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महंगा दूध : कारण का निवारण  नहीं

महंगा दूध : कारण का निवारण  नहीं

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 -राकेश  दुबे कितना अजीब है, जिस देश में वर्ष 1970 के दशक में हुई श्वेत क्रांति के बाद से ही देश में डेरी क्षेत्र में मजबूत और ऊंची वृद्धि देखने को मिलती रही है, अब दूध के भाव अंधाधुध तरीके से बढ़ रहे हैं | देश में दूध का उत्पादन अब मुश्किल दौर से गुजरता नजर आ रहा है। इस मुश्किल की  तह में पशु आहार तथा चारे की कम आपूर्ति एवं ऊंची लागत की वजह से पैदा हुई हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और प्रदेशों  में कई बड़ी दुग्ध सहकारी समितियों तथा निजी डेरी कंपनियों द्वारा इस वर्ष दूध की कीमतों में कई बार  की गई मूल्य वृद्धि इस संकटके और बढने  स्पष्ट संकेत दे रहा  है। इससे बड़ी और बुरी बात यह है कि यह बढ़ोतरी मॉनसून सीजन के बाद हो रही है जब दूध की आपूर्ति बहुत अधिक होती है और डेरी कंपनियां दूध पाउडर, मक्खन तथा अन्य दुग्ध उत्पादों का भंडार तैयार करती ह...
29 दिसम्बर 1666 : गुरु गोविन्द सिंह का जन्म 

29 दिसम्बर 1666 : गुरु गोविन्द सिंह का जन्म 

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राष्ट्र और संस्कृति के रक्षा के लिये   समर्पित जीवन और बलिदान  -- रमेश शर्मा  दसवें सिख गुरु गोविन्द सिंह जी की गणना यदि हम अवतार की श्रेणी में करें तो अनुचित न होगा।  उनका पूरा जीवन भारत राष्ट्र, सत्य, धर्म और संस्कृति की रक्षा केलिये समर्पित रहा । मानों वे इस राष्ट्र के लिये ही संसार में आये थे । उन्होंने मुगल सल्तनत द्वारा भारत के इस्लामिक रूपान्तरण अभियान रोकने में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही।  गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पौष शुक्ल पक्ष सप्तमी को बिहार के पटना नगर में हुआ था । यह 1666 ईस्वी का वर्ष था । इस वर्ष यह तिथि 29 दिसम्बर को पड़ रही है । पर उस वर्ष यह पौष शुक्ल पक्ष की सप्तमी 22 दिसम्बर को थी । उनके पिता गुरू तेग बहादुर नौंवे सिख गुरु थे । उन्होने भी धर्म रक्षा केलिये बलिदान दिया था । उनकी माता का नाम गुजरी देवी थी। जिनका भी क्रूर यातनाओं के ...
लोकतांत्रिक अधिकार है गरीबों को मुफ्त अनाज

लोकतांत्रिक अधिकार है गरीबों को मुफ्त अनाज

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 -ललित गर्ग- आजादी के अमृत महोत्सव मना चुके मुल्क में, एक शोषणविहीन समाज में, एक समतावादी दृष्टिकोण में और एक कल्याणकारी समाजवादी व्यवस्था में आबादी के एक बड़े हिस्से का भूखे रहना या भूखें ही सो जाना शर्म का विषय होना चाहिए।  इस तरह की स्थितियों का होना राष्ट्र के कर्णधारों के लिये शर्म का विषय होना चाहिए। जो रोटी नहीं दे सके वह सरकार कैसी? जो गरीबी पर वोट की राजनीति करें, वह शासन-व्यवस्था कैसी? शर्म का विषय तो बेरोजगार को रोजगार न देना भी होना चाहिए। लेकिन हमारी पूर्व सरकारों ने गरीबी, भूख एवं बेरोजगारी को केवल सत्ता हासिल करने का हथियार बना रखा था। दुनिया की तमाम शासन व्यवस्थाएं हर नागरिक को कोई न कोई ऐसा काम देने, जिससे वह खुद अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके, नाकाम रही है। सबको रोटी एवं रोजगार देने की आदर्श स्थिति शायद किसी भी देश में नहीं है। इसलिए जो लोग खुद अपने ...
नये वर्ष में संकल्प के पौधे उगाएं

