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Author: Dialogue India

तेलंगाना : प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?

तेलंगाना : प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?

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तेलंगाना : प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? विनीत नारायण कहावत है कि क्रिकेट और राजनीति अनिश्चिताओं का खेल होते है। क्रिकेट में पारी की आख़री बॉल टीम को जीता भी सकती है और हरा भी सकती है। क्या किसी ने कभी सोचा था कि चरण सिंह, वी पी सिंह, चंद्रशेखर, आई के गुजराल और एच डी देवेगोड़ा भारत के प्रधान मंत्री बनेंगे। जबकि किसी के पास प्रधान मंत्री बनने लायक सांसद तो क्या उसका पाँचवाँ हिस्सा भी सांसद नहीं थे। आई के गुजराल तो ऐसे प्रधान मंत्री थे जो अपने बूते एक लोक सभा की सीट भी नहीं जीत सकते थे। फिर भी ये सब प्रधान मंत्री बने। वो अलग बात है कि इनका प्रधान मंत्री बनना किसी अखिल भारतीय आंदोलन की परिणिति नहीं था बल्कि उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों ने इन्हें ये मौक़ा दिया। एक बार फिर देश के हालत ऐसे हो रहे हैं कि देश की बहुसंख्यक आबादी शायद सत्ता परिवर्तन देखना चाहती है। एक तरफ़ वो लोग हैं जो मान...
भारतीय दर्शन की आज पूरे विश्व को आवश्यकता है

भारतीय दर्शन की आज पूरे विश्व को आवश्यकता है

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भारतीय दर्शन की आज पूरे विश्व को आवश्यकता है भारत वर्ष 2047 में, लगभग 1000 वर्ष के लम्बे संघर्ष में बाद, परतंत्रता की बेढ़ियां काटने में सफल हुआ है। इस बीच भारत के सनातन हिंदू संस्कृति पर बहुत आघात किए गए और अरब आक्रांताओं एवं अंग्रेजों द्वारा इसे समाप्त करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी। परंतु, भारतीय जनमानस की हिंदू धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा एवं महान भारतीय संस्कृति के संस्कारों ने मिलकर ऐसा कुछ होने नहीं दिया। भारत में अनेक राज्य थे एवं अनेक राजा थे परंतु राष्ट्र फिर भी एक था। भारतीयों का एकात्मता में विश्वास ही इनकी विशेषता है। आध्यात्म ने हर भारतीय को एक किया हुआ है चाहे वह देश के किसी भी कोने में निवास करता हो और किसी भी राज्य में रहता हो। आध्यात्म आधारित दृष्टिकोण है इसलिए हम सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आध्यात्मवाद ने ही भारत के नागरिकों की रचना की है और आपस में जो...
भविष्य की नई कल्पना का स्रोत है शिक्षक

भविष्य की नई कल्पना का स्रोत है शिक्षक

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भविष्य की नई कल्पना का स्रोत है शिक्षक या समतामूलक समाज का कारक है शिक्षक डॉ. शंकर सुवन सिंह शिक्षक समाज का दर्पण होता है। समाज में व्याप्त बुराइयों को कुचलने में शिक्षक की अहम् भूमिका होती है। एक आदर्श शिक्षक अपनी लेखनी द्वारा समाज को जाग्रत करता है। एक शिक्षक को भिन्न भिन्न नामो से जाना जाता है। जैसे- टीचर, अध्यापक, गुरु, आचार्य,आदि। भविष्य की नई राह दिखाने वाले को शिक्षक कहते हैं। शिक्षक संकटों से उबारता है। शिक्षक के अंदर क्षमा करने का गुण होता है। गुरु शिष्य परंपरा में गुरु विद्यार्थियों की कमजोरियों को दूर कर उनको सफलता के चरम शिखर पर पहुँचाता है। तभी तो कृष्ण और अर्जुन जैसी गुरु शिष्य परम्परा को जीवंत रखने वाला भारत विश्व गुरु कहलाया। त्रेतायुग में राक्षसों का नाश करने के लिए श्री हरि विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। श्रीराम के कार्य में हाथ बंटाने के लिए...
गुलाम नबी हुए आजाद

गुलाम नबी हुए आजाद

विश्लेषण
*गुलाम नबी हुए आजाद* अतीत में राजनीति का अर्थ मात्र देश सेवा हुआ करता था, परन्तु वर्तमान समय में राजनीति का अर्थ अधिकांशतया स्वहित ही प्रमुख होता जा रहा है। किसी भी नेता का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आना-जाना अब एक साधारण बात हो गई है, क्योंकि राजनीति अब जनसेवा के स्थान पर व्यवसाय बन चुकी है और जिस पार्टी का व्यवसाय अच्छा चल रहा होता है, अधिकांश नेता उसी पार्टी में लाभ प्राप्त करने हेतु आतुर रहते हैं। इसके इतर जब कोई नेता 51 वर्षो की दीर्घ अवधि तक सेवा करने के पश्चात, मूल पार्टी को छोड़कर चला जाता है तो, निःसन्देह यह आश्चर्य का विषय है। देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी, अपनी स्थापना से लेकर आज तक के कार्यकाल में सर्वाधिक निम्न स्तर पर आ चुकी है और वर्तमान में कोई भी ऐसा नेता दृष्टिगत नहीं हो रहा है जो कांग्रेस के डूबते जहाज को बचा सके। सोनिया जी अपनी उम्र और गिरते स्थास्थ्य कारणों ...
भारतीय शिक्षा जगत को नयी दिशा देने वाले – डा. राधाकृष्णन

