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सात समंदर पार बसे भारतीय जुड़े भारत से

सात समंदर पार बसे भारतीय जुड़े भारत से

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15 वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन 21 जनवरी से वाराणसी में उस समय  शुरू हुआ है, जब अमेरिका में बसी दो भारतीय मूल की महिलाओं की चर्चा विशेष रूप से विश्व भर में हो रही है। पहली गीता गोपीनाथ हैं। उन्होंने अंतर राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अध्यक्ष का पद भार संभाल लिया है। दूसरी हैं चैन्नई में पैदा हुई इंदिरा नूई। कभी कोका कोला जैसी प्रख्यात शीतलपेय बनाने वाली कंपनी की प्रमुख रही इंदिरा नूर्इ को विश्व बैंक का प्रमुख बनाए जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। दरअसल ये दोनों उदाहरण मात्र हैं, यह सिद्ध करने के लिए कि सारी दुनिया में भारतीय अपने ज्ञान, मेहनत,लगन के बल पर आगे बढ़ते ही चले जा रहे हैं।हालांकि, ये दोनों प्रवासी सम्मेलन में अपरिहार्य कारणों से नहीं उपस्थित हो पा रही हैं, पर इनकी चर्चाएं होती ही रहेगी। दरअसल कुंभ मेला और गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने के लिए आ रहे  सात समंदर पार बसे भारती...
गणतंत्र के 69 वर्ष में क्या खोया, क्या पाया?

गणतंत्र के 69 वर्ष में क्या खोया, क्या पाया?

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आज हमारा देश अपना 69वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। यह अवसर है जब हमें चाहिए कि एक बार शांत मन से आत्मविश्लेषण कर लें कि भारत ने गणतंत्र होने के बाद क्या खोया-क्या पाया? मतलब देश को संविधान से क्या मिला और क्या रह गया? किन मोर्चो पर संविधान असफल रहा? वैसे तो सभी सवाल वाजिब ही हैं। लेकिन इन सारे सवालों के जवाब तो हमें तलाशने ही होंगे। यही गणतंत्र का तकाजा भी है। स्वस्थ लोकतंत्र के परीपक्व होने की यही प्रक्रिया हैl निर्विवाद रूप से भारत ने संविधान के दिखाए रास्ते पर चलते हुए हमने भुखमरी, गरीबी, निरक्षरता वगैरह जैसे गंभीर मसलों को काफी हद तक सुलझाया है। यह तो कोई नहीं दावा कर रहा है कि हमने उपर्युक्त मसलों पर पूरी तरह विजय पा ली है। जरा सोचिए तो कि देश में आजादी के वक्त और फिर संविधान के लागू होने के समय हम कहां खड़े थे? आप जब 26 जनवरी,1950 के भारत और आज के भारत की तुलना करेंगे तब आप पाएंगे ...
परिवारवाद की राजनीती में हुआ नये चेहरे का पदार्पण

परिवारवाद की राजनीती में हुआ नये चेहरे का पदार्पण

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भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक कांग्रेस ने बुधवार दोपहर जब प्रियंका गाँधी वाड्रा को महासचिव बनाने के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया तो कांग्रेस समर्थको में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी, इसी के साथ इस कथन पर भी मुहर लग गयी कि “भारत की राजनीती में परिवारवाद” हमेशा की तरह हावी रहेगा, फिर चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल में ही क्यों न हो. वंशवाद अथवा परिवारवाद सत्ता के शासन की वह प्रणाली है जिसमे एक ही परिवार, वंश से एक के बाद एक कई शासक बनते जाते है. भाईभतीजावाद का जनक इसका ही एक रूप है. ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए कोई स्थान नही है, परन्तु यह फिर भी हावी है. भारत में हर चुनाव से पहले लगभग हर राजनीतिक दल का एक दूसरे पर भाषणों के द्वारा किये जाने वाले हमलों का प्रमुख मुद्दा परिवारवाद एवं वंशवाद ही होता है, फिर चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या समाजवादी पार्ट...
नवा छत्तीसगढ़ की अवधारणा

