम दर्जे की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं तो अस्वस्थ नागरिकों को जल्दी स्वस्थ कर पुनः उनकी उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। जिसका सीधा लाभ उस नागरिक के साथ ही देश के आर्थिक विकास में सुधार के रूप में भी देखने में आता है। हाल ही के समय में, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए कें...
हिंसक एवं असहिष्णु होते समाज की त्रासदी

हिंसक एवं असहिष्णु होते समाज की त्रासदी

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हिंसक एवं असहिष्णु होते समाज की त्रासदी - ललित गर्ग-भारतीय समाज हिंसक एवं असभ्य होता जा रहा है। समाज में बढ़ती हिंसकवृत्ति आदमी को एक दिन कालसौकरिक कसाई बना देती है, कंस बना देती है, रावण बना देती है। एक ऐसा हिंसक समाज बन रहा है, जिसमें कुछ लोगों को दिन भर में जब तक किसी को मार नहीं देते, उन्हें बेचैनी-सी रहती है। इतिहास में ऐसे कुछ विकृत दिमाग के लोग हुए हैं, जिन्हें यातना देकर किसी को मारने में आनंद आता था। लेकिन आधुनिक सभ्य समाजों में ऐसी प्रवृत्ति का कायम रहना गहन चिन्ता का विषय है। यह समझना मुश्किल होता जा रहा है कि लोगों में असहिष्णुता, असहनशीलता और हिंसा की प्रवृत्ति इतनी कैसे बढ़ रही है कि जिन मामलों में उन्हें कानून की मदद लेनी चाहिए, उनका निपटारा भी वे खुद करने लगते हैं और इसका नतीजा अक्सर किसी की मौत के रूप में सामने आता है। दिल्ली में जिस तरह एक व्यक्ति क...
दिल दा मामला है

दिल दा मामला है

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दिल दा मामला है *रजनीश कपूर मशहूर पंजाबी गायक गुरदास मान का दुनिया भर में चर्चित गाना ‘दिल दा मामला है’ आज एक बार फ़िर से चर्चा में है। इसलिए नहीं कि अचानक यह गाना फिर से लोकप्रिय होने लगा है। इसलिए कि आजकल सोशल मीडिया में ऐसी तमाम ख़ौफ़नाक खबरें सामने आ रही हैं जिनमें हंसते-खेलते लोगों को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। ज़्यादातर देखा गया है कि दिल का दौरा या हार्ट अटैक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों आता है। दिल का दौरा पड़ने के और कारणों में से प्रमुख है मधुमय या शुगर के मरीज़ और ब्लड प्रेशर के मरीज़। इन मरीज़ों में हार्ट अटैक की संभावना काफ़ी अधिक होती है। इसके साथ ही धूम्रपान करने वाले व्यक्ति भी दिल के मरीज़ कब बन जाते हैं इसका पता नहीं चलता। इसका कारण यह है कि धूम्रपान करने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना तीन गुना बढ़ जाती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को ...
लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक

लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक

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लोकतंत्र के लिये खतरा है मुफ्तखोरी की राजनीतिक- ललित गर्ग-गुजरात के दिसम्बर-2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव प्रचार में आम आदमी पार्टी ने ‘रेवड़ी कल्चर’ का सहारा लिया तो राजनीतिक हलकों में यह विषय एक बार फिर चर्चा में आ गया। इन दिनों उच्चतम न्यायालय से लेकर राजनीति क्षेत्रों में ‘रेवड़ी कल्चर’ को लेकर व्यापक चर्चा आम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुक्त की संस्कृति पर तीखे प्रहार करते रहे हैं। मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है, खासकर तब जब चुनाव नजदीक हों। ‘फ्रीबीज’ या मुफ्त उपहार न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में वोट बटोरने का हथियार हैं। यह एक राजनीतिक विसंगति एवं विडम्बना है जिसे कल्याणकारी योजना का नाम देकर राजनीतिक लाभ  की रोटियां सेंकी जा रही है। यह तय करना कोई मुश्किल काम नहीं है कि कौनसी कल्याणकारी योजना है और कौनसी मुफ्तखोरी यानी ‘रेवड़ी कल्...
विरोध करना अधिकार है,सरकार की कृपा नहीं

विरोध करना अधिकार है,सरकार की कृपा नहीं

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*विरोध करना अधिकार है,सरकार की कृपा नहीं* विरोध करना और सरकार का विरोध करना भारत में आसान नहीं है | सदैव विरोध में रहे मेरे समाजवादी मित्र रघु ठाकुर ने यह बात बताते हुए सरकार के विरोध में किये जाने वाले धरना प्रदर्शन में होने वाली दुशवारियों का जिक्र किया था | यह दुश्वारी अब और गहरा गई है | कहने को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उदारतापूर्वक नागरिकों को "निर्दिष्ट क्षेत्र में" यानी सिर्फ तय जगहों पर ही विरोध करने का अधिकार दिया है। नायालय की टिप्पणी थी कि "असहमति और लोकतंत्र साथ-साथ चलते हैं, लेकिन विरोध निर्दिष्ट क्षेत्र में ही किया जाना चाहिए। विरोध के तौर पर जो धरना प्रदर्शन आदि शुरू हुआ, उससे लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ा। कई प्रदर्शन ऐसे भी हुए जिनसे लोगों को असुविधा हुई और कई सिर्फ अनुमति के मकडजाल में फंस कर दम तोड़ गये | देश में बहुत से नागरिको को नहीं पता होगा कि निर्दिष्ट क्...