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गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और न्याय

गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और न्याय

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कांग्रेस अध्यक्ष की बेसिक इनकम गारंटी प्रस्ताव के सम्बन्ध में। इसके बारे में तात्विक चर्चा का बहुत विस्तार है। संकेत भर के लिए कुछ तात्विक प्रश्न इस प्रकार हैं- गरीबी, भुखमरी, लाचारी, बेरोजगारी क्या ये समानार्थक हैं या इनमें कोई भेद है? इस दृष्टि से कोई विचार प्रकट नहीं किया गया। विगत वर्षों में बीपीएल की सीमा और बीपीएल की पहचान करके उनको कार्ड देना जमीनी स्तर पर बहुत विवाद का मुद्दा रहा है। इसकी ओर कोई संकेत नहीं। बीपीएल क्या एक व्यक्ति इकाई है या परिवार इकाई है या समाज इकाई है? ये मुद्दा विशेष उभर कर आया है बीपीएल की पहचान करने के नए एसेट्स बेस्ड मेथोडोलॉजी से। क्या टार्गेटेड सब्सिडी कार्यक्रम चलाना एक अच्छी नीति है? क्या इससे अपेक्षित परिणाम निकल पाते हैं? क्या इस प्रकार की बहुविध स्कीम्स का कोई निश्चित लाभ लाभार्थियों को पहुंचा है? क्या वे गरीबी रेखा से बाहर आ पाए हैं?...
घोषणापत्रों में कहीं फिर छूट ना जाये पर्यावरण के सवाल

घोषणापत्रों में कहीं फिर छूट ना जाये पर्यावरण के सवाल

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देश में लोकसभा चुनाव अगले माह ही शुरू होने जा रहे हैं। चुनाव का माहौल अब गरम होता ही जा रहा है। होली के बाद चुनावी रैलियों से लेकर नुक्कड़ सभाओं के दौर भी शुरू हो जाएंगे। इसी के साथ ही सभी दल अपने-अपने मेनिफेस्टो या संकल्प पत्रों को भी जारी करने लगेंगे। उनमें वर्णित तमाम बिन्दुओं पर चर्चा भी होगी, वादे और संकल्प भी दुहराये जाएंगे। लेकिन, अब पर्यावरण से जुड़े सवालों पर भी एक बार फिर से फोकस करने का समय आ गया है। सभी दलों को अपने-अपने घोषणापत्रों में देश को यह तो बताना ही होगा कि उनकी पर्यावरण से जुड़े सवालों पर किस तरह की सोच है। अभी भारत में यूरोपीय देशों की तर्ज पर ग्रीन पार्टी बनाने के संबंध में अब कौन सोचेगा? पर अगर कोई पार्टी सिर्फ पर्यावरण से जुड़े सवालों को लेकर चुनाव मैदान में भी उतरे तो भी उसका स्वागत ही होना चाहिए। यही तो भविष्य के लिए, आने वाली पीढिय़ों के हित में की जाने वाली सा...
बढ़ती नफरत का त्रासद दौर

बढ़ती नफरत का त्रासद दौर

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  न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में हुई त्रासद एवं अमानवीय हिंसक घटना आतंकवाद का एक नया संस्करण है। इस आतंकी वारदात ने यह बता दिया है कि जब तक नफरत, संकीर्णता और उन्माद इस दुनिया में सक्रिय है। कोई भी पूरी तरह से सुरक्षित एवं संरक्षित नहीं है। हालही में अल नूर मस्जिद और लिनवुड मस्जिद में नमाज पढऩे गए लोगों पर हथियारबंद हमलावरों ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 50 के आसपास लोग मारे गए और कई घायल हो गए। इस तरह की आतंकी वारदात सिर्फ हमारे भरोसे को ही नहीं हिलाती, बल्कि उन सारी सच्चाइयों को हमारे सामने ला खड़ी करती है, जिनसे चाहे-अनचाहे हम मुंह चुराते रहे हैं। इस प्रकार की यह आतंकी हिंसा एवं विस्फोटों की शृंखला, अमानवीय कृत्य अनेक सवाल पैदा कर रहे हैं। कुछ सवाल लाशों के साथ सो गये। कुछ घायलों के साथ घायल हुए पड़े हैं। कुछ समय को मालूम है, जो भविष्य में उद्घाटित होंगे। इसके पीछे जिस तरह की ...
मोदीराज में “डिफेंस डील : रक्षा सौदे”

