
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि में राष्ट्र की रीढ़..!
~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटलस्वामी विवेकानन्द ने भारत के उस मर्म को छुआ जो कालखण्ड के प्रहार से पथभ्रष्ट होकर एक असाध्य रोग का रुप ले चुका था। वह था— 'छुआछूत वाद',गरीबी, भुखमरी और निम्न से निम्नतर समझी जाने वाली श्रेणियों के प्रति घ्रणा,वैमनस्य और अत्याचार की अन्तहीन प्रताड़ना। उनका ह्रदय इस मानवीय पाशविकता से डोल गया। उनके अन्दर उसी समानुभूतिपूर्ण करुणा का ज्वार मथने लगा — जो उन असंख्य निर्दोष लोगों के जीवन को हीनतर बना रहा था।उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त इस व्याधि के उपचार के लिए केवल आह्वान ही नहीं किया,बल्कि उस कार्य में अपने जीवन के अन्तिम क्षणों! तक रत रहे आए।
ऐसा नहीं था कि उस समय समाज सुधार नहीं चल रहे थे, किन्तु उन सामाजिक सुधारों में सिध्दान्त और व्यवहार में पूर्णतः अन्तर पाया जाता था। साथ ही तथाकथित समाज सुधारकगण — वे समाज की इस दुर्दशा का ठीकरा हिन्दू धर्म पर फोड़कर अपनी अ...