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विश्लेषण

कमी कानून में है या गलतियां कपड़ों में ?

कमी कानून में है या गलतियां कपड़ों में ?

विश्लेषण, सामाजिक
कमी कानून में है या गलतियां कपड़ों में ? आपने पहले भी स्त्रियों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न तथा अन्य ज्यादतियों के मामले में उल्टे उसी को कुलटा या चरित्रहीन बता देने का प्रसंग तो सुना ही होगा, किन्तु आज के  दौर में  मूल्यों की जमीन कितनी कमजोर है इसका अंदाजा इस वाकिये से सहज ही लगा सकते हैं कि अदालत में जज की कुर्सी पर बैठा हुआ शख़्स पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता पर मुहर लगा रहा है। हम ये मान भी लें कि पहली बार कोर्ट ने सच बोलने का साहस किया है, लेकिन छोटी बच्चियों के साथ जब कोई ग़लत करता है तब कौन से कपड़ों को जिम्मेदार ठहराया जायेगा? अदालत के फैसले कुछ हद तक ठीक है मगर ऐसे फैसले यौन शोषण को बढ़ावा देते है।  उत्पीड़न सरासर ग़लत है यह अधिकार किसी भी पुरुष को नहीं, पर एक प्रश्न है, क्या आजकल लड़कियां जो कपड़े पहन रही है वो सही है? लड़कियों की ऐसे नंगे कपड़े पर पाबंदी लगनी चाहिए।...
बेरोजगारी में नंबर वन हरियाणा: युवाओं के साथ खेलती सरकार, क्यों नहीं हो रही भर्तियां?

बेरोजगारी में नंबर वन हरियाणा: युवाओं के साथ खेलती सरकार, क्यों नहीं हो रही भर्तियां?

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बेरोजगारी में नंबर वन हरियाणा: युवाओं के साथ खेलती सरकार, क्यों नहीं हो रही भर्तियां? अगर सरकार की मंशा ही है तो आखिर क्यों राज्य में लाखों पदों के खाली होने के बावजूद यहां के औद्योगिक प्रशिक्षण विभाग में आईटीआई  इंस्ट्रक्टर के पदों पर भर्ती नहीं होती? शिक्षकों के खाली पदों को क्यों नहीं भरा जाता? एचएसआईआईडीसी एवं पुलिस  के चयनित उम्मीदवारों को जॉइनिंग क्यों नहीं दी जाती? सरकार को इन बातों का युवाओं को जवाब देना चाहिए। इन सबके अलावा हजारों पद ग्रुप डी के और ग्रुप सी श्रेणी के खाली पड़े हैं और हरियाणा के करोड़ों युवा दिन रात मेहनत कर इन की तैयारियां कर रहे हैं।  सरकार क्यों उनका एग्जाम लेकर तुरंत इन भर्तियों को पूरा करती? क्यों कोर्ट और कर्मचारी चयन आयोग के बीच बार-बार इन भर्तियों को उलझा कर रखा जाता है? और युवाओं को पेंडुलम बनाकर रख दिया...
रुश्दी पर हमला, किताब का जवाब किताब से दिया जाये

रुश्दी पर हमला, किताब का जवाब किताब से दिया जाये

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रुश्दी पर हमला, किताब का जवाब किताब से दिया जाये अथवा भारत को क्यों चाहते हैं रुश्दी आर.के. सिन्हा अगर आप कभी हिमाचल प्रदेश के बेहद खूबसूरत शहर सोलन में घूमने के लिये जायें तो आपको वहां कोई स्थानीय शख्स बता ही देगा कि यहां पर मशहूर लेखक सलमान रुश्दी का भी बंगला है। इसे उनके पिता अनीस अहमद ने बनवाया था। उसे लेने के लिये “सेटेनिक वर्सेज” तथा “मिडनाइट चिल्ड्रन” जैसी बहुचर्चित कृतियों के लेखक सलमान रुश्दी ने कानूनी जंग लड़ी थी और अंत में विजयी भी रहे थे। सलमान रुश्दी को हम मोटा-मोटी एक प्रख्यात लेखक के तौर पर ही जानते हैं। वैसे वे भारतीय मूल के लेखक हैं जो इंग्लैंड-अमेरिका में रहते हैं। उनके पिता दिल्ली वाले थे और रुश्दी का जन्म मुंबई में हुआ था। इसलिये उन पर हाल ही में न्यूयार्क में हुये जानलेवा हमले को किसी भी सच्चे भारतीय द्वारा नजरअंदाज करना मुश्किल है। अफसोस तो यह है कि हमारे...
कोलाहाल में भी गूंजती थी राकेश झुनझुनवाला की आवाज