नवा छत्तीसगढ़ की अवधारणा

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राजनीति में नारों का बड़ा महत्व है, जनता नारों को संक्षेप में पार्टी की नीति मानती है। चुनाव के दौरान जारी घोषणा पत्र इतना लंबा चौड़ा होता है कि जनता उसमें उल्लेखित बातों को याद नहीं रख पाती है जबकि नारे आसानी से लम्बे समय तक याद रहते हैं। सरकारें भी नारे गढ़ती हैं, डॉ रमन सरकार ने सबका साथ सबका विकास और क्रेडिबल छत्तीसगढ़ जैसे नारे गढ़े। सरकार के जाते ही नारे भी बदल जाते हैं, जैसे पुराने नारों के स्थान पर भूपेश बघेल की नई सरकार ने नारे दिए हैं गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ के ये चिन्हारी, नरवा-गरूवा-घुरूवा-बारी। अब सरकार के समक्ष चुनौती है अपने नारों को अमल में कैसे लाएं? पहले गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की बात करें तो सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में विशेष प्रयास की आवश्यकता है। केवल कृषि आधारित आर्थिक उपक्रम से नया छत्तीसगढ़ नहीं गढ़ा जा सकता। कृषि पर प्रच्छन्न बेरोजगारी को दूर कर रोज़गार के नए अव...
देवकांत बरूआ जैसी चाटुकारिता करते शशि थरूर

देवकांत बरूआ जैसी चाटुकारिता करते शशि थरूर

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चाटुकारिता और चमचागिरी की भी हद होती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने तो शब्दकोश में लिखीं सारी हदें तक पार कर दी हैं।पुराने ज़माने में राजाओं के यहॉं "भॉट" रहा करते थे। वे होते तो थे वैसे आशुकवि क़िस्म के बुद्धिमान इन्सान , पर उनका काम होता था रोज़ सुबह राजा जब सिंहासन पर विराजमान हों, राजा की स्तुति गान मे नई- नई रचनाओं का पाठ या गान करना। उसे चारण पाठ भी कहते थे। शशि थरूर भी उच्च कोटि के विद्वान और समझदार पढ़े लिखे इन्सान हैं। पर वे कब से भॉटगिरी करने लगे,चारणपाठ करने की क्या मजबूरी आ गई उनके लिए, मैं समझ नहीं पा रहा। मैं शशि के पूरे परिवार को पॉंच दशक से ज़्यादा समय से जानता हूँ । सत्तर के दशक में जब शशि के पिता चन्द्रन थरूर दैनिक स्टेट्समैन में ऊंचे पद पर थे, तब से मैं उन्हें जानता था। जब बांग्लादेश युद्ध के जोखिम भरे असाइनमेंट के बाद मैं कोलकाता लौटा था, तब चन्द्रन ने मेरे लिए ...
राष्ट्रीय सरकार क्यों न बने?

राष्ट्रीय सरकार क्यों न बने?

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संसदीय चुनाव दस्तक दे रहा है। सत्ता पक्ष खम ठोक कर अपने वापिस आने का दावा कर रहा है और साथ ही विपक्षी दलों के गठबंधन कोअवसरवादियों का जमावाड़ा बता रहा है। आने वाले दिनों में दोनों ओर से हमले तेज होंगे। कुछ अप्रत्याशित घटनाऐं भी हो सकती है। जिनसे मतोंका ध्रुवीकरण किया जा सके। पर चुनाव के बाद की स्थिति अभी  स्पष्ट नहीं है। हर दल अपने दिल में जानता है कि इस बार किसी की भीबहुमत की सरकार बनने नहीं जा रही। जो दूसरे दलों को अवसरवादी बता रहे हैं, वे भी सत्ता पाने के लिए चुनाव के बाद किसी भी दल के साथगठबंधन करने को तत्पर होंगे। इतिहास इस बात का गवाह है कि भजपा हो या कांग्रेस, तृणमूल हो या सपा, तेलगुदेशम् हो या डीएमके,शिवसेना हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस, रालोद हो या जनता दल, कोई भी दल, अवसर पड़ने पर किसी भी अन्य दल के साथ समझौता कर लेता है।तब सारे मतभेद भुला दिये जाते है। चुनाव के पहले ...
सफलता का मंत्र है कल नहीं, आज

