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सामाजिक विषमता का कारक है आरक्षण

सामाजिक विषमता का कारक है आरक्षण

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डॉ शंकर सुवन सिंहआरक्षण दो शब्दों से मिलकर बना है आ + रक्षण। आरक्षण शब्द में ‘आ’ उपसर्ग है और रक्षणअर्थात सुरक्षित करना। किसी वस्तु या व्यक्ति के लिए कोई स्थान पहले से बचा कर रखनाआरक्षण कहलाता है। वर्ष 1947 में भारत ने स्वतन्त्रता प्राप्त की। डॉ. अम्बेडकर कोभारतीय संविधान के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। सभीनागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गोंया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएँरखी गयी। 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिएअनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए।स्वतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 को आरक्षण लागू हुआ था। पिछड़ी जातियों को डॉभीम राव अम्बेडकर द्वारा दिया गया संरक्षण या आरक्षण उचित था। उस समय देश गुलामीकी जंजीरों से...
समाज

समाज

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समाज । यह एक शब्द है जो आज के घुटनों तक कच्छा पहनकर घूमने वाले युवक युवतियों को बड़ा ही बकवास और दकियानूसी लगता है । क्युकी यह समाज ही है जो अभी तक अपने कंधे पर अपने अतीत और अपनी सामाजिक परम्पराओं की गठरी लेकर चलता आया है और समाज यह गठरी जिम्मेदारी के उन कंधों पर डालता है जो इसे संभालकर रख सके और आगे किसी जिम्मेदार व्यक्ति को हस्तांतरित कर सके । लेकिन यह हमारे और आपके लिए कितने अफसोस और शर्म की बात है कि हमारे इतनी बड़ी बड़ी डिग्री धारण करने के बाबजूद समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों को वो कंधे नही मिल पा रहे है । वैसे समाज करता क्या है ? समाज का काम क्या है ? समाज ने आज तक किया ही क्या है ? ये सब बातें आज के पढ़े लिखे कूल ड्यूड के दिमाग में आती ही है क्युकी आजका कुल ड्यूड हर चीज को अपने किताबी ज्ञान के तर्क,वितर्क और कुतर्कों से ही परखता है । यहां तर्क,वितर्क और कुतर्को का नाम इसलिए दिया जा ...
हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही हिंसक घटनाएं क्यों?

हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही हिंसक घटनाएं क्यों?

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण, सामाजिक
- ललित गर्ग- रामनवमी पर निकाली गई शोभा यात्राओं के दौरान देश के विभिन्न राज्यों में हिंसा की जो वीभत्स, त्रासद एवं उन्मादी घटनाएं सामने आई हैं वे एक सवाल खड़ा करती हैं कि हिन्दुओं के त्यौहारों को ही अशांत एवं हिंसक क्यों किया जाता है? आखिर हिन्दू उत्सवों के मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल खराब करने के लिए क्या जानबूझकर कोई षड्यंत्र किया जाता है? क्यों हिन्दू देवी-देवताओं से जुड़ी आस्था पर ही हमला क्यों किया जाता है। गैर भाजपा सरकारों के राज्यों में ही हिन्दूओं पर हमले क्यों हो रहे हैं? सवाल यह भी है कि संबंधित राज्य की सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ही सतर्क क्यों नहीं रहता और दो समुदायों के बीच हिंसा भड़कने का इंतजार क्यों करता है? हर साल की तरह इस बार भी रामनवमी के दिन पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र में हिंसा हुई और इसके बाद बिहार सुलग उठा। ब...
क्या है हिन्दू फोबिया का कारण

क्या है हिन्दू फोबिया का कारण

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, विश्लेषण, साहित्य संवाद
क्या है हिन्दू फोबिया का कारणहिन्दू धर्म या सनातन संस्कृति जिसकी जड़ें संस्कारों के रूप में, परम्पराओं के रूप में भारत की आत्मा में अनादि काल से बसी हुई हैं।ये भारत में ही होता है जहाँ एक अनपढ़ व्यक्ति भी परम्परा रूप से नदियों को माता मानता आया है और पेड़ों की पूजा करता आया है क्या है हिन्दू फोबिया का कारणआज जहां एक तरफ देश में हिन्दू राष्ट्र चर्चा का विषय बना हुआ है। तो दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में रामनवमी के जुलूस के दौरान भारी हिंसक उत्पात की खबरें आती हैं। एक तरफ हमारे देश में देश में धार्मिक असहिष्णुता या फिर हिन्दुफोबिया का माहौल बनाने की कोशिशें की जाती हैं तो दूसरी तरफ अमेरिका की जॉर्जिया असेंबली में 'हिंदूफोबिया' (हिंदू धर्म के प्रति पूर्वाग्रह) की निंदा करने वाला एक प्रस्ताव पारित किया जाता है। इस प्रस्ताव में कहा जाता है कि "हिंदू धर्म दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुरा...
आसान नहीं  है कर्नाटक की राजनीति को समझना

