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ऑपरेशन सिंदूर: आतंकवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक कार्रवाई

ऑपरेशन सिंदूर: आतंकवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक कार्रवाई

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ऑपरेशन सिंदूर: आतंकवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक कार्रवाई - डॉ सत्यवान सौरभ भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकवादियों के 9 ठिकानों को नष्ट किया, जिसमें लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे प्रमुख आतंकवादी संगठनों के हेडक्वार्टर भी शामिल थे। भारतीय सेना ने 100 किलोमीटर तक पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकवादी अड्डों पर सटीक एयरस्ट्राइक की। साथ ही, भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तान के एफ-16 विमान को मार गिराया। इस ऑपरेशन ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। जय हिंद! भारत ने हाल ही में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकवादियों के खिलाफ एक ऐतिहासिक सैन्य ऑपरेशन "ऑपरेशन सिंदूर" को अंजाम दिया, जो केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारतीय सेना की ताकत, साहस और...
सेना के साथ खड़ा भारत, सत्ता के लिए लड़ता पाकिस्तान

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सेना के साथ खड़ा भारत, सत्ता के लिए लड़ता पाकिस्तान संजय सक्सेना,वरिष्ठ पत्रकार हाल के वर्षाे में भारतीय राजनीति में जिस तरह से सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच हर मुद्दे पर तलवारें खींची नजर आती थी,उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से दोनों धड़ों में एकजुटता देखने को मिल रही है,उससे देश की आम जनता काफी खुश है,वहीं पाकिस्तान में इसके उलट नजारा नजर आ रहा है। पड़ोसी मुल्क में विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को कोसने और उन्हें नाकाबिल नेता साबित करने में लगा है। मोदी और शरीफ की तुलना शेर और सियार के रूप में की जा रही है। बहरहाल,भारत के लिये यह सुखद है कि आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार के हर कदम पर विपक्ष बिना किसी शर्त के पूरी मजबूती से खड़ा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके जवाब में भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पूरे राजनीतिक परिदृश्य में ए...
युद्धविराम के पीछे का सच

युद्धविराम के पीछे का सच

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युद्धविराम के पीछे का सच-डॉ.सत्यवान सौरभ युद्धविराम पर चर्चा से पहले यह समझना जरूरी है कि किसी भी देश का प्रमुख उद्देश्य अपने नागरिकों की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा होता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता भी यही है – देश की अखंडता और जनता की सुरक्षा। लेकिन जब कोई युद्धविराम होता है, तो उसके पीछे केवल सैन्य कारण नहीं, बल्कि कई कूटनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय कारक भी काम कर रहे होते हैं। कुछ आलोचक पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री मोदी पर युद्धविराम के फैसले को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि लोग भावनात्मक रूप से आहत हों, खासकर जब हाल ही में पहलगाम में हुए हमले जैसे घटनाक्रम सामने आए हों। लेकिन क्या यह उचित है कि केवल आवेश में आकर किसी निर्णय की निंदा की जाए? आइए, इस पूरी स्थिति को थोड़े गहराई से समझते हैं। 1. परमाणु हमले का संभावित खतरा: पिछले कुछ दि...
अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस-12 मई, 2025

अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस-12 मई, 2025

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अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस-12 मई, 2025नर्सें रोगी के लिये करुणा एवं मुस्कान बांटती है  ललित गर्ग  दुुनिया में नर्सों की सेवा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, हर दिन, नर्सें शांत शक्ति, स्थिर हाथों और करुणा से भरे दिलों के साथ अस्पतालों, क्लीनिकों और विभिन्न सामुदायिक स्थानों पर कदम रखते हुए रोगियों के लिये देवदूत बनती हैं। नर्से भगवान का रूप होती है, वे ही इंसान के जन्म की पहली साक्षी बनती है और उनमें करुणा का बीज बोती है। एक रोगी को स्वस्थ करने में वे अपना सब कुछ दे देती हैं। रोगी की सेवा करते हुए वे अपना पारिवारिक सुख, करियर, जीवन और वर्तमान सबकुछ झांेक देती है। नोबल नर्सिंग सेवा की शुरुआत करने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्म दिवस पर हर साल दुनिया भर में 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस 1965 से इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेज द्वारा शुरु हुआ है, बहुत से ल...
शानदार जीत से भारत एशिया की एक बड़ी शक्ति बना