मोदीराज में “डिफेंस डील : रक्षा सौदे”

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मोदी सरकार ने 2014 के बाद 4.26 लाख करोड़ से अधिक के रक्षा अनुबंधों पर हस्ताक्षर किया है. ● 36 :- राफेल मल्टीरोल फाइटर : 59,000 करोड़ ● 7 :- प्रोजेक्ट-17A क्लास युद्ध-पोत : 50,000 करोड़ ● 5 :- एयर डिफेंस SAM S-400 : 39,000 करोड़ ● 22 :- अपाचे AH-64 और 15 शिनूक : 3 अरब डॉलर ● पुर्जे और गोला बारूद : 3 अरब डॉलर ● 6 :- अरिहंत क्लास सबमरीन : 23,652 करोड़ ● 1 :- अकुला II क्लास न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बी : 3.3 अरब डॉलर ● बराक-8 MRSAM एयर डिफेंस : 2 अरब डॉलर ● 73 :- ALH ध्रुव : 14,151 करोड़ ● 464 :- मेन बैटल टैंक T-90 MS : 13,448 करोड़ ● 7.47 लाख :- AK-203 असॉल्ट राइफल : 12,280 करोड़ ● LRSAM बराक-8 : 1.41 अरब डॉलर ● 2 :- 'आकाश - NG' SAM रेजिमेंट : 9,100 करोड़ ● 2 :- मल्टी यूटिलिटी वेसल 'HSL' : 9,000 करोड़ ● 4 :- P-8i 'Poseidon' : 1 अरब डॉलर ● 'NASAMS' SAM : 1 अरब डॉलर ● 2 :- प्रोजे...
कश्मीर की सौदेबाज़ी

कश्मीर की सौदेबाज़ी

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वर्तमान में दो बातों से लगभग सभी भारतीय वाकिफ़ होंगे। पहली, भारत द्वारा पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राइक, दूसरी, भगवा आतंकवाद के आरोपियों का बरी हो जाना। दरअसल ये दोनों विषय एक दूसरे से बेहद गहराई से जुड़े हुए हैं, इतने के इनका जुड़ाव देखने को आपको बहुत गहरे उतरना होगा। पर इस मुद्दे पर आने से पहले कुछ प्रश्नों पर विचार करिये और उनके उत्तर समझिए। पहला, कांग्रेस क्यों एयर स्ट्राइक के बाद इमरान के साथ खड़ी नजऱ आई? इसमें कोई राजनीतिक लाभ क्या संभव था? अगर नहीं तो क्या कांग्रेस की मजबूरी थी? दूसरा आखिर ये भगवा आतंक की कहानी गढऩे की मंशा क्या थी? क्या ऐसा करने से कांग्रेस को कोई बड़ा लाभ होने वाला था? अगर बात मुस्लिम वोट की थी तो वो तो वैसे भी भाजपा को नहीं मिलते फिर क्यों? ये कहानी बड़ी है। ये कहानी है वेटिकन के इशारे पर कश्मीर के सौदे की जिसकी भूमिका तैयार करने को रचा गया था 'भगवा आतंक’ का शब्...
अब अलगाववादियों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’,  जमात-ए-इस्लामी के बाद अगला टारगेट हुर्रियत

अब अलगाववादियों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, जमात-ए-इस्लामी के बाद अगला टारगेट हुर्रियत

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  पिछले दो सप्ताह से देश में बने आतंकी और युद्ध जैसे माहौल का स्थायी समाधान करने के लिए केंद्र सरकार ने देश के अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर सख्त रुख अख्तियार किया हुआ है। भारत एक तरफ जहां पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरे हुए है, वहीं पुलवामा हमले के बाद से लगातार आतंकी संगठनों और उन्हें बढ़ावा देने वाले अलगाववादियों पर भी शिकंजा कस रहा है। जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार अब ऐसे कुछ और संगठनों पर जल्द कार्रवाई कर सकती है। केंद्र सरकार ने गैर-कानूनी और विध्वंसकारी गतिविधियों में शामिल होने के कारण कश्मीर के कट्टरपंथी अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस पर कई विध्वंसक कार्रवाई में शामिल होने के आरोप हैं। इसके साथ ही कई आतंकी संगठनों से इसका संपर्क रहा है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों क...
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का पुनर्वास व मुस्लिम घुसपैठ