आसान नहीं  है कर्नाटक की राजनीति को समझना

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, राज्य, विश्लेषण
उमेश चतुर्वेदी टीवी चैनलों के दौर इस में बौद्धिकों की नजर में हर विधानसभा चुनाव सेमीफाइनल बन गया है। विधानसभा चुनाव की तारीखें घोषित होते ही विशेषकर राजधानी केंद्रित बौद्धिक घोषित करने लगते हैं कि आने वाले चुनावों पर इस चुनाव विशेष के नतीजों का बड़ा असर होगा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर भी ऐसी ही स्थापित धारणाएं लगातार प्रसारित हो रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी के उभार के बाद ऐसी धारणाएं कई बार ध्वस्त हुई हैं। फिर भी इन्हीं धारणाओं के इर्द-गिर्द कर्नाटक के संभावित नतीजों का आकलन किया जा रहा है। अतीत के अनुभवकर्नाटक के अतीत के अनुभव भी इन स्थापित धारणाओं को खारिज करते रहे हैं।याद कीजिए 1999 के विधानसभा चुनाव को। तब जनता दल के जेएच पटेल मुख्यमंत्री थे। आम धारणा थी कि येदियुरप्पा की अगुआई में दक्षिण के इस राज्य में अपने दम पर कमल खिल जाएगा। लेकिन कमल खिलने के पहले ही मुरझा गया। वजह ...
हनुमान जी – साहस, शौर्य और समर्पण के प्रतीक

हनुमान जी – साहस, शौर्य और समर्पण के प्रतीक

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हनुमान, जिन्होंने सीता देवी को दिखाने के लिए अपना हृदय खोल दिया कि भगवान राम और वह उनके हृदय में निवास करते हैं और उन्हें उनसे उपहार के रूप में मोतियों के हार की आवश्यकता नहीं है, ऐसे अद्भुत समर्पण और बलिदान की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती . लेकिन भगवान अपने अनुयायियों की भक्ति के लिए ही पीछे हटते हैं। हनुमान की पूजा सभी लोग विशेष रूप से करते हैं जो खेल और कठिन योगाभ्यास में लगे हुए हैं। हनुमान की तरह, हमें अपने मन, बुद्धि को अपनी आत्मा के नियंत्रण में लाकर, अपने स्वामी (हमारे सच्चे स्व, आत्मान) की सेवा करने का प्रयास करना चाहिए। -प्रियंका सौरभ हनुमान सबसे लोकप्रिय हिंदू देवताओं में से एक हैं। वह सेवा (सेवा), भक्ति (भक्ति) और समर्पण (समर्पण, अहंकारहीनता) का अवतार है। वह शिव के अवतार हैं। उन्हें अंजनी देवी के पुत्र पवन-देवता (मरुता) का पुत्र भी माना जाता है। उनकी ठुड्डी ऊंची है (इसलि...
विश्व स्वास्थ्य दिवस और भारत की भूमिका

विश्व स्वास्थ्य दिवस और भारत की भूमिका

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मृत्युंजय दीक्षितविश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ), के स्थापना दिवस 7 अप्रैल को ही विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अनुषांगिक इकाई है जो विश्व के देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर वैश्विक सहयोग तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी विविध एवं मानक विकसित और स्थापित करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 193 सदस्य देश तथा दो संबद्ध सदस्य देश हैं इसकी स्थापना 7 अप्रैल 1948 को की गयी थी जबकि विश्व स्वास्थ्य दिवस वर्ष 1950 से मनाया जा रहा है।इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी 75 वर्षगाँठ मना रहा है इसलिए इस बार का विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेष उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य दिवस लोगों के स्वास्थ्य स्तर में सुधार करने हेतु उनमें स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर जागरुकता लाने के लिए मनाया जाता है। भारत भी विश्व स्वास्थ्‍य संगठन का एक सदस...
बिहार से बंगाल तक हिंसा – हिंदू विरोधी टूलकिट का अभियान

