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हिंदू हृदय सम्राट – अशोक सिंघल

हिंदू हृदय सम्राट – अशोक सिंघल

BREAKING NEWS, TOP STORIES, राष्ट्रीय, साहित्य संवाद
27 सितंबर (जन्म जयंती) पर विशेष-मृत्युंजय दीक्षित27 सितम्बर 1926 को जन्मे राष्ट्रवादी विचारधारा के वाहक, श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के माध्यम से बहुसंख्यक हिंदू समाज को स्वाभिमान से खड़ा करने वाले विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल नेअपना जीवन हिंदू समाज के लिए खपा दिया। अशोक जी के व्यक्तित्व व उनके ओजस्वी विचारों का ही परिणाम है कि आज हिंदू समाज में सामाजिक समरसता का भाव दिखलायी पड़ रहा है। संत समाज व विभिन्न अखाड़ा परिषदों को एक मंच पर लाने का दुष्कर कार्य अशोक जी से ही संभव हो सका। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि आज देश का बहुसंख्यक समाज अपने आप को गर्व से हिंदू कहना चाहता है।अशोक सिंघल ने देश, समाज, हिंदू संस्कृति और संस्कार के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उन्होने श्री रामजन्मभूमि की मुक्ति तथा उस पर श्री राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलनों की झड़ी लगा दी। जनसभाओं व का...
LET NOT CANADA LOSE ITS GLOBAL IDENTITY

LET NOT CANADA LOSE ITS GLOBAL IDENTITY

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N.S.Venkataraman Those  who live in Canada as Canadian citizens  by birth   or  as immigrants (permanent residents)  and non permanent residents as well as those who have been visitors to Canada and those who have heard about Canada from media reports  and those who have studied   Canada’s  history ,  have all identified Canada as a peaceful country with high level of personal freedom and liberty and with goodwill towards all , as espoused by  the  liberal migration policy of  Government of Canada. The recent controversy between India and Canada that has been created by Canadian Prime Minister who accused India of murdering a citizen of Canada on Canadian soil and the  strong  refutal of this accusat...
महिलाओं को पचास फ़ीसदी आरक्षण मिले

महिलाओं को पचास फ़ीसदी आरक्षण मिले

BREAKING NEWS, TOP STORIES, राज्य, सामाजिक
-विनीत नारायणतैंतीस फ़ीसदी ही क्यों, पचास फ़ीसदी आरक्षण महिलाओं के लिए होना चाहिए। इस पचास फ़ीसदी में सेदलित और वंचित समाज की महिलाओं का कोटा भी आरक्षित होना चाहिए। आज़ादी के 75 वर्ष बाद देशकी आधी आबादी को विधायिका में एक तिहाई आरक्षण का क़ानून पास करके पक्ष और विपक्ष भले हीअपनी पीठ थपथपा लें पर ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। जब महिलाएँ देश की आधी आबादी हैं तोउन्हें उनके अनुपात से भी कम आरक्षण देने का औचित्य क्या है?क्या महिलाएँ परिवार, समाज और देश के हित में सोचने, समझने, निर्णय लेने और कार्य करने में पुरुषोंसे कम सक्षम हैं? देखा जाए तो वे पुरुषों से ज़्यादा सक्षम हैं और हर कार्य क्षेत्र में नित्य अपनी सफलता केझंडे गाढ़ रहीं हैं। यहाँ तक कि भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान की पायलट तक महिलाएँ बन चुकीहैं। दुनिया की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सीईओ तक भारतीय महिलाएँ हैं। अनेक देशों मे...
26 सितंबर विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस विशेष

