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हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने

हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने

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हर घर तिरंगा अभियान और देशभक्ति के मायने नागरिकों के सुरक्षित और समृद्धशाली जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है; उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धी का होना। इसलिए क्या आपको हर घर तिरंगा फहराने के साथ-साथ हर घर रोज़गार की आवश्यकता ज़्यादा नहीं लग रही है ? आज  आज़ादी के 75 साल बाद भी देश के नौजवान बेरोजागरी के चलते आत्महत्या करने को मजबूर है।  हम सभी देश वासी हर घर तिरंगा लहरायेंगे, लेकिन इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें लाल किले से ये आवाज़ भी तो सुनाई दे कि देश के हर नागरिक को समान शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, रोजगार गारंटी दी जाएगी। यही तो सच्चा राष्ट्रवाद है। -प्रियंका 'सौरभ' हर घर तिरंगा आज़ादी का अमृत महोत्सव के तहत एक अभियान है। यह अभियान लोगों को भारत की आजादी के 75वें वर्ष में तिरंगा घर लाने और इसे फहराने के लिए प्रोत्साहित करता है। नागरिकों और तिरंगे के बीच संबंध हमेशा से...
विचाराधीन कैदियों की न्याय तक पहुंच जल्द हो

विचाराधीन कैदियों की न्याय तक पहुंच जल्द हो

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विचाराधीन कैदियों की न्याय तक पहुंच जल्द हो -ः ललित गर्ग :-न्याय में देर करना अन्याय है। भारत की न्यायप्रणाली इस मायने में अन्यायपूर्ण कही जा सकती है, क्योंकि भारत की जेलों में 76 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं, जिनका अपराध अभी तय नहीं हुआ है और वे दो दशक से अधिक समय से जेलों में नारकीय जीवन जीते हुए न्याय होने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। इन्हें विचाराधीन कैदी कहा जाता है, नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर की जेलों में कुल 4,88,511 कैदी थे जिनमें से 76 फीसदी यानी 3,71,848 विचाराधीन कैदी थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे विचाराधीन कैदियों के मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए ईज ऑफ लिविंग यानी जीने की सहूलियत और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी व्यापार करने की सहूलियत की ही तरह ईज ऑफ जस्टिस की जरूरत बताते हुए कहा कि देश भर की जेलों में बंद लाखों विचाराधीन कैदियों की न्याय तक पहुंच ...
मृत्यु का कारण बनती नकली और घटिया क्वालिटी की दवाएं

मृत्यु का कारण बनती नकली और घटिया क्वालिटी की दवाएं

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मृत्यु का कारण बनती नकली और घटिया क्वालिटी की दवाएं सबसे अधिक मात्रा में दवाइयां बनाने में भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश है। देश में सबसे तेज गति से बढ़ रहे इस कारोबार के बढ़ने के साथ ही नकली और निम्न कोटि की दवाओं का अवैध कारोबार भी बढ़ रहा है और लोगों की जान पर खतरा बढ़ता जा रहा है। पिछले वर्ष एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में देश में बनने वाली कुल दवाओं का 25 प्रतिशत नकली और खराब गुणवत्ता वाली दवाएं बनने और बिकने का खुलासा किया था, जो विश्व की कुल नकली दवाओं का 35 प्रतिशत है। -सत्यवान 'सौरभ' डब्ल्यूएचओ के नए शोध के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अनुमानित 10 में से 1 चिकित्सा उत्पाद या तो घटिया है या गलत है। इसका मतलब है कि लोग ऐसी दवाएं ले रहे हैं जो बीमारी का इलाज या रोकथाम करने में विफल हैं। यह न केवल इन उत्पादों को खरीदने वाले व्यक्तियों और स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए ...
आजीविका मिशन से बढ़ा महिलाओं का स्वावलंबन

आजीविका मिशन से बढ़ा महिलाओं का स्वावलंबन

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आजीविका मिशन से बढ़ा महिलाओं का स्वावलंबन राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का काम किया है।  स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ न केवल अपने अधिकार के लिए जागरूक हो रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को उनका हक़ दिलाने और उनकी समस्याएँ सुलझाने के लिए भी प्रयास कर रहीं हैं। गाँवों में महिला सशक्तिकरण का यह अद्भुत उदाहरण है। हरियाणा के भिवानी जिले के सिवानी ब्लॉक के आजीविका मिशन प्रोग्राम मैनेजर जगबीर रमेश सिंहमार का कहना है कि गरीबों में गरीबी से बाहर आने की तीव्र इच्छा होती है, और उनमें जन्मजात क्षमताएं होती हैं इसलिए गरीबों की जन्मजात क्षमताओं को उजागर करने के लिए सामाजिक लामबंदी और गरीबों की मजबूत संस्थाओं का निर्माण महत्वपूर्ण है। सामाजिक लामबंदी, संस्था निर्माण और सशक्तिकरण प्रक्रिया को प्रेरित करने के लिए आजीविका मिशन समर्पित और संवेदनशील संरचना है। -प्रियंका 'सौरभ...
वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट

वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट

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वृद्ध वयस्कों के बीच सामाजिक डिस्कनेक्ट मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं। एक विकासवादी दृष्टिकोण से, हमारे प्रारंभिक अस्तित्व के लिए सामाजिक संबंध आवश्यक थे, और अभी भी बहुत कुछ हैं। वास्तव में, सामाजिक जुड़ाव मानव जीवन के सबसे बुनियादी पहलुओं में से एक है और हमारी भलाई के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरों के लिए डिस्कनेक्ट या अनदेखा महसूस करना न केवल दर्दनाक भावनात्मक अवस्थाओं को उजागर करेगा, बल्कि एक बुनियादी मानवीय आवश्यकता-संबंधितता की आवश्यकता को भी विफल कर देगा। हालाँकि, जिस तरह प्यास हमें पानी पीने के लिए एक संकेत के रूप में कार्य करती है, उसी तरह दर्दनाक भावनात्मक अवस्थाएँ हमें दूसरों के साथ अधिक संबंध बनाने के लिए एक संकेत के रूप में काम कर सकती हैं।मौजूदा साक्ष्य इंगित करते हैं कि सामाजिक जुड़ाव का स्वास्थ्य और दीर्घायु पर एक शक्तिशाली प्रभाव है। उदाहरण के लिए, जो लोग दूसरों से अधिक जुड़ाव ...
*कांवड़ यात्रा – श्रृद्धा को नमन*

*कांवड़ यात्रा – श्रृद्धा को नमन*

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*कांवड़ यात्रा - श्रृद्धा को नमन* कांवड़ यात्रा का चलन 1990 के दशक के उत्तरार्ध से प्रारम्भ होता है, जब 15-20 युवा, महादेव की भक्ति में लीन होकर हरिद्वार से नंगे पैर पैदल चलकर कांवड़ लेकर चले थे। उस समय उन सभी का एकमात्र उद्देश्य श्रवण कुमार की भांति अपने माता-पिता को पुण्य दिलाने का था। श्रवण कुमार अपने माता-पिता को एक कांवड़ में बिठाकर, मिट्टी के पात्र में गंगा जल भर कर अपने कंधे पर उठाकर तीर्थ यात्रा कराने के लिए निकले थे और मार्ग में जितने भी शिवालय पड़ते थे, वहाँ पर वो यदि उनके हाथ से सम्भव हुआ तो ठीक नहीं तो उनके निमित्त थोड़ा सा जल चढ़ाते हुए आगे बढ़ते थे। अर्थात् उनका कांवड़ यात्रा करने का उद्देश्य विशुद्ध रूप से माता-पिता का कल्याण एवं उनके स्वर्ग में स्थान प्राप्त करने का प्रयास था। समय के साथ-साथ कांवड यात्रा का स्वरूप भी शनै-शनै बदलता चला गया। जहाँ पूर्व में इस यात्रा में मात्र पुरु...
“या तो मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा, या फिर उसमें लिपटकर वापस आऊंगा”

“या तो मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा, या फिर उसमें लिपटकर वापस आऊंगा”

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“या तो मैं तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा, या फिर उसमें लिपटकर वापस आऊंगा" कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्रयासों और बलिदानों को याद करने के लिए हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन कारगिल युद्ध 1999 के शहीदों को समर्पित है। कारगिल विजय दिवस कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की जीत का प्रतीक है। हमने 527 साहसी आत्माओं को खो दिया, और युद्ध में 1363 सैनिक घायल हो गए। उन बहादुर बलिदानों की उपेक्षा कौन कर सकता है? आइए उनके धैर्य को याद करें और उनके आभारी रहें.-सत्यवान 'सौरभ' कारगिल युद्ध में सैनिकों द्वारा किए गए बलिदान को याद करने के लिए हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। भारतीय सेना के एक मिशन 'ऑपरेशन विजय' ने भारत के लिए अंतिम सफलता हासिल की। कारगिल विजय दिवस प्रत्येक भारतीय द्वारा हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन कारगिल युद्ध 1999 के शहीदों को सम...
बोथ पैरेंट्स वर्किंग सिन्ड्रोम (बी पी डब्ल्यू एस)