भारतीय शिक्षा जगत को नयी दिशा देने वाले – डा. राधाकृष्णन

BREAKING NEWS, Current Affaires, EXCLUSIVE NEWS
5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष - भारतीय शिक्षा जगत को नयी दिशा देने वाले - डा. राधाकृष्णन भारतीय शिक्षा जगत को नई दिशा देने वाले डा. राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन दक्षिण मद्रास से लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित तिरुत्तनी नामक छोटे से कस्बे में 5 सितम्बर सन 1888 ई. को सर्वपल्ली वीरास्वामी के घर पर हुआ था। उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे। डा. राधाकृष्णन बचपन से ही कर्मनिष्ठ थे। उनकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा तिरुत्तनी हाईस्कूल बोर्ड व तिरूपति के हर्मेसबर्ग इवंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल में हुई। उन्होनें मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद येल्लोर के बोरी कालेज में प्रवेश लिया और यहां पर उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। सन 1904 में विशेष योग्यता के साथ प्रथम कला परीक्षा उत्तीर्ण की तथा तत्कालीन मद्रास के क्रिष्चियन कालेज में 1905 में बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने क...
कैसे हों देश के मास्टरजी

कैसे हों देश के मास्टरजी

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 कैसे हों देश के मास्टरजी अथवा कैसे मिले भारत को समर्पित गुरुजन आर.के. सिन्हा शिक्षक दिवस पर आज सारा देश अपने शिक्षकों की ही चर्चा करेगा। यह साफ है कि बेहतर और समर्पित शिक्षकों के बिना हम राष्ट्र निर्माण सही ढंग से नहीं कर सकते। पर हमारे देश में एक बड़ी समस्या यह सामने आ रही है कि कम से कम स्कूली स्तर पर कोई बहुत मेधावी युवा शिक्षक नहीं बन रहे हैं। आप अपने अड़ोस-पड़ोस के किसी मेधावी लड़के या लड़की को शिक्षक बनता नहीं देखेंगे। ये ऐसा क्यों हो रहा है? इसी पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा? हमें अपने मेधावी नौजवानों को भी शिक्षक बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। सच में वर्तमान में तो चिंताजनक स्थिति ही बनी हुई है।  जिस भारत के राष्ट्रपिता भी शिक्षक रहे हों वहां के योग्य नौजवान मन से शिक्षक नहीं बन रहे हैं। वास्तव में यह विडंबना ही है। यह तथ्य कम लोगों को पता है कि महात्मा गांधी कुछ समय तक...
चीनी मुसलमानों की दुर्दशा

चीनी मुसलमानों की दुर्दशा

सामाजिक
*चीनी मुसलमानों की दुर्दशा* *डाॅ. वेदप्रताप वैदिक* संयुक्तराष्ट्र संघ की मानव अधिकार परिषद ने चीन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उसकी ताजा रपट में उसने बताया है कि चीन के शिन च्यांग (सिंक्यांग) प्रांत के लगभग दस लाख उइगरों को यातना शिविरों में बंद करके रखा हुआ है। ये उइगर मुसलमान हैं। ये दिखने में भी चीनियों से अलग दिखते हैं। उनका सिंक्यांग प्रांत हमारे लद्दाख से लगा हुआ है। सैकड़ों सालों से पैदल रास्ते चीन जानेवाले और वहां से आनेवाले व्यापारी, विद्वान, यात्रीगण इसी रास्ते से आया जाया करते थे। उइगरों का यह क्षेत्र सदियों से चीनी वर्चस्व के बाहर रहा है। कम्युनिस्ट शासन की स्थापना होने के पहले इस उइगर-क्षेत्र में आजादी का आंदोलन चलता रहा है लेकिन जब से चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ है, उइगर मुसलमानों को बड़ी बेरहमी से दबाया गया है। कुछ उइगर नेताओं और व्यापारियों को अपना हथियार बनाकर ...
क्यों खास थी गोर्बाचेव की 1986 की भारत यात्रा

क्यों खास थी गोर्बाचेव की 1986 की भारत यात्रा

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क्यों खास थी गोर्बाचेव की 1986 की भारत यात्रा  आर.के. सिन्हा सोवियत संघ के आखिरी राष्ट्रपति रहे मिखाइल गोर्बाचेव भारत में भी हमेशा याद रखे जायेंगे  कि उन्होंने शीत युद्ध को खत्म करने की ठोस कोशिशें की। उनका विगत बुधवार को निधन हो गया। मिखाइल गोर्वाचेव ने रूसियों को स्वतंत्रता का रास्ता दिखाया। यूरोप में शांति के लिए उनकी प्रतिबद्धता ने हमारे इतिहास को बदल दिया। उनके निधन से उनकी सन 1986 में की गई भारत यात्रा की यादें भी ताजा हो गईं। वे भारत यात्रा के एक साल पहले ही सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने थे। वे नवंबर 1986 में भारत के चार दिनों के दौरे पर आये थे। उनकी यात्रा को देखते हुए पालम एयरपार्ट से लेकर उन सब जगहों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे, जहां पर उन्हें जाना था। दरअसल उस दौर में राजधानी में बड़ी संख्या में अफगानी शरणार्थी रहते थे। वे सोवियत संघ की अफगान नीति से खफा थी। आशंका...
बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने की जरूरत।

बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने की जरूरत।

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बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने की जरूरत। दुनिया