26 सितंबर विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस विशेष

BREAKING NEWS, TOP STORIES, राष्ट्रीय
26 सितंबर को प्रतिवर्ष विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे जो कारण और उद्देश्य है वह यह है कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़े और अधिकाधिक लोगों को पर्यावरण के संरक्षण के प्रति प्रोत्साहित किया जाए। अब हम यहां बात करते हैं कि आखिर पर्यावरण स्वास्थ्य से यहां क्या मतलब है ? तो जानकारी देना चाहूंगा कि पर्यावरण स्वास्थ्य का तात्पर्य किसी विशेष क्षेत्र की भौतिक, रासायनिक, जैविक और सांस्कृतिक स्थिति से है। खराब वायु गुणवत्ता, पारिस्थितिक विविधता का नुकसान, रासायनिक असंतुलन आदि जैसे पहलू किसी क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पर्यावरणीय स्वास्थ्य के तीन सबसे महत्वपूर्ण प्रकारों में भौतिक पर्यावरण, जैविक पर्यावरण और सांस्कृतिक पर्यावरण शामिल हैं। इन प्रकारों का विश्लेषण करके पर्यावरणीय स्वास्थ्य को मापा जा ...
क्यों मोदी ने संसद पर हमले को किया याद

क्यों मोदी ने संसद पर हमले को किया याद

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 आर.के. सिन्हा भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिये 13 दिसंबर, 2001 काला दिन था। उस दिन देश के दुश्मनों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर को निशान बनाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए संसद पर हुए उस हमले का उल्लेख करके उन शूरवीरों के प्रति देश की कृतज्ञता को ज्ञापित किया जिनकी बहादुरी के कारण ही संसद भवन के अंदर आतंकी घुस नहीं सके थे। तब संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। उस दिन विपक्षी सांसद राज्यसभा और लोकसभा में हंगामा काट रहे थे। सदन को तत्काल 45 मिनट के लिए स्थगित कर दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संसद से घर की ओर जा चुके थे। हालांकि, उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत अन्य सांसद संसद भवन में ही मौजूद थे। तभी सफेद एंबेसडर कार से जैश-ए-मुहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के पांच आतंकी संसद भवन परिसर ...
एक साथ चुनाव भारत के लोकतंत्र के लिए हानिकारक क्यों?

एक साथ चुनाव भारत के लोकतंत्र के लिए हानिकारक क्यों?

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एक साथ चुनावों से देश की संघवाद को चुनौती मिलने की भी आशंका है। एक साथ चुनाव होने से लोकतंत्र के इन विशिष्ट मंचों और क्षेत्रों के धुंधला होने का खतरा है, साथ ही यह जोखिम भी है कि राज्य-स्तरीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों में समाहित हो जाएंगे। अगर लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए गए तो ज्यादा संभावना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाएँ या इसके विपरीत क्षेत्रीय मुद्दों के सामने राष्ट्रीय मुद्दे अपना अस्तित्व खो दें। डॉ सत्यवान सौरभ एक साथ चुनाव का तात्पर्य है कि पूरे भारत में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे, जिसमें संभवतः एक ही समय के आसपास मतदान होगा। एक साथ चुनाव, या "एक राष्ट्र, एक चुनाव" का विचार पहली बार औपचारिक रूप से भारत के चुनाव आयोग द्वारा 1983 की रिपोर्ट में प्रस्तावित किया गया था। एक साथ चुनाव कराने के क...
जस्टिन ट्रूडो सम्बन्धों को विद्रूप कर रहे हैं

जस्टिन ट्रूडो सम्बन्धों को विद्रूप कर रहे हैं

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इसमें कोई शक नहीं है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का अपरिपक्व व्यवहार व दोहरापन दोनों देशों के संबंधों को उस मोड़ पर ले आया है कि भारत को कनाडाई नागरिकों को वीजा देने पर रोक लगानी पड़ी है। खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में भारत की कथित भूमिका को लेकर किया गया प्रलाप निस्संदेह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि अपरिपक्व राजनय को भी दर्शाता है। वहीं ट्रूडो की राजनीतिक अस्थिरता से अपनी सरकार बचाने की कोशिशों से उत्पन्न हताशा को भी दर्शाता है। दूसरी ओर एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक का निष्कासन सुलगते रिश्तों की ज्वलनशीलता को बढ़ाने वाला ही था। निज्जर हत्या प्रकरण में आधी-अधूरी जांच के बीच में ही निष्कर्ष रचने वाले ट्रूडो की बयानबाजी उनके उतावलेपन को ही उजागर करती है। निस्संदेह वे लगातार अलगाववादियों के हाथों में खेल रहे हैं। जाहिर है कि हमारी एकता-संप्रभुता...
ओबीसी के नाम पर बेवक़ूफ़ बंनाने का ड्रामा