कोलाहाल में भी गूंजती थी राकेश झुनझुनवाला की आवाज

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कोलाहाल में भी राकेश झुनझुनवाला की आवाज को साफतौर पर सुना जा सकता था। उनकी आवाज में विश्वास और अनुभव को महसूस किया जा सकता था। वे जब किसी से मिलते तो ये ही कहते थे- ‘क्या हाल है आपका ? ‘क्या कर सकता हूं मैं आपके लिए?  ‘मार्केट किस तरफ जायेगी…’ जाहिर है, वे जब मार्केट का जिक्र करते थे तब वे शेयर बाजार की चाल के बारे में अपने करीबियों से भी उनकी राय पूछते थे। हां, पर वे किसी भी कंपनी के स्टॉक में निवेश करते हुये अपने शेयर मार्केट के अनुभव का ही सहारा लेते थे। उनके आकस्मिक निधन से देश के उन लाखों निवेशकों का एक तरह से विश्वस्त मार्गदर्शक विदा हो गया है, जिसे देखकर वे हजारों निवेशक भी शेयर मार्केट में निवेश करके अच्छा पैसा कमाने लगाने थे। वे बेशक आज के दिन के देश की शेयर मार्केट के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसेडर थे। भारत के शेयर बाजार का जिक्र उनकी चर्चा किये बगैर अधूरा ही रहता था। राकेश झुनझुनव...
महोत्सव के बाद अमृत बनाये रखने की चुनौती।

महोत्सव के बाद अमृत बनाये रखने की चुनौती।

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रोजगार विहीन विकास किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित दांव नहीं है। बेरोजगारी न केवल हमारे मानव संसाधनों के इष्टतम उपयोग की अनुमति देती है बल्कि सामाजिक कलह और विभाजनकारी राजनीति के लिए प्रजनन स्थल भी बनाती है। शिक्षा, स्किलिंग, युवा उद्यमियों और नवप्रवर्तन कर्ताओं को उपयुक्त रोजगार और सहायता, शिक्षा और रोजगार के लिए देश भर में गतिशीलता को आसान बनाना समय की जरूरत है। सांप्रदायिक और भाषाई बाधाएं ऐसी गतिशीलता में बाधा डालती हैं और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। भारत को युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। -सत्यवान ‘सौरभ’ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जल्द ही पृथ्वी पर सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने वाला है। इसलिए, स्वतंत्रता के 75 वर्ष का उत्सव व्यक्तिगत और सामूहिक स्वतंत्रता के संरक्षण और प्रचार में वैश्विक मानकों को स्थापित करने के लिए एक वि...
आखिर क्यों नहीं देते आमिर खान देश के सवालों के जवाब

आखिर क्यों नहीं देते आमिर खान देश के सवालों के जवाब

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  आखिर क्यों नहीं देते आमिर खान देश के सवालों के जवाब आर.के. सिन्हा कहते हैं कि इंसान को बहुत सोच-समझकर ही कुछ बोलना चाहिए। यानी उसे इस तरह की बातें करने से बचना चाहिए जिससे उसे आगे चलकर कष्ट हो। आमिर खान के साथ आज के दिन यही हो रहा है। आमिर खान ने 2015 में बड़ी बुलंदी से कहा था कि “वे देश के मौजूदा वातावरण में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और वे अपने  बच्चों को लेकर  चिंतित हैं और देश छोड़कर जाना चाहते हैं।” उस समय यह बात उन्होंने मोदी सरकार के शासन काल के शुरू होने पर अपनी टिप्पणी के रूप में मोदी विरोधियों की वाहवाही लूटने के लिये कही थीं I उन्हें क्या पता था कि मोदी सरकार लम्बे समय तक भारत पर शासन करने वाला है I आमिर खान अब अपनी पिक्चर लाल सिंह चड्ढा को प्रमोट करते हुये लगभग गिड़गिड़ाने वाले भाव से भारत भर के सिने प्रेमियों से गुजारिश कर रहे हैं कि वे उनकी फिल्म को जरूर देखें। उनकी च...
आतंक के खिलाफ एक अहम जीत

