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सामाजिक

Church – Façade & Reality

Church – Façade & Reality

TOP STORIES, सामाजिक
By Balbir Punj Is Church in India a religious organisation wedded to spiritual upliftment of the laity, or an outfit with its own socio-political agenda? This issue has been brought to fore once again following a violent turn in the Church led agitation, going on for nearly 140 days in Kerala against the construction of Vizhinjam International Sea Port, in Thiruvananthapuram. It was fire and brimstone at Vizhinjam on November 27.  The agitators, led by the Latin Catholic Church against the Rs 7,525 crore international sea port project in Thiruvananthapuram, allegedly vandalised the local police station and thrashed 27 police personnel, three of them seriously. Police allege the violence was planned. “They (protesters) had done detailed planning. Two youths, wearing masks, ha...
यहां तो स्त्री कंधा से कंधा मिला कर चलती मिलती है

यहां तो स्त्री कंधा से कंधा मिला कर चलती मिलती है

सामाजिक, साहित्य संवाद
दयानंद पांडेय  एक बार गोरखपुर यूनिवर्सिटी में वायवा लेने आए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। वाइबा में एक लड़की से उन्हों ने करुण रस के बारे में पूछ लिया। लड़की छूटते ही जवाब देने के बजाय रो पड़ी। बाद में जब वायवा की मार्कशीट बनी तब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उस रो पड़ने वाली लड़की को सर्वाधिक नंबर दिया। लोगों ने पूछा कि, ' यह क्या? इस लड़की ने तो कुछ बताया भी नहीं था। तब भी आप उसे सब से अधिक नंबर दे रहे हैं? ' हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा, 'अरे सब कुछ तो उस ने बता दिया था।  करुण रस के बारे में मैं ने पूछा था और उस ने सहज ही करुणा उपस्थित कर दिया। और अब क्या चाहिए था? ' लोग चुप हो गए थे। सच यही है कि करुणा न हो तो साहित्य न हो । आह से उपजा होगा गान !  सुमित्रा नंदन पंत ने ठीक ही लिखा है । करुणा और स्त्री की संवेदनात्मक बुनावट अदभुत  है । बाल्मीकि कवि बने ही थे करुणा...
अवैध मतांतरण

अवैध मतांतरण

राष्ट्रीय, समाचार, सामाजिक
ह्रदय नारायण दीक्षित अवैध मतांतरण राष्ट्रीय चुनौती है। ईसाई इस्लामी समूह काफी लम्बे समय से अवैध मतांतरण में संलग्न हैं। वे सारी दुनिया को अपने पंथ मजहब में मतांतरित करने के लिए तमाम अवैध साधनों का इस्तमाल कर रहे हैं। अपनी आस्था विवेक और अनुभूति में जीना प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। लेकिन यहाँ अवैध मतांतरण के लिए छल बल भय और प्रलोभन सहित अनेक नाजायज तरीके अपनाए जा रहे हैं। यह मानवता के विरुद्ध असाधारण अपराध है। और राष्ट्रीय अस्मिता के विरुद्ध युद्ध भी है। मतांतरण से व्यक्ति अपना मूल धर्म ही नहीं छोड़ता, उसकी देव आस्थाएं बदल जाती हैं। पूर्वज बदल जाते हैं। वह अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमानी नहीं रह जाता। वह नए पंथ मजहब के प्रभाव में अपने पूर्वजों पर भी गर्व नहीं करता। उसकी भूसांस्कृतिक निष्ठा बदल जाती है। भूसांस्कृतिक निष्ठा ही भारतीय राष्ट्र का मूल तत्व है। इसलिए मतांतरण राष्ट्रांतरण ...
जीव-जंतुओं की आहे एवं क्रंदन को सुनना होगा

जीव-जंतुओं की आहे एवं क्रंदन को सुनना होगा

विश्लेषण, सामाजिक
- ललित गर्ग -उत्तर प्रदेश के बदायूं में चूहे को मारने के आरोप में एक युवक के खिलाफ मामला दर्ज होने की घटना मानव-समाज में साधारण होकर भी चौका रही है, चौका इसलिये रही है कि यह मनुष्य की संवेदनहीनता, बर्बरता एवं क्रूरता की मानसिकता को दर्शाती है। बेजुबानों के साथ निर्दयता का सिलसिला खत्म नहीं होना चिन्ताजनक है। ऐसी घटनाएं बार-बार होती है, कभी एक गाय को खाने के समान में विस्फोटक पदार्थ एवं एक हथिनी को कुछ लोगों ने मनोरंजन के चलते बारुद से भरे अनानास खिलाना हो, एक चीते को पीट-पीट कर मार देना। हाल ही में दिल्ली में एक गर्भवती कुतिया को एक कालेज के कुछ कर्मचारियों और छात्रों ने मिल कर बेहद बर्बरता से पीट-पीट कर मार डाला-ये घटनाएं क्रूरता की पराकाष्ठा है, जो मनुष्यता को शर्मसार करती है। बदायूं का यह ताजा मामला चूंकि अब कानून के कठघरे में है, इसलिए अब इसका फैसला कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाएगा।...
दुुनिया के प्रसन्न समाजों में हम क्यों पिछड़ रहे हैं?

