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Author: Dialogue India

क्या संविधान ‘प्रस्तावना’ की विकृति सुधरेगी?

क्या संविधान ‘प्रस्तावना’ की विकृति सुधरेगी?

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क्या संविधान ‘प्रस्तावना’ की विकृति सुधरेगी?------------------------------------------------1950 ई. में बने भारतीय संविधान की “प्रस्तावना” ने भारत को ‘लोकतांत्रिक गणराज्य’ कहा था। उस में छब्बीस वर्ष बाद दो भारी राजनीतिक शब्द जोड़ दिये गये – ‘सेक्यूलर’ और ‘सोशलिस्ट’ । तब से भारत को ‘लोकतांत्रिक समाजवादी सेक्यूलर गणराज्य’ कर डाला गया। अब सुप्रीम कोर्ट डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई करने वाली है, कि इसे पूर्ववत् किया जाए क्योंकि इस ने पूरे संविधान को ही बिगाड़ा है। स्मरणीय है कि यह परिवर्तन 1975-76 ई. की कुख्यात ‘इमरजेंसी’ के दौरान किया गया था, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय केंद्रीय मंत्रियों को भी रेडियो से मालूम होते थे! जब विपक्ष जेल-बंद था, और प्रेस पर सेंसरशिप थी। अर्थात वह संशोधन बिना विचार-विमर्श, जबरन हुआ था। वह संविधान की आमूल विकृति थी। यहाँ चार तथ्यों पर विचार क...
ईसाई मिशन्स और भारत

ईसाई मिशन्स और भारत

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ईसाई मिशन्स और भारत-प्रस्तुतकर्ता- राजेश गंभावाईसाई धर्मवेत्ताओं, विद्वानों, मिशनरीयों और लेखकों के यीशु ख्रिस्त (Jesus Christ) विषयक सदीयों से बडे-बडे दावों के बावजूद, योरोप और अमरिका के बुद्धिजीवी वर्ग ने ईसाई विश्वास के यीशु ख्रिस्त का स्वीकार करने से मना कर दिया है। आज-कल वहाँ उपन्यासों के कल्पित यीशु (Jesus of Fiction) का ही बोल-बाला है। भारतविद्याविद् डॉ. कोनराड एल्स्ट का कहना है कि पश्चिम में, विशेषकर योरोप में, ईसाईयत की लोकप्रियता और वहाँ के चर्चों में ईसाई विश्वासीयों की उपस्थिति निरन्तर कम होती जा रही है। वहाँ के समाज में पादरी के व्यवसाय के प्रति दिलचस्पी का अभाव भी चिंता का विषय बन गया है। योरोप में केथोलिक पादरीयों की एवरेज वय 55 साल है; नेदरलैंड में यह 62 है, और बढती ही जा रही है। वास्तविकता यह है कि योरोप और अमरिका के आधुनिक लोगों की ईसाईयत में अब कोई रूचि नहीं रही है।आर्थ...
जीसस के समय में रोमन धर्म

जीसस के समय में रोमन धर्म

धर्म, विश्लेषण
---------------------------------------------------लेखक : राजेश आर्य, गुजरात रोमन धर्म - एक रूपरेखा : पढनें में यह थोडा विचित्र लगेगा, पर हम हमारे धर्म विषयक वर्तमान सभी विचारों को एक तरफ रख कर ही रोमन संसार में धर्म का स्वरूप और कार्य ठीक तरह से समझ सकते है। आज हमारी धर्म (मजहब या रिलीजन) की क्या अवधारणा है? प्रायः हम हमारे धर्म को पवित्र शास्त्र (वेद, बाईबल, कुरआन, आदि), संगठन या पदानुक्रम (जैसे कि विभिन्न ईसाई सम्प्रदाय, पोप, बिशप, पादरी, आदि), कर्म और उनके फल, परलोक में विश्वास, विभिन्न पूजा या उपासना पद्धति, नैतिक प्रतिबद्धता, मजहबी मान्यता (जैसे कि जीसस परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है, जीसस ने हमारे पापों के लिए स्वयं का बलीदान दिया, आदि), धर्म और राज्य का अलगाव, आदि के संदर्भ में समझते है, पर एकमात्र यहूदी मत के अपवाद को छोड़कर, रोमन संसार के किसी भी धर्म पर इनमें से एक भी बिंदु...
बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिशनरियां

बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिशनरियां

धर्म, सामाजिक
बाबा माधवदास की वेदना और ईसाई मिशनरियां...----------------------------------------------कई वर्ष पहले दूर दक्षिण भारत से बाबा माधवदास नामक एक संन्यासी दिल्ली में ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ प्रकाशन के कार्यालय पहुँचे। उन्होंने सीताराम गोयल की कोई पुस्तक पढ़ी थी, जिसके बाद उन्हें खोजते-खोजते वह आए थे। मिलते ही उन्होंने सीताराम जी के सामने एक छोटी सी पुस्तिका रख दी। यह सरकार द्वारा 1956 में बनी सात सदस्यीय जस्टिस नियोगी समिति की रिपोर्ट का एक सार-संक्षेप था। यह संक्षेप माधवदास ने स्वयं तैयार किया, किसी तरह माँग-मूँग कर उसे छपाया और तब से देश भर में विभिन्न महत्वपूर्ण, निर्णयकर्ता लोगों तक उसे पहुँचाने, और उन्हें जगाने का अथक प्रयास कर रहे थे। किंतु अब वह मानो हार चुके थे और सीताराम जी तक इस आस में पहुँचे थे कि वह इस कार्य को बढ़ाने का कोई उपाय करेंगे।माधवदास ने देश के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर ईसाई ...
इतिहास के पन्नों से- भोर में अल्लाह-हू-अकबर की अज़ान और इस्लाम का हुआ कश्मीर!

इतिहास के पन्नों से- भोर में अल्लाह-हू-अकबर की अज़ान और इस्लाम का हुआ कश्मीर!

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इतिहास के पन्नों से- भोर में अल्लाह-हू-अकबर की अज़ान और इस्लाम का हुआ कश्मीर!अमितनीलमत पुराण में कश्मीर का परिचय कुछ ऐसा है- “कश्मीर पार्वती है, इसका शासक भगवान शिव का ही भाग है।” उस अनंत काल से लेकर महाभारत कालीन अर्जुन के प्रपौत्र (पड़पोते) हर्षदेव ने यहाँ रियासत की (व्यवस्थित शासन) नींव डाली। तब से लेकर 13वीं सदी तक कश्मीर में सनातन धर्मी (जिन्हें हम भाषाई सुविधा के लिए हिंदू कहेंगे) शासकों का शासन रहा।इस काल में महान सम्राट अशोक ने कश्मीर को सीधे अपने नियंत्रण में लिया और तमाम ऐसे उल्लेखनीय कार्य किए जो आज भी घाटी की ठंडी शिलाओं पर दर्ज हैं। हालाँकि इसी समय कश्मीर बौद्ध धर्म प्रसार का एक प्रमुख केंद्र बनकर भी उभरा लेकिन धर्मों को राजनीतिक रूप से प्रतिस्थापित करने की होड़ नहीं थी।हिंदू शासकों की कड़ी को तोड़ने का पहला पहला प्रयास इस्लाम द्वारा अपने जन्म के लगभग 300 वर्षों बाद किया गया।...
नवबौद्ध बनना: नौटंकी या फैशन

नवबौद्ध बनना: नौटंकी या फैशन

धर्म
नवबौद्ध बनना: नौटंकी या फैशन #डॉ_विवेक_आर्य दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम का नाम चर्चा में है। इनकी सभा का कुछ लोगों को नवबौद्ध बनाते हुए वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें हिन्दू बहिष्कार की प्रतिज्ञा लेते कुछ लोग दिख रहे है। बुद्ध मत स्वीकार करने वाला 99.9 %दलित वर्ग बुद्ध मत को एक फैशन के रूप में स्वीकार करता हैं। उसे महात्मा बुद्ध कि शिक्षाओं और मान्यताओं से कुछ भी लेना देना नहीं होता। उलटे उसका आचरण उससे विपरीत ही रहता हैं। उदाहरण के लिए-1. मान्यता- महात्मा बुद्ध प्राणी हिंसा के विरुद्ध थे एवं मांसाहार को वर्जित मानते थे।समीक्षा- नवबौद्ध जाधवपुर, हैदराबाद यूनिवर्सिटी आदि में बीफ फेस्टिवल बनाने है। 99.9% नवबौद्ध मांसाहारी है। बुद्ध मत के देश दुनिया के सबसे बड़े मांसाहारी हैं। इसे कहते है "नाम बड़े दर्शन छोटे" 2. मान्यता- महात्मा बुद्ध अहिंसा के पुजारी थे। वो क...
*दलितों का आरक्षण क्यों लूटना चाहते हैं मुस्लिम और ईसाई ?*