बिहार से बंगाल तक हिंसा – हिंदू विरोधी टूलकिट का अभियान

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बिहार से बंगाल तक हिंसा - हिंदू विरोधी टूलकिट का अभियानबिहार से बंगाल तक रामनवमी को फिर बनाया गया निशानातथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की विकृत राजनीति का दौर प्रारम्भमृत्युंजय दीक्षितजिस समय देश उल्लास और उत्साह के साथ रामभक्ति के रंग में डूबकर रामनवमी का पर्व मना रहा था उस समय कुछ शरारती तत्व अपने राजनैतिक आकाओं के बल पर हिंसा का तांडव रच रहे थे। रामनवमी के पावन अवसर पर बंगाल से बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र तक जिस प्रकार से चुन चुन कर रामनवमी झांकियों, यात्राओं और भक्तों पर पथराव तथा हिंसा की गई वह निंदनीय नहीं घृणित है और उससे भी अधिक घृणित है उस हिंसा को सही ठहराने वाले छद्म धर्मनिरपेक्ष लोगों का व्यवहार फिर वो चाहे कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री ही क्यों न हों।रामनवमी को हिन्दुओं पर हमले के रूप में प्रारम्भ हुयी हिंसा महाराष्ट्र के संभाजीनगर से बंगाल के हावड़ा से होती हुई बिहार के पांच जिलों औ...
भगवान् महावीर अवतरणपर्व –वि.सं.२०८०

भगवान् महावीर अवतरणपर्व –वि.सं.२०८०

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वे राजकुल में जन्मे थे, पर राज्य नहीं किया। कोई युद्ध उन्होंने नहीं जीते। न सेना बनाई। न पराक्रम दिखाया। न शक्ति प्रदर्शन किया। कोई चींटी तक उन्होंने नहीं मारी फिर भी "महावीर" कहलाए। है न अद्भुत बात!वस्तुत: बाहरी शत्रुओं को परास्त करने से अधिक कठिन है भीतरी शत्रुओं को परास्त करना। क्रांति के लिए बाहरी व्यवस्थाओं से पहले खुद की व्यवस्था को बदलना पड़ता है। पहली क्रांति स्वयं में घटित करनी होती है तब जाकर समाज जीवन में क्रान्ति घटित होती है। स्वयं के आचरण, व्यवहार और शील में परिवर्तन लाए बिना समाज में परिवर्तन करने का स्वप्न देखना–दिखाना छल और पाखण्ड है। दुश्मनों को बाहर ही बाहर ढूँढने के चक्कर में हम भीतर छुपे बैठे दुश्मनों को देखना भूल जाते हैं। उनका ख्याल ही नहीं आता। हमारे "अरि" बाहर ही नहीं होते। हमारे भीतर रहकर भी उपद्रव मचाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, अभिमान ...और भी न जाने कौन–क...
समस्याओं से जूझती भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली

समस्याओं से जूझती भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली

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प्रियंका 'सौरभ भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली न केवल संस्थानों के संवैधानिक ताने-बाने में बल्कि पदाधिकारियों के मानस में भी समस्याओं से घिरी हुई प्रतीत होती है। जैसे हमने महामारी के साथ जीना सीख लिया है, वैसे ही हमने ऐसी समस्याओं के साथ जीना सीख लिया है। जैसा कि प्रोफेसर एंड्रयू एशवर्थ ने कहा, "एक न्यायसंगत और सुसंगत आपराधिक न्याय प्रणाली लोगों की एक अवास्तविक अपेक्षा है"। आपराधिक न्याय प्रणाली में एजेंसियों पर बार-बार कानून लागू करने, अपराध का निर्णय लेने और आपराधिक आचरण में सुधार करने का आरोप लगाया जाता है। आपराधिक न्याय प्रणाली सुधारों में मोटे तौर पर न्यायिक सुधार, जेल सुधार और नीतिगत सुधार शामिल हैं। यह अनिवार्य रूप से सामाजिक नियंत्रण का एक साधन है। भारत में आपराधिक कानूनों को ब्रिटिश शासन के दौरान संहिताबद्ध किया गया था, जो 21वीं सदी में कमोबेश वैसे ही बने हुए हैं। लॉर्ड थॉ...