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यह संकट किसानी का नहीं सबका है

स्पष्ट दिखने लगा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग ने हमारे खेत-खलिहानों में दस्तक दे दी है। जिस गति से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, वह आम आदमी के लिये तो कष्टकारी है ही, किसान के लिये ती यह संकट ज्यादा बढ़ा है। इसका सीधा असर खेतों की उत्पादकता पर पड़ रहा है। जिसके मुकाबले के लिये सुनियोजित तैयारी की जरूरत है। किसानों को उन वैकल्पिक फसलों के बारे में सोचना होगा, जो कम पानी व अधिक ताप के बावजूद बेहतर उत्पादन दे सकें। अन्न उत्पादकों को धरती के तापमान से उत्पन्न खतरों के प्रति सचेत करने की जरूरत है, यदि समय रहते ऐसा नहीं होता तो मान लीजिए कि हम आसन्न संकट की अनदेखी कर रहे हैं।

यह मसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मुद्दा दुनिया की सबसे बड़ी आबादी की खाद्य शृंखला से भी जुड़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि गाहे-बगाहे इस संकट की जद में देश का हर नागरिक आएगा। दरअसल, दुनिया के तापमान पर निगाह रखने वाली वैश्विक संस्था डब्ल्यू.एम.ओ़ की एक रिपोर्ट चिंता बढ़ा रही है जिसमें कहा गया है कि पिछले एक दशक में पृथ्वी का तापमान कमोबेश औसत तापमान से अधिक ही रहा है।

गम्भीर बात यह है कि इसके मौजूदा साल में और अधिक रहने की आशंका जतायी जा रही है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि से पूरी दुनिया का मौसम चक्र गहरे तक प्रभावित होता है। देर-सबेर इससे मनुष्य जीवन का हर पहलू प्रभावित होगा। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल वॉर्मिंग संकट के चलते पूरी दुनिया में यह कह पाना कठिन है कि कहां अप्रत्याशित बारिश होगी और कहां कष्टकारी तापमान बढ़ेगा। इसके बावजूद विकसित देशों की सरकारें इस गंभीर संकट के प्रति सचेत नजर नहीं आती। ऐसे में आशंका जतायी जा रही है कि इस सदी के मध्य तक दुनिया का तापमान डेढ़ डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ सकता है। जो मानव जीवन चक्र व फसलों के लिये घातक साबित हो सकता है।

सब जानते है कि दुनिया के बड़े राष्ट्र कार्बन उत्सर्जन को कम करने तथा जीवाश्म ईंधन पर रोक लगाने के लिये प्रतिबद्ध नजर नहीं आ रहे हैं। पूरी दुनिया में बड़े राष्ट्र विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से दोहन करने में लगे हैं। वे इस बात को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं कि आज दुनिया में औद्योगिकीकरण से पहले के समय के मुकाबले विश्व का तापमान निर्धारित सीमा को पार कर चुका है। जो हमारे लिये एक खतरे की घंटी जैसा है।

चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि हम मौसमी बदलाव के अनुकूल खुद को उसी अनुपात में तेजी से ढाल नहीं पा रहे हैं। दरअसल, हमें मौसम के व्यवहार में तेजी से हो रहे बदलाव के अनुरूप अपनी खेती के पैटर्न में भी बदलाव की जरूरत है। उन परंपरागत फसलों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो कम बारिश व अधिक तापमान में ठीक-ठाक उपज देने में सक्षम हैं।

एक समय भारत में बड़े भू-भाग में हम मोटे अनाज का उत्पादन करते थे, जो कम बारिश में भी बेहतर फसल देता था। कालांतर हमने अधिक सिंचाई वाली फसलों का उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर करना तेजी से शुरू कर दिया। मौसम में बदलाव का असर खाद्यान्न ही नहीं, सब्जियों, फल-फूलों पर भी गहरे तक पड़ रहा है। ऐसे में सिर्फ कागजी कार्रवाई के बजाय धरातल पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। हमारे कृषि विश्वविद्यालयों को फसलों के नई किस्म के बीज तैयार करने होंगे, जो किसानों को संबल देने के साथ ही हमारी खाद्य सुरक्षा चेन को सुरक्षित बना सकें। साथ ही हमें कार्बन उत्सर्जन के स्रोतों पर भी अंकुश लगाना होगा। हमें मीथेन उत्सर्जन के स्रोतों पर भी नियंत्रण करना होगा क्योंकि भारत चीन के बाद मीथेन उत्सर्जन में दूसरे नंबर पर है। इसके साथ ही पशुधन का संरक्षण भी अनिवार्य होगा। यदि हम अभी भी नहीं जागे तो हमें अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, चक्रवाती तूफान जैसी आपदाओं के लिये तैयार रहना होगा। भारत, जहां देश की आधी आबादी कृषि व उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है, उसके लिये यह संकट बड़ा है।

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