क्या कानून की शक्ल अख्तियार करेगा तीन तलाक का बिल
तीन तलाक का कान्सैप्ट इस्लाम में जायज़ है। इसकी व्याख्या पर पुनर्विचार होना चाहिए। देखने वाली बात यह है कि इस्लाम में शराब पीना हराम है। पर मुस्लिम पी रहे हैं। शराब के नशे में घर आते हैं और पी पर गुस्सा करते हैं। बेखुदी की हालत में तलाक तलाक तलाक कहकर एक औरत को बेदखल कर देते हैं। चूंकि मुस्लिम धर्म में गुजारा भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए वह लाचार और मजबूर औरत सड़क पर आ जाती है। अब अगर अगली सुबह पति को अपनी गलती का एहसास भी होता है तो भी वह अपनी रात की गलती पर अफसोस नहीं कर सकता है। उसके पास विकल्प ही नहीं है। जो विकल्प है वह और भी भयावह है। पहले स्त्री को किसी अन्य मर्द के साथ निकाह करना होगा। वह तलाक देगा और तब वह पुन: अपने पूर्व पति के पास जा पाएगी। इस प्रक्रिया को हलाला कहा जाता है। तीन तलाक का बिल कानून बनने की स्थिति में मुस्लिम महिलाओं के पास पुरुष की गलती की सज़ा दिलवाने...