दुुनिया के प्रसन्न समाजों में हम क्यों पिछड़ रहे हैं?

सामाजिक
-ललित गर्ग- संयुक्त राष्ट्र की ने वर्ष 2022 की पहली तिमाही में सालाना वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट जारी की है। 149 देशों की सूची में भारत का स्थान खुशी और प्रसन्नता के मामले में 136वां है, जो  हैरानी का बड़ा कारण है। इस सूची में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार अव्वल रहा है। डेनमार्क, आइसलैंड, स्विटजरलैंड और नीदरलैंड ने शीर्ष पंाच में अपना स्थान बनाया है। हम प्रसन्न समाजों की सूची में क्यों नहीं अव्वल आ पा रहे हैं। गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के चुनाव की सरगर्मियों एवं शोरशराबे के बीच इस रिपोर्ट का आना जहां सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन करने का अवसर दे रहा है, वहीं नीति-निर्माताओं को भी सोचना होगा कि कहां समाज निर्माण में त्रुटि हो रही है कि हम लगातार खुशहाल देशों की सूची में नीचे खिसक रहे हैं। क्या खुशियों को स्थापित करना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? हमारी खुशी कैसी है, इसको मापना ...
टिकाऊ  हरित पर्यावरण के लिए सुरक्षित सड़कें जरूरी 

टिकाऊ  हरित पर्यावरण के लिए सुरक्षित सड़कें जरूरी 

BREAKING NEWS, TOP STORIES, राज्य, सामाजिक
वाहन दुर्घटनाओं का पर्यावरणीय प्रभाव देखे तो अधिकांश वाहनों में सीसा, पारा, कैडमियम या हेक्सावेलेंट क्रोमियम जैसी जहरीली धातुएं होती हैं, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। दुर्घटनास्थल पर ईंधन और तरल पदार्थ का रिसाव और गंभीर सड़क दुर्घटनाएं ऑटोमोबाइल मलबे का कारण बनती हैं, जो अनुपयोगी अंत-जीवन वाहनों का एक हिस्सा बन जाती है। विश्व स्तर पर कई सरकारों ने दुर्घटनाओं को रोकने और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए गति सीमा कम कर दी है। जीरो-फेटलिटी कॉरिडोर समाधान भारत में, सेवलाइफ फाउंडेशन (एसएलएफ) द्वारा सड़क सुरक्षा के लिए जीरो-फैटलिटी कॉरिडोर समाधान पर्यावरणीय स्थिरता को गंभीरता से लेता है। -प्रियंका सौरभ  2021 में, भारत ने 4,03,116 दुर्घटनाओं की सूचना थी, जिनमें से प्रत्येक ने विभिन्न तरीकों से और अलग-अलग डिग्री में पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। ट्रैफिक शेयर और राष्ट्रीय अर्थव्यव...
सफल जीवन के लिये हम खुद को बदलें

सफल जीवन के लिये हम खुद को बदलें

सामाजिक, साहित्य संवाद
-ललित गर्ग -हर रिश्ते को संवेदना से जीने के लिये जरूरी है प्रेम एवं विश्वास। प्यार एवं विश्वास दिलों को जोड़ता है। इससे कड़वे जख्म भर जाते हैं। प्यार की ठंडक से भीतर का उबाल शांत होता है। हम दूसरों को माफ करना सीखते हैं। इनकी छत्रछाया में हम समूह और समुदाय में रहकर शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। लेखिका रोंडा बायन कहती हैं कि जितना ज्यादा हो सके हर चीज, हर व्यक्ति से प्यार करें। ध्यान केवल प्यार पर रखें। पाएंगे कि जो प्यार आप दे रहे हैं, वह कई गुणा बढ़कर आप तक लौट रहा है। हम समाज में एक साथ तभी रह पाते हैं जब वास्तविक प्रेम एवं संवेदना को जीने का अभ्यास करते हैं। उसका अभ्यास सूत्र है-साथ-साथ रहो, तुम भी रहो और मैं भी रहूं। या ‘तुम’ या ‘मैं’ यह बिखराव एवं विघटन का विकल्प है। ‘हम दोनों साथ नहीं रह सकते’ यह नफरत एवं द्वेष का प्रयोग है। विरोध में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। जो व्यक्ति दूसर...
हिंदी के नाम पर आत्महत्या क्यों?