*दलितों का आरक्षण क्यों लूटना चाहते हैं मुस्लिम और ईसाई ?*

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*राष्ट्र-चिंतन* *सर्विस और लैंड जिहाद का शिकार भी दलित और आदिवासियों को बना रहे हैं मुसलमान* *दलितों का आरक्षण क्यों लूटना चाहते हैं मुस्लिम और ईसाई ?* *आचार्य श्री विष्णुगुप्त*=================== दलितों का आरक्षण लूटना क्यों चाहते हैं मुस्लिम और ईसाई? इस प्रश्न पर अब दलित राजनीति धीरे-धीरे गर्म हो रही है। दलित संगठनों में इसको लेकर न केवल चिंता है बल्कि आक्रोश भी कम नहीं है। अब छोटे-छोटे विचार संगोष्ठियों में दलितों के आरक्षण पर डाका डालने को लेकर विचार-विमर्श शुरू भी हो चुका है। अगर इस पर आधारित विचार-विमर्श आगे बढ़ता है तो फिर यह प्रसंग विस्फोटक हो सकता है। यह प्रसंग विस्फोटक होगा तो फिर इसके चपेट में मुस्लिम-ईसाई की मजहबी राजनीति के साथ ही साथ उनकी कथित मित्रता भी आयेगी, इसके अलावा दलितों के कंधे पर रखकर बन्दूक चलाने वाले वामपंथियों, एनजीओ छाप के लोग भी आयेंगे। दलितों के न...
भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत

भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत

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संगीत, नृत्य और नाटक की भारतीय परंपरा हमारी सभ्यता के मूल में है। किसी भी सभ्यता का सार और गुणवत्ता उसके लोगों के सांस्कृतिक और कलात्मक हितों से आंकी जाती है। भारतीय सभ्यता अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और ललित कलाओं में समृद्ध परंपरा के साथ सार्वभौमिक रूप से मान्यता प्राप्त है। हमें, इस परंपरा के उत्तराधिकारी के रूप में, न केवल इस पर गर्व करना चाहिए, बल्कि इसे संरक्षित करने और इसे युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। हमारे देश में एक समृद्ध और विविध सांस्कृतिक विरासत है, जो हमारी सभ्यता की आंतरिक शक्ति और लचीलापन का संकेत है। भारत में शायद ही कोई क्षेत्र या घाटी या पहाड़ या समुद्र-तट या मैदान हो जो हमारे विशिष्ट लोक नृत्यों और संगीत की ध्वनि से नहीं सन्निहित हो। इन नृत्यों के विषय सरल हैं और हमारे आम लोगों के जीवन में निहित हैं। दूसरी ओर, हमारे शास्त्रीय नृत्य...
क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं?

क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं?

राज्य, विश्लेषण, सामाजिक
क्यों पत्थर होती जा रही हैं हमारी करूणा एवं संवेदनाएं? ललित गर्ग  केरल के पथानामथिट्टा में अमीर बनने की चाहत में तांत्रिक के कहने पर दो महिलाओं की बलि देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। मामले में नरभक्षण का भी संदेह जताया जा रहा है। संदेह है कि आरोपियों ने महिलाओं के लाश के टुकड़े पकाकर खाए। यह खौफनाक एवं डरावना घटनाक्रम एक शत प्रतिशत शिक्षित प्रांत के लिये लज्जाजनक होने के साथ-साथ नये भारत, सशक्त भारत पर नये सिरे से चिन्तन करने की जरूरत को व्यक्त करते हुए अनेक ज्वलंत प्रश्न खड़े करता है। निश्चित ही इस क्रूर घटनाक्रम से देश कांप उठा है। देश में धर्म के नाम पर बिखरी विसंगतियों एवं असुविधाजनक स्थितियों पर नियंत्रित करने की जरूरत है। ऐसे अनेक तांत्रिक एवं धर्म के ठेकेदार समृद्धि, सत्ता एवं सुख देने के नाम पर भोले-भाले लोगों को न केवल ठगते हैं, बल्कि उनसे आपराधिक कृत्य भी करवाते हैं। इ...
14 अक्टूबर 1999 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी दुर्गा भाभी का गुमनामी में निधन

14 अक्टूबर 1999 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी दुर्गा भाभी का गुमनामी में निधन

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14 अक्टूबर 1999 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी दुर्गा भाभी का गुमनामी में निधन अंग्रेजो की आँखों के सामने से भगतसिंह और राजगुरू को निकाला, गवर्नर हैली को गोली मारी थी --रमेश शर्मा सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी दुर्गा भाभी का नाम भारत में सबकी जुबान पर होगा पर उनका नाम इतिहास की पुस्तकों में शून्य के आसपास। वे स्वतंत्रता के बाद लगभग भी आधी शताब्दी जीवन जिया पर गुमनामी के अंधकार में।यह वही दुर्गा भाभी हैं, जो साण्डर्स वध के बाद सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी भगतसिंह और राजगुरू को अंग्रेजो की आँखों के सामने से कोलकत्ता ले गयी थीं । वे सभी क्रांतिकारियों का मानों एक संपर्क सूत्र थीं। क्राँतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जिस माउजर पिस्तौल से अंग्रेजों से मुकाबला किया था, वह माउजर दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था.दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को कौशांबी जिले के ग्राम शहजादपुर में हु...