नये वर्ष में संकल्प के पौधे उगाएं

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 -ललित गर्ग- नया भारत एवं सशक्त भारत को निर्मित करने के संकल्प के साथ नए वर्ष का स्वागत करें। हम इस सोच और संकल्प के साथ नये वर्ष में प्रवेश करें कि हमें कुछ नया करना है, नया बनना है, नये पदचिह्न स्थापित करने हैं। बीते वर्ष की कमियों पर नजर रखते हुए उन्हें दोहराने की भूल न करने का संकल्प लेना है। दूसरे के अस्तित्त्व को स्वीकारना, सबके साथ रहने की योग्यता एवं दूसरे के विचार सुनना- यही शांतिप्रिय एवं सभ्य समाज रचना का आधारसूत्र है और इसी आधारसूत्र को नयेवर्ष का संकल्पसूत्र बनाना होगा। आज सब अपनी समझ को अंतिम सत्य मानते हैं। और बस यहीं से मान्यताओं की लड़ाई शुरू हो जाती है। कोई वेद, बाईबल, कुरान, ग्रंथ या सूत्र ये पाठ नहीं पढ़ाते। तीन हजार वर्षों में पांच हजार लड़ाइयां लड़ी जा चुकी हैं। एकसूत्र वाक्य है कि ”मैदान से ज्यादा युद्ध तो दिमागों से लड़े जाते हैं।“नया वर्ष नया संदेश, नया संबोध, ...
आइये नव वर्ष में अपनी पसंद को क्षमताओं में बदले।

आइये नव वर्ष में अपनी पसंद को क्षमताओं में बदले।

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एक बार चुनाव किसी के दिमाग और दिल से उत्पन्न होता है और अंततः उसकी क्षमताओं में और  उसके निर्णय लेने में परिलक्षित होता है। किसी भी स्थिति के लिए प्रतिक्रिया एक विकल्प और उसके परिणाम के लिए एक आदर्श उदाहरण है। कोई भी इस दुनिया में अनुकरणीय क्षमताओं के साथ पैदा नहीं हुआ है। लेकिन किसी विशेष विषय को चुनना, पसंद से उस पर कड़ी मेहनत करना, इस विषय में दूसरों को टक्कर देना और हराना है और इसलिए यह सब उस एक सामान्य विषय या तत्व को चुनने और उसे अपनी क्षमता में स्थानांतरित करने की पसंद के बारे में है। क्षमता खुली है, अक्सर किसी कार्य को करने या पूरा करने के लिए सटीकता की गति और विधि के रूप में वर्णित किया जाता है जो अन्य की तुलना में बेहतर और तेज और अधिक सटीक होता है। एक व्यक्ति किसी भी क्षमता के साथ पैदा हो सकता है या नहीं लेकिन धीरे-धीरे किसी भी क्षमता को प्राप्त कर सकता है यदि वह उस क्ष...
वर्षांत समीक्षा -2022: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

वर्षांत समीक्षा -2022: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

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बजट आवंटन में अभूतपूर्व वृद्धि कृषि और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए 2022-23 में बजट आवंटन बढ़ाकर 1,24,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। रिकॉर्ड खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन खाद्यान्न उत्पादन जनवरी 2022 के 308.65 मिलियन टन से बढ़कर दिसम्‍बर 2022 में 315.72 मिलियन टन (चौथे अग्रिम अनुमानों के अनुसार) हो गया है जो अब तक का सर्वाधिक खाद्यान्न उत्पादन है। तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार, बागवानी उत्पादन 2020-21 के दौरान 331.05 मिलियन एमटी था जिसे 2021-22 के दौरान बढ़ाकर 342.33 मिलियन एमटी तक पहुंचा दिया गया। यह भारतीय बागवानी के लिए अब तक का सर्वाधिक उत्पादन है। उत्पादन लागत का डेढ़ गुना एमएसपी तय करना सरकार ने 2018-19 से अखिल भारतीय भारतीय औसत उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत लाभ के साथ सभी अनिवार्य खरीफ, रबी और अन्य वाणिज्यिक फसलों के लिए न्‍यूनतम समर्थन ...
संसद के शीतकालीन अधिवेशन में तीन आवश्यक संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश संशोधन विधेयक पारित

संसद के शीतकालीन अधिवेशन में तीन आवश्यक संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश संशोधन विधेयक पारित

