वामपंथी रुदन
फेसबुक पर इन चुनावी दिनों में कई घोषित वामपंथियों (इनमें साहित्यकार, जिन्हें मैं साहित्यविकार कहता हूँ, और रिपोर्टर टाइप पत्रकार आदि शामिल हैं) का रुदन पढ़ रहा हूँ। सभी एक दूसरे को कॉपी पेस्ट किए जा रहे हैं। इसमें उन्हें महारत हासिल है। मौलिक लेखन की प्रतिभा तो कहीं दिखती नहीं है। इनके रुदन को पढ़िए। एक ही बात सभी लिखे जा रहे हैं। पिछले पाँच वर्ष में देश तथा समाज में अनाचार मच गया है। वे अकेले हो गए हैं, जीवन का सारा रस सूख गया है, प्रकृति के प्रति कोई प्रेम कहीं नहीं बचा है। संस्कृति नष्ट हो गई है, नदी, हवा, पेड़-पौधे, सभी समाप्त हो रहे हैं। सभी लोग एक दूसरे से घृणा करने लगे हैं। इसका कारण एक ही है। एक ऐसा व्यक्ति सत्ता में बैठा है, जो सब रस सोखे ले रहा है, घृणा फैला रहा है, प्रकृति को नष्ट कर रहा है, सौन्दर्य को समाप्त कर रहा है, व्यक्तियों को अकेला कर रहा है।
इस रुदन को पढ़ने से प...