आतंक के खिलाफ एक अहम जीत

विश्लेषण
आतंक के खिलाफ एक अहम जीत -ः ललित गर्ग :-अल कायदा नेता अयमन अल-जवाहिरी का मारा जाना आतंकवाद के खिलाफ विश्वस्तरीय अभियानों के इतिहास में एक बड़ी कामयाबी इसलिये है कि आतंकवाद ने दुनिया में भय, क्रूरता, हिंसा एवं अशांति को पनपाया है। जवाहिरी जैसे हिंसक, क्रूर, उन्मादी एवं आतंकी लोगों ने शांति का उजाला छीनकर अशांति का अंधेरा फैलाया है। दरअसल, वह इतना खुंखार एवं बर्बर इंसान था कि उसको मार गिराना अंसभव-जैसा ही था।  ऐसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी गिरोह के शीर्ष नेताओं तक पहुंचना और दूसरे देश की सीमा में उन्हें मार गिराना साहस एवं शौर्य का काम है। इससे पहले दुनिया भर में अन्य आतंकवादी संगठनों के मामले में भी इस तरह की जटिलताओं का अनुभव दुनिया की महाशक्तियां करती रही है।, इसलिए जवाहिरी को उसके घर में घूस कर मारना अमेरिका की एक बड़ी उपलब्धि है। दुनिया में अब आतंकवाद पर काबू पाने की दृष्टि ...
खेलों में भारत के बढ़ते कदम, 61 पदकों के साथ बना खेल महाशक्ति

खेलों में भारत के बढ़ते कदम, 61 पदकों के साथ बना खेल महाशक्ति

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खेलों में भारत के बढ़ते कदम, 61 पदकों के साथ बना खेल महाशक्ति आर.के. सिन्हा यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में भारत की लगभग सांकेतिक उपस्थिति ही रहा करती थी। हम हॉकी में तो कभी-कभार बेहतर प्रदर्शन कर लिया करते थे, पर शेष खेलों में हमारा प्रदर्शन औसत से नीचे या खराब ही रहता था। हमारे खिलाड़ियों- अधिकरियों की टोलियां वहां पर जाकर मौज-मस्ती करके वापस आ जाया करती थी। हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों की निगाहें तरस जाती थीं कि एक अदद पदक को देखने के लिए। पर गुजरे दशक से स्थितियां तेजी से बदल रही हैं खासकर मोदी सरकार के आने के बाद। सबसे बड़ी बात ये है कि हम बैडमिंटन में विश्व चैंपियन बनने लगे हैं, हमारा धावक ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतता है और क्रिकेट में तो हम विश्व की सबस बड़ी शक्ति हैं ही। इस कामनवेल्थ गेम में 22 स्वर्ण पदकों सहित कुल 61 पदकों...
हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने

हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने

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हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने नागरिकों के सुरक्षित और समृद्धशाली जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है; उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धी का होना। इसलिए क्या आपको हर घर तिरंगा फहराने के साथ-साथ हर घर रोज़गार की आवश्यकता ज़्यादा नहीं लग रही है ? आज  आज़ादी के 75 साल बाद भी देश के नौजवान बेरोजागरी के चलते आत्महत्या करने को मजबूर है।  हम सभी देश वासी हर घर तिरंगा लहरायेंगे, लेकिन इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें लाल किले से ये आवाज़ भी तो सुनाई दे कि देश के हर नागरिक को समान शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, रोजगार गारंटी दी जाएगी। यही तो सच्चा राष्ट्रवाद है। -प्रियंका 'सौरभ' हर घर तिरंगा आज़ादी का अमृत महोत्सव के तहत एक अभियान है। यह अभियान लोगों को भारत की आजादी के 75वें वर्ष में तिरंगा घर लाने और इसे फहराने के लिए प्रोत्साहित करता है। नागरिकों और तिरंगे के बीच संबंध हमेशा से...
वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट

वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट

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वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं। एक विकासवादी दृष्टिकोण से, हमारे प्रारंभिक अस्तित्व के लिए सामाजिक संबंध आवश्यक थे, और अभी भी बहुत कुछ हैं। वास्तव में, सामाजिक जुड़ाव मानव जीवन के सबसे बुनियादी पहलुओं में से एक है और हमारी भलाई के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरों के लिए डिस्कनेक्ट या अनदेखा महसूस करना न केवल दर्दनाक भावनात्मक अवस्थाओं को उजागर करेगा, बल्कि एक बुनियादी मानवीय आवश्यकता-संबंधितता की आवश्यकता को भी विफल कर देगा। हालाँकि, जिस तरह प्यास हमें पानी पीने के लिए एक संकेत के रूप में कार्य करती है, उसी तरह दर्दनाक भावनात्मक अवस्थाएँ हमें दूसरों के साथ अधिक संबंध बनाने के लिए एक संकेत के रूप में काम कर सकती हैं।मौजूदा साक्ष्य इंगित करते हैं कि सामाजिक जुड़ाव का स्वास्थ्य और दीर्घायु पर एक शक्तिशाली प्रभाव है। उदाहरण के लिए, जो लोग दूसरों से अधिक जुड़ाव ...