बोथ पैरेंट्स वर्किंग सिन्ड्रोम (बी पी डब्ल्यू एस)

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बोथ पैरेंट्स वर्किंग सिन्ड्रोम (बी पी डब्ल्यू एस) समाज में जब भी परिवर्त्तन की स्थिति बनती है तो उस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा वो प्रभावित होते हैं जो लोग अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए किसी और पर निर्भर होते हैं जैसे कि स्त्रियाँ, बच्चे और बुजुर्ग। घर, कार्य स्थल, समाज और देश में परिवार के इन तीन सदस्यों को अपनी सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकताओं के लिए किसी न किसी रूप में अनन्योश्रित होना पड़ता है। स्त्रियाँ घर में अपनी जगह तो कभी अपनी महत्ता बनाए रखने के लिए अपने पति, अपने सास-ससुर और कभी-कभी अपने बच्चों तक पर निर्भर रहती हैं। कार्य स्थल पर अपनी वाज़िब प्रोन्नति के लिए भी अपने बॉस तो कभी सहकर्मियों का सहारा लेती हुई देखी जा सकती हैं। समाज में अपनी हैसियत और पहचान के लिए समाज के धार्मिक और राजनीतिक ढाँचों में इन्हें अपनी "आइडेंटिटी" तलाश करनी पड़ती है। और अपने ही देश में अपने...
उत्तर प्रदेश को अशांत करने का षड्यंत्र?

उत्तर प्रदेश को अशांत करने का षड्यंत्र?

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उत्तर प्रदेश को अशांत करने का षड्यंत्र? मृत्युंजय दीक्षित सावन के पवित्र माह में लाखों की संख्या में शिवभक्त कांवड़िये भोलेनाथ की भक्ति में डूबकर पवित्र कांवड में जल लेकर भगवान शिव पर चढाने जा रहे हैं । सभी प्रसिद्ध व ऐतिहासिक शिव मंदिरों में इनकी भारी भीड़ पहुंच रही है। उत्तरांड के हरिद्वार में ही लाखों शिवभक्त कांवड़िये पहुंच रहे है जो एक अदभुत कीर्तिमान बन रहा है । उत्तर प्रदेश सरकार तथा उत्तराखंड की सरकारों की ओर से कांवड़ यात्रा को ध्यान में रखते हुए अति विशिष्ट प्रबंध किये गये हैं लेकिन यह भीड़ इतनी अधिक है कि यह भी कम लग रहे हैं। वर्ष 2017 से ही योगी अदियानाथ की सरकार कांवड़ यात्रियों की सुविधा का विशेष ध्यान रख रही है और उनकी सुविधा के लिए व्यस्थाएं करती है । उनके भक्ति भाव के सम्मान के लिए उन पर पुष्पवर्षा भी की जाती रही है जो इस बार उत्तराखंड में भी हो रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्...
महामहिम जी का हिन्दी में शपथ लेने का संदेश तो समझिए

महामहिम जी का हिन्दी में शपथ लेने का संदेश तो समझिए

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महामहिम जी का हिन्दी में शपथ लेने का संदेश तो समझिए  आर.के. सिन्हा भारत के 15 वें राष्ट्रपति पद की शपथ हिन्दी में लेकर श्रीमती द्रौपदी मूर्मू ने सारे देश को एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है। मूल रूप से उड़ीसा से संबंध रखने वाली श्रीमती द्रौपदी मूर्मू अगर उड़िया या किसी अन्य भाषा में भी शपथ लेती तो कोई अंतर नहीं पड़ता। देश को अपनी सभी भाषाओं और बोलियों पर गर्व है। पर, वह हिन्दी में शपथ लेकर तो अचानक से सारे देश में पहुंच गई। समूचे देश ने उन्हें हिंदी में शपथ लेते हुए देखा-सुना। बेशक, हिन्दी देश की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इस संबंध में कोई विवाद नहीं हो सकता। हिन्दी की सारे देश में स्वीकार्यता है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ भी रही है। अगर छुद्र राजनीति को छोड़ दिया जाए तो इसे सारे देश में बोला और समझा जा रहा है। कुछ समय पहले ही देश के आठ पूर्वोतर राज्यों के स्कूलों में दसवीं क...