ओबीसी के नाम पर बेवक़ूफ़ बंनाने का ड्रामा

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आंकड़ों का अध्यन करें तो हम पाएंगे कि देश के कुल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अन्य पिछड़ा वर्ग में केवल 5 उप-कुलपति है। अगर रजिस्ट्रार देखें तो पिछड़े समाज के तीन हैं। देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की तय सीटों की मात्र 4.5 प्रतिशत ही भरी गई हैं। अमूमन यही स्थिति एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफेसर में भी है। सीटों के खाली रहने के साथ-साथ ओबीसी के साथ क्रीमीलेयर का घटिया खेल खेलकर उनको कहीं का भी नहीं छोड़ा जा रहा है जिसकी वजह से उनकी जाति का सर्टिफिकेट तक छिना जा रहा है। छह या आठ लाख की मामूली सीमा से ओबीसी का हक़ मारकर आने वाली पीढ़ियों को पंगु बनाया जा रहा है जबकि अन्य आरक्षित वर्गों में न तो कोई क्रीमीलेयर है न कोई और बाध्यता? जिसकी वजह से इन वर्गों के बड़े-बड़े अफसरों के बच्चे भी पीढ़ियों तक आरक्षण का फायदा उठा पाएंगे। बड़े समाज को पीछे छोड़ हम अपने देश को सशक्त नहीं कर सकते। क्...
ये भारत क्यों छोड़ रहे हैं ?

ये भारत क्यों छोड़ रहे हैं ?

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भारत के सर्वश्रेष्ठ और सबसे मेधावी अब भी विदेशी निगमों में रोजगार को प्राथमिकता दे रहे हैं, तो देश का धनाढ्य वर्ग भी अपनी सरजमीं छोड़ने में पीछे नहीं है। इस साल जून में आई हेनली प्राइवेट वेल्थ माइग्रेशन रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2023 के अंत तक 6500 करोड़पतियों के भारत छोड़ने की संभावना है। ये क्यों भारत छोड़ रहे हैं? हेनली में एक वरिष्ठ पार्टनर घुमा-फिरा कर इसे ‘हाल की और लगातार उथल-पुथल’ बताते हैं। उन्होंने कहा कि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि और भी ज्यादा निवेशक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल तथा जलवायु परिवर्तन के असर के कारण अपने परिवारों को भारत से निकालकर विदेश ले जाने पर विचार कर रहे हैं। ब्रेन-ड्रेन या प्रतिभा पलायन का यह एक पहलू है। पहले सरकारी खर्च पर देश के आला संस्थानों से शिक्षित और योग्य इंजीनियर और प्रबंधन छात्र रोजगार के अवसरों के लिए पश्चिम के देशों ...
14 न्यूज एंकरों का ‘अपराध’ क्या?

14 न्यूज एंकरों का ‘अपराध’ क्या?

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-बलबीर पुंज बीते सप्ताह विपक्षी गठबंधन (आई.एन.डी.आई.ए.) ने विभिन्न न्यूज चैनलों के 14 टीवी एंकरों का बहिष्कार कर दिया। इस गठजोड़ की मीडिया समिति ने टीवी पत्रकारों के नामों की एक सूची जारी करते हुए उनके कार्यक्रमों में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजने का निर्णय किया है। क्या विपक्ष— विशेषकर मोदी विरोधियों का यह आचरण केवल एंकरों के बहिष्कार तक सीमित रहेगा? न्यूज चैनलों के राजस्व का एक हिस्सा उन विज्ञापनों से भी आता है, जो उन्हें विभिन्न सरकारों से मिलते है। इस पृष्ठभूमि में देश के 11 राज्यों में आई.एन.डी.आई.ए घटकों की सरकार है। क्या इनकी सरकारें उन चैनलों के विज्ञापनों को रोकेंगे, उसमें कटौती करेंगे या फिर प्रबंधकों पर कार्रवाई (नौकरी से निकालने सहित) करने का दबाव बनाएंगे, जिनसे यह 14 एंकर जुड़े है? मेरा मत है कि देश को तीन किस्तों में स्वतंत्रता मिली है। 15 अगस्त 1947 को खंडित भारत को राजनी...