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का पुनर्वास व मुस्लिम घुसपैठ

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  यह कितनी पक्षपातपूर्ण कुटिलता है कि पुनर्वास नीति के अंतर्गत 20-25 वर्षों से आतंकी बने हुए कश्मीरी जो पीओके व पाकिस्तान में शरण लिये हुए थे/हैं को धीरे-धीरे वापस ला कर पुन: कश्मीर में लाखों रुपये व नौकरियां देकर बसाया जा रहा है। ये आतंकी अपनी नई पाकिस्तानी पत्नी व बच्चों के साथ वापस आकर कश्मीर की मुस्लिम जनसंख्या और बढ़ा रहे हैं। इनको संपूर्ण नागरिक अधिकार व अन्य विशेषाधिकार मिल जाते हैं। मुख्यधारा में लाने के नाम पर इन कश्मीरी आतंकियों को हथियार छोडऩे पर उस हथियार के अनुसार अलग अलग राशि भी दी जाती है। फिर भी यह सुनिश्चित नहीं रहता कि ऐसे वापसी करने वाले आतंकी कब पुन: आतंक की दुनिया मे लौट जाएंगे! राष्ट्रीय सहारा में छपे 27 मार्च 2013 के समाचार के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की विधान सभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि ''जम्मू-कश्मीर में सन् 1...
“गुटखा-खैनी के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय मिशन जरूरी”

“गुटखा-खैनी के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय मिशन जरूरी”

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गुटखा और खैनी जैसे तम्बाकू उत्पादों का सेवन करने वाले दुनिया के 65 प्रतिशत लोग भारत में हैं और यहां मुंह के कैंसर के 90 प्रतिशत मामले इन उत्पादों के उपयोग की वजह से ही होते हैं। इसीलिए तंबाकू उपयोग के नियंत्रण के लिए एक समग्र नीति की जरूरत है। एक ताजा अध्ययन में ये बातें उभरकर आई हैं। सिर्फ छह देश ऐसे तंबाकू उत्पादों की जांच और विनियमन करते हैं और केवल 41 देश इन उत्पादों पर सचित्र स्वास्थ्य चेतावनी देते हैं। धूम्रपान के मुकाबले धुआं रहित तम्बाकू से जुड़े नुकसान के बारे में जागरूकता भी कम हैं। सिर्फ 16 देशों ने धुआं रहित तंबाकू के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजकों पर व्यापक रूप से प्रतिबंध लगाया है। शोध पत्रिका द लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में 181 देशों में तंबाकू नियंत्रण उपायों से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशा निर्देशों के कार्यान्वयन की स्थिति को रेखां...
BSNL under heavy losses not paying salaries now planning VRS: Why not wind up BSNL

BSNL under heavy losses not paying salaries now planning VRS: Why not wind up BSNL

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It is a matter of concern that public-sector BSNL is running under heavy losses now planning for VSNL of its employees after public-sector company failed to pay regular salaries to its staff. It is surprising that while private players like JIO are earning profits even after offering economical tariffs, BSNL is not able to retain or increase its client-base thus turning BSNL as a loss-generating company for public-exchequer. BSNL should be better wound up like some very popular public-sector companies of earlier times HMT and IDPL. Central government should also study how public-sector companies run at heavy losses to the tune of their winding-up while shares of private companies in the same field witness regular jumps indicating heavy profits. Rather public-sector companies with all go...
Ten-fold jump of stop-filers of Income Tax returns in year of demonetisation

Ten-fold jump of stop-filers of Income Tax returns in year of demonetisation

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Media-reports about number of stop-filers of Income-Tax returns jumping 10-fold to 88.04 lakhs in the fiscal-year 2016-17 of demonetisation as compared to 8.56 lakhs in the previous year 2015-16 highest in last tow decades is just contrast to success-claim for  of demonetisation citing addition of 1.06 crores new tax-payers in the year 2016-17 which was 25-percent higher as compared to the previous year 2015-16. It is also noteworthy that target of direct-tax collection for recently closed fiscal-year 2018-19 could not be collected despite best of last-days efforts of Central Board of Direct Taxes CBDT. It creates doubts about downfall in trade-activities and fall in number of jobs which is certainly a cause of worry for fiscal-system. Another notable feature is 19.14 percent rise in cu...