सफलता का मंत्र है कल नहीं, आज

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‘कल नहीं आज’ यह ही सफलता का परम मंत्र है। हमें जीवन के हर क्षेत्र में उसका अनुसरण करना चाहिए। एक अंग्रेज विचारक ने लिखा है-भूतकाल इतिहास है, भविष्य रहस्य है, वर्तमान उपहार है। इसलिए वर्तमान को प्रजेंट कहते हैं। अतः हमें आज के प्रति वफादार और जागरूक बनना चाहिए। जो आज को सार्थक बनाता है, उसके भूत और भविष्य दोनों सफल बन जाते हैं। एक सबक हमेशा गांठ बांधकर रखना होगा कि खेल छोड़ देने वाला कभी नहीं जीतता और जीतने वाला कभी खेल नहीं छोड़ता। यदि बड़े काम नहीं कर सकते, तो छोटे काम बड़े ढंग से करने चाहिए। हर बार हां ही नहीं ना भी कहना सफलता के लिये जरूरी होता है। क्योंकि हमारी ‘हां’ की तरह ‘ना’ के भी मायने होते हैं। एक समय में हम सब कुछ नहीं चुन सकते। हमें अपनी और अपनों की बेहतरी को ध्यान में रखते हुए चुनाव करने होते हैं। यूं भी हर ‘हां’, कहीं ‘ना’ होती है और हर ‘ना’, कहीं ‘हां’ हो ...
आखिर क्यों हम तोड़ते हैं कतार

आखिर क्यों हम तोड़ते हैं कतार

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हाल ही में कुछ अखबारों ने एक फोटो छापी थी। उसमें संसार के सबसे धनी इंसान बिल गेट्स कतार में खड़े हैं। वह तस्वीर अपने-आप में बहुत कुछ कहती है,   कतार के महत्व को भलीभांति समझाती है। हमारे अपने यहां रोज बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सिनेमा घर वगैरह–वगैरह में, हर जगह कतारों के तोड़ने की घटना को दर्शाती घटनाओं की साक्षी हिन्दुस्तानियों के लिए उपर्युक्त चित्र अकल्पनीय अहसास दे जाते हैं। यकीन ही नहीं होता कि माइक्रोसाफ्ट कंपनी का संस्थापक बिल गेट्स कायदे से कतार में खड़ा है। उनके पास कतार में खड़े होने का वक्त है। वे अपने पैसे के रसूख से कतार को तोड़ते की हिमाकत नहीं करता। क्या आप भारत में इस तरह की घटना की कल्पना कर सकते हैं कि भारत का कोई नामवर या असरदार इंसान भी कतार में खड़ा हो?  असंभव है। कतार को तोड़ने के मामले में सारा देश एक है। भारत का अमीर और शक्तिशाली तो लाइन में खड़ा होना अपनी शान के खिला...
वैज्ञानिकों ने बनाया कमल की पत्तियों से प्रेरित ईको-फेंडली मैटेरियल

वैज्ञानिकों ने बनाया कमल की पत्तियों से प्रेरित ईको-फेंडली मैटेरियल

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प्रकृति से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक कई तरह की उपयोगी चीजों का निर्माण करते रहते हैं। भारतीय और स्विस वैज्ञानिकों ने कमल की पत्तियों से प्रेरित होकर जैविक रूप से अपघटित होने में सक्षम एक ऐसा मैटेरियल विकसित किया है, जिसकी सतह पर पानी नहीं ठहर पाता है। कमल की पत्तियों की सतह पर प्राकृतिक रूप से निर्मित मोम जल विकर्षक के रूप में कार्य करता है, जिसके कारण पानी में रहने के बावजूद कमल की पत्तियां सड़ती नहीं हैं। नया जल विकर्षक (Water Repellent) मैटेरियल इसी तरह काम करता है। इस मैटेरियल में सेलूलोज की मदद से सूक्ष्म स्तंभों (Micropillars) की संरचना बनायी गई है। सेलूलोज की ढलाई के लिए ट्रायफ्लुरोएसिटिक एसिड में सेलूलोज पाउडर को पहले विघटित किया गया है और फिर पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सुखाने की नियंत्रित प्रक्रिया से एसिड को हटा दिया गया। इसके बाद कमल के पत्तों में पाये जाने वा...
Gandhi Peace Prize given for four years together: Should be announced every year rather than accumulating

Gandhi Peace Prize given for four years together: Should be announced every year rather than accumulating

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It refers to central government announcing prestigious Gandhi Peace prize instituted on 125th birth-anniversary of MK Gandhi together for four years from 2015 to 2018. It is wrong practice to accumulate such prizes and awards together for so many years. It is noteworthy that even Best Parliamentarian Award to be given annually is also usually clubbed for three years in a bid to please-all-policy by giving this honour to one Parliamentarian each from ruling party, largest opposition party and remaining other small parties. System should be for auto-cancellation of award for the year in which the award or prize is not announced so that only one prize r award may only be announced at a time that too only for the year for which announcement is made thus auto-cancelling the lapsed awards for...