शानदार जीत से भारत एशिया की एक बड़ी शक्ति बना

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शानदार जीत से भारत एशिया की एक बड़ी शक्ति बना ललित गर्ग भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर जारी तनाव एवं युद्ध की स्थितियों के बीच भारत ने बड़ा ऐलान करते हुए सीज फायर लागू किया। चार दिन चले सैन्य संघर्ष में परिस्थितियां और भी ज्यादा नाजुक हो गई थीं एवं पाकिस्तान की भारी तबाही हुई। दोनों परमाणु सम्पन्न देशों के बीच के बढ़ते तनाव के बीच समझौते के बाद भले ही पाकिस्तान के विनाश का सिलसिला थम गया हो, लेकिन उसकी एक भूल भारी का सबब बन सकता है। क्योंकि भारत ने यह बड़ा फैसले लेते हुए कहा था कि भविष्य में उसकी जमीन पर किसी भी आतंकवादी हमले को भारत के खिलाफ युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा और उसकी गोली का जवाब गोले से दिया जाएगा। पाकिस्तान की फितरत को देखते हुए भारत सरकार एवं भारतीय सेना अधिक चौकस, सावधान एवं सतर्क रहते हुए संघर्ष-विराम के लिये यदि सहमत हुई है तो उसका स्वागत होना चाहिए। जब भारत ने पाकिस...
“सैनिकों का सम्मान: समर्पण और बलिदान की पहचान”

“सैनिकों का सम्मान: समर्पण और बलिदान की पहचान”

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"सैनिकों का सम्मान: समर्पण और बलिदान की पहचान" हमारे सैनिक, जो सीमाओं पर अपने प्राणों की बाजी लगाते हैं, हमारे असली नायक हैं। युद्ध की आशंका में लौटते सैनिकों को ट्रेन में सीट दें, सड़क पर मिलें तो अपने वाहन से आगे छोड़ें, और होटलों में निशुल्क ठहरने की सुविधा दें। उनका सम्मान हमारा कर्तव्य है, न कि महज़ औपचारिकता। जहाँ भी मिले, सलाम करें – देश में इनसे बढ़कर कुछ नहीं। देवताओं के लिए भंडारे लगाते हो तो इन सैनिकों को भी माँ जैसा सम्मान दो। कहना कि ये तो सरकारी तनख्वाह लेते हैं, एक अपराध है। तनख्वाह सभी कर्मचारी लेते हैं, लेकिन ये अपने जीवन की बाजी लगाते हैं, अपने घर-परिवार से दूर रहते हैं, और हमारी सुरक्षा के लिए हर कठिनाई सहते हैं। आइए, इस परंपरा को मजबूत करें और सैनिकों का मान बढ़ाएं। जय हिंद! हमारे देश के सैनिक, जो सीमाओं पर अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी रक्षा करते हैं, केव...
देश में ऑनलाइन लूडो के बढ़ते खतरे पर कैसे लगेगी लगाम

देश में ऑनलाइन लूडो के बढ़ते खतरे पर कैसे लगेगी लगाम

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देश में ऑनलाइन लूडो के बढ़ते खतरे पर कैसे लगेगी लगाम अजय कुमार,लखनऊ  रमेश, एक मध्यमवर्गीय परिवार का साधारण युवक था। शहर के एक निजी कंपनी में मामूली वेतन पर काम करता और अपने छोटे से परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिता रहा था। उसकी दिनचर्या काम से घर और कभी-कभार दोस्तों के साथ चाय पीने तक ही सीमित थी। लेकिन कुछ महीने पहले, उसके एक सहकर्मी ने उसे ऑनलाइन लूडो के एक ऐप के बारे में बताया। शुरुआत में रमेश ने इसे सिर्फ मनोरंजन का एक साधन समझा। काम से लौटने के बाद या खाली समय में वह दोस्तों या अनजान लोगों के साथ लूडो खेलता, और कभी-कभार छोटी-मोटी बाजी भी लगा लेता। शुरुआत में सब कुछ रोमांचक और मजेदार लग रहा था। जीत की खुशी और हार का मामूली गम, यह सब उसकी नीरस जिंदगी में एक नया रंग भर रहा था। धीरे-धीरे, रमेश इस खेल का आदी होता चला गया। अब वह काम के दौरान भी चोरी-छिपे लूडो खेलने लगा था, और घर...
अव्वल आने की होड़ में छात्रों की आत्महत्याएं चिन्ताजनक

