काव्य की उपेक्षिताएं: भारतीय जीवन दृष्टि
रवीन्द्रनाथ का निबंध काव्य की उपेक्षिताएं पढ़ रहा था। प्रिय भाई शिव कुमार ने अपनी वाल पर लगाया है। उस निबंध के केन्द्र में रामायण की पात्र उर्मिला है। कविवर मानते हैं कि आदिकवि ने उर्मिला के साथ न्याय नहीं किया। वे अत्यंत भावुक होकर सोचते हैं और भावुकता उन्हें आत्ममुग्धता के तट पर ले जाती हैं-जहां उन्हें यह अनुभव होता है कि जो वाल्मीकि नहीं देख सके, वह मैं देख पा रहा। मैं तो अश्रुपात के साथ बहा जा रहा! साहित्य की भावभूमि स्वतंत्र होती है। वहां कोई बंधन नहीं होता। कवि, नाटककार और उपन्यासकार अपनी दृष्टि से पात्रों को गढ़ते हैं। भवभूति की सीता वाल्मीकि की सीता से भिन्न हैं। अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। किन्तु रामायण के संदर्भ महत्वपूर्ण क्या है? उसके प्रतिपाद्य क्या हैं? रामायण के अनेकानेक छोटे-बड़े पात्र अमर हैं। किन्तु उनकी कोई स्वतंत्र सत्ता महाभारत के पात्रों की तरह नहीं है। वे सभी ...