हिंदी के नाम पर आत्महत्या क्यों?

TOP STORIES, सामाजिक
*डॉ. वेदप्रताप वैदिक* कल भारत का संविधान-दिवस था और कल ही तमिलनाडु के एक व्यक्ति ने यह कहकर आत्महत्या कर ली कि केंद्र सरकार तमिल लोगों पर हिंदी थोप रही है। आत्महत्या की यह खबर पढ़कर मुझे बहुत दुख हुआ। पहली बात तो यह कि किसी ने हिंदी को दूसरों पर लादने की बात तक नहीं कही है। तमिलनाडु की पाठशालाओं में कहीं भी हिंदी अनिवार्य नहीं है। हाँ, गांधीजी की पहल पर जो दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा बनी थी, वह आज भी लोगों को हिंदी सिखाती है। हजारों तमिलभाषी अपनी मर्जी से उसकी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। आत्महत्या करनेवाले सज्जन चाहते तो वे इसका भी विरोध कर सकते थे लेकिन विरोध का यह भी क्या तरीका है कि कोई आदमी अपनी या किसी की हत्या कर दे। जो अहिंदीभाषी हिंदी नहीं सीखना चाहें, उन्हें पूरी स्वतंत्रता है लेकिन वे कृपया सोचें कि ऐसा करके वे अपना कौनसा फायदा कर रहे हैं? क्या वे अपने आप को बहुत संकुचित नही...
माई लार्ड ! जेल में बंद लोग भी देश के नागरिक हैं

माई लार्ड ! जेल में बंद लोग भी देश के नागरिक हैं

EXCLUSIVE NEWS, TOP STORIES, सामाजिक
-राकेश दुबे  भारत की आज़ादी और भारत में आज़ादी को लेकर कभी भी और कहीं भी बहस होती रहती है | आज तक देश में किसी राजनीतिक दल ने उन विचाराधीन कैदियों की बात नहीं की जो जेलों में हैं | इनकी संख्या कोई छोटी- मोटी नहीं बल्कि 4.27 लाख से अधिक है | देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने   कुछ दिन पहले संविधान दिवस के अवसर पर बिना जमानत और सुनवाई के लंबे समय से जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का भावनात्मक निवेदन किया है | जिस कार्यक्रम में उन्होंने यह मुद्दा उठाया  उसमें देश के प्रधान न्यायाधीश समेत सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश तथा केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी उपस्थित थे|  राष्ट्रपति की इस अपील को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने देशभर के राज्य सरकारों और जेल अधिकारियों को ऐसे तमाम कैदियों के बारे में 15 दिन के भीत...
राहुल गांधी जैसे विधर्मियों, ईसाईयो व कसाइयों को मठ-मंदिरों में प्रवेश से वंचित करो

राहुल गांधी जैसे विधर्मियों, ईसाईयो व कसाइयों को मठ-मंदिरों में प्रवेश से वंचित करो

Current Affaires, EXCLUSIVE NEWS, विश्लेषण, सामाजिक
राष्ट्र-चिंतन*   *आचार्य श्री विष्णुगुप्त*  राहुल गांधी अभी-अभी उज्जैन के महाकाल मंदिर में घुसा और दर्शन के नाम पर भरपूर मनोरंजन किया। राहुल गांधी के इस मनोरंजन खेल को न तो मूर्ख हिन्दू समझेंगे और न ही सेक्युलर हिन्दू समझेंगे, महाकाल जैसे मंदिरों के पुजारियों और मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्य भी नहीं समझेंगे। उपर्युक्त टिप्पनियां सोशल मीडिया पर खूब चली, इस तरह की टिप्पणियों के सहचर लोगों का गुस्सा यह है कि राहुल गांधी जैसे विधर्मियों और गैर हिन्दुओं का प्रवेश मंदिरों और मठों में क्यों होना चाहिए? विधर्मियों और गैर हिन्दुओं का मठ-मंदिरों में प्रवेश उसी तरह से निषेध होना चाहिए जिस तरह से मक्का मदीना में गैर मुसलमानों का प्रवेश निषेध है। यानी कि अब स्वाभिमानी हिन्दू अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए मक्का-मदीना जैसा विकल्प चाहते हैं।            ईसाई और मु...