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महत्‍वपूर्ण बिंदु : संसद द्वारा पारित किए गए  : उत्तर प्रदेश के संबंध में, संविधान (अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां) आदेश (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2022 तमिलनाडु के संबंध में, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश (दूसरा संशोधन) बिल, 2022 कर्नाटक के संबंध में, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश (चौथा संशोधन) बिल, 2022 संसद के शीतकालीन अधिवेशन में तीन आवश्यक संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश संशोधन विधेयक पारित किए गए। तमिलनाडु राज्य के संबंध में, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2022, राज्यसभा में 22.12.2022 को सर्वसम्मति से पारित किया गया। संसद में पारित होने के बाद यह विधेयक तमिलनाडु में अनुसूचित जनजातियों की सूची में नारिकोरवन और कुरीविकरण समुदायों को शामिल करेगा। यह विधेयक पहले 15.12.2022 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया था। ...
गर्भस्थ शिशु और माता की चिकित्सीय देखभाल के लिए नया ऐप

गर्भस्थ शिशु और माता की चिकित्सीय देखभाल के लिए नया ऐप

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भारतीय शोधकर्ताओं ने गर्भस्थ शिशु और गर्भवती महिलाओं की चिकित्सीय देखभाल के लिए ‘स्वस्थगर्भ’ नामक नया मोबाइल ऐप विकसित किया है। यह ऐप दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जिनके लिए डॉक्टर तक पहुँचना कठिन होता है। यह गर्भावस्था के लिए विशेष रूप से विकसित किया गया ऐप है, जो चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित होने के साथ-साथ विश्वसनीय भी है। इसकी मदद से डॉक्टरों तक तुरंत ऑनलाइन पहुँचा जा सकता है, और चिकित्सीय सलाह प्राप्त की जा सकती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के शोधकर्ताओं ने मिलकर यह मोबाइल ऐप विकसित किया है। मरीज और डॉक्टर दोनों ‘स्वस्थगर्भ’ मोबाइल ऐप का निशुल्क लाभ उठा सकते हैं। यह ऐप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। ‘स्वस्थगर्भ’ चिकित्सीय जटिलताओं को कम करने और गर्भावस्था के दौरान के त...
नेपालः कुर्सी ही ब्रह्म है

नेपालः कुर्सी ही ब्रह्म है

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*डॉ. वेदप्रताप वैदिक* लगभग हजार साल पहले राजा भर्तृहरि ने राजनीति के बारे में जो श्लोक लिखा था, नेपाल की राजनीति ने उसकी सच्चाई उजागर कर दी है। उस श्लोक में कहा गया था- ‘वारांगनेव नृपनीति्रनेकरूपा:’ अर्थात राजनीति वेश्याओं की तरह अनेकरूपा होती है याने वह मौके-मौके पर अपना रूप बदल लेती है। नेपाल में कल तक पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ और शेरबहादुर देउबा मिलकर सरकार बना रहे थे लेकिन अब प्रचंड और के.पी.ओली आपस में अचानक मिल गए हैं और वे अब अपनी सरकार बना रहे हैं। ये तीनों बड़े नेता तीन पार्टियों के संचालक हैं। पहली नेपाली कांग्रेस है और शेष दो कम्युनिस्ट पार्टियाॅं हैं। ये तीन पार्टियाँ एक-दूसरे की भयंकर विरोधी रही हैं। इनके कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे की हत्याएं भी की हैं और इन्होंने एक-दूसरे से मिलकर सरकारें भी बनाई हैं और अनबन होने पर बीच में ही वे सरकारें गिरती भी रही हैं। याने कुर्सी ही...
भारतभूमि

भारतभूमि

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दिल्ली में रहते हुए और लगभग तीन दशकों तक कभी कभार ही इधर उधर की यात्रा करते हुए मैं‌ इस भूमि से लगभग कटा रहा। किन्तु भारत के बड़े शहर इस भूमि को समझने का माध्यम-स्थल हो सकते हैं। दृष्टि होनी चाहिए। यहां के महानगर न्यूयॉर्क जैसे महानगर नहीं हैं। न्यूयॉर्क में अमीरी गरीबी की खाई है किन्तु सांस्कृतिक फांक नहीं है। यहां एक बड़ी सांस्कृतिक फांक है। सहजता से दृश्य भी। यहां सभ्यता और संस्कृति ग्राम्य जीवन के साथ प्रवहमान है। वह बड़े महानगरों में भी ग्राम्य चरित्र के साथ भासित होती है। मैंने इस महानगर में अतिसाधारण मनुष्यों के बीच होते हुए यह अनुभव किया है कि आधुनिकता ने हमें लीला नहीं है।‌ बल्कि भारतीयता यहां भाषा में अनुस्वार और अन्य वर्णों की तरह अनिवार्यत: उपस्थित है। किसी बुझते हुए घूरे को देखकर हम मान लेते हैं कि यह ठंडा पड़ चुका है।‌किन्तु जरा सा कुरेदने पर राख के नीचे से लहकती काष्...