सामान्य जीवन का अंतिम दशक -अनुज अग्रवाल
बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि अपना काम करके जा चुकी है और किसान व फल- सब्ज़ी उत्पादक बस चुपचाप बर्बादी की दास्ताँ देख रहा है। हर तीन महीने में बदलने वाले मौसम ने पिछले तीन वर्षों में इतनी करवटे ली हैं जिसका कोई पैटर्न ही नहीं नज़र आ रहा। मौसम के बदलाव अब हर सप्ताह हो जाते हैं। लोग जाड़ा, गर्मी और बरसात सब एक साथ झेल रहे हैं। जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते अतिशय प्रयोग व पेट्रोलियम व रासायनिक पदार्थों से बने उत्पाद (प्लास्टिक, कपड़े, रासायनिक खाद, कीटनाशक आदि) से निकली मीथेन व कार्बन डाईऑक्साइड आदि गैसों ने धरती के हजारो साल से बने बनाए संतुलन को बिगड़ दिया है और पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ने के क़रीब है। तीस हज़ार बर्षों से मानव एक स्थिर वायुमंडल में जी रहा था जिसको पिछले तीन दशकों के विकास ने पूरी तरह बिखेर दिया है। शायद यह आख़िरी दशक हो जिसको हम जैसे तैसे ठीक से जी भी पाएँ। हालाँकि इसक...









