तकनीक से बढ़ती बेचैनी
तकनीक से बढ़ती बेचैनी
[आलेख: कमलेश कमल ]
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क्या आपको कभी लगा कि आज भले ही लोगों के पास साधन हैं, सूचना का बोझ है, पर उनके पास सच्चा संवाद नहीं है। साधन हैं, पर आत्मीय वार्तालाप करना उन्हें बोझिल लगता है, वे उड़े-उड़े, खोये-खोये से रहते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई साथ के व्यक्ति से संवाद न करे पर सोशल मीडिया पर लगातार उत्तेजित अथवा नकरात्मक प्रतिक्रिया देने लगे।
मानसिक भटकावों के अनेकानेक साधन उपलब्ध होने के इस युग में तकनीक भी बेचैनी का एक बड़ा कारण बन गई है। यह बस विकल्प देती है, विवेक नहीं देती। सस्ते डेटा के साथ फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब आदि में कोई तब भी लगा रह सकता है, जब इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं या तब जब कुछ सकारात्मक, सर्जनात्मक करने का समय हो।
आज लोगों के पास पढ़ने के लिए बहुत से अच्छे आलेख हैं, ठीक से एक भी पढ़ने का समय नहीं है। अनावश्यक चीज़ों को हटान...









