क्यों नहीं रुक रही भ्रूण हत्या और लिंगभेद ?
लेखक : अरुण तिवारी
क़ानूनी तौर पर अभी लिंग परीक्षण, एक प्रतिबंधित कर्म है। ''इसकी आज़ादी ही नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए।'' - श्रीमती मेनका गांधी ने बतौर महिला एवम् बाल विकास मंत्री कभी यह बयान देकर, भ्रूण हत्या रोक के उपायों को लेकर एक नई बहस छेङ दी थी। उनका तर्क था कि अनिवार्यता के कारण, हर जन्मना पर कानून की प्रशासन की नज़र रहेगी। उनका यह तर्क सही हो सकता है, किंतु भ्रष्टाचार के वर्तमान आलम के मद्देनज़र क्या यह गारंटी देना संभव है कि प्रशासन की नज़र इस अनिवार्यता के कारण कमाई पर नहीं रहेगी ? प्रश्न यह भी है कि क्या क़ानून बनाकर, भ्रूण हत्या या लिंग भेद को रोका जा सकता है ? क्या लिंग परीक्षण को प्रतिबंधित कर यह संभव हुआ है ? आइये, जानें कि भ्रूण हत्या और इस पर रोक के प्रयासों की हक़ीकत क्या है ?
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