अव्वल आने की होड़ में छात्रों की आत्महत्याएं चिन्ताजनक

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अव्वल आने की होड़ में छात्रों की आत्महत्याएं चिन्ताजनक- ललित गर्ग - टॉपर संस्कृति के दबाव एवं अव्वल आने की होड़ में छात्रों के द्वारा तनाव, अवसाद, कुंठा में आत्महत्या कर लेना एक गंभीर समस्या है। यह दुर्भाग्यपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण है कि हमारी छात्र प्रतिभाएं आसमानी उम्मीदों, टॉपर संस्कृति के दबाव व शिक्षा तंत्र की विसंगतियों के चलते आत्मघात की शिकार हो रही हैं। हाल ही में लगातार हो रही छात्रों की दुखद मौतें जहां शिक्षा प्रणाली अतिश्योक्तिपूर्ण प्रतिस्पर्धा पर प्रश्न खड़े करती है, वहीं विचलित भी करती हैं। इनमें राजस्थान स्थित कोटा के नीट के परीक्षार्थी और मोहाली स्थित निजी विश्वविद्यालय में फोरेंसिक साइंस का एक छात्र शामिल था। पश्चिम बंगाल के आई आई टी खड़गपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के तीसरे वर्ष के छात्र मोहम्मद आसिफ कमर का शव उनके हॉस्टल रूम में फंदे से लटका मिला। भुवनेश्वर के कीट म...
“प्रेस स्वतंत्रता दिवस: एक इतिहास, एक याद”

“प्रेस स्वतंत्रता दिवस: एक इतिहास, एक याद”

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"प्रेस स्वतंत्रता दिवस: एक इतिहास, एक याद" – प्रियंका सौरभ प्रेस की चुप्पी, रीलों का शोर: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ट्रेंडिंग टैग बन गया। प्रेस स्वतंत्रता दिवस अब औपचारिकता बनकर रह गया है। पत्रकारिता की जगह अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने ले ली है, जहां सच्चाई की जगह रीलें, और विश्लेषण की जगह व्यूज़ ने कब्जा कर लिया है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब ब्रांड डील्स और ट्रेंडिंग टैग्स में गुम हो गया है। सवाल पूछना अब खतरा है, और चुप रहना 'सेफ कंटेंट'। आने वाले समय में शायद हमें #ThrowbackToJournalism ट्रेंड करना पड़े। जब प्रेस बोलती थी, और सत्ता थर्राती थी। हर साल 3 मई को जब ‘प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ आता है, तो एक गहरी चुप्पी के साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या अब भी पत्रकारिता वाकई स्वतंत्र है? क्या यह दिन अब भी उस निडरता, जिम्मेदारी और सच्चाई का प्रतीक है, जिसे किसी ज़माने में पत्रकारि...
“मैनेजमेंट के मखमली पर्दे के पीछे दम तोड़ती पत्रकारिता”

“मैनेजमेंट के मखमली पर्दे के पीछे दम तोड़ती पत्रकारिता”

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"मैनेजमेंट के मखमली पर्दे के पीछे दम तोड़ती पत्रकारिता" डॉ सत्यवान सौरभ "PR मैनेजमेंट के चंगुल में फंसा आज का कलमकार, मैनेजर जी रहे लग्जरी लाइफ, पत्रकार टूटी बाइक पर" आज की पत्रकारिता एक गहरे संकट से गुजर रही है, जहाँ कलमकार हाशिए पर हैं और PR मैनेजमेंट का बोलबाला है। पत्रकार, जो कभी सच की आवाज थे, अब टूटी बाइक पर सवार होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि मैनेजरों की ज़िंदगी लग्जरी में डूबी है। मीडिया संस्थान अब व्यवसायिक लाभ के लिए सच्ची खबरों को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह लेख उसी विडंबना को उजागर करता है—जहाँ पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि एक स्क्रिप्टेड तमाशा बनती जा रही है। क्या सच की जगह अब सिर्फ छवि का मैनेजमेंट रह गया है? आजकल के मीडिया और पत्रकारिता के परिवेश में जिस तरह से व्यावसायिकता, ब्रांडेड कंटेंट और PR मैनेजमेंट की छाया बढ़ी है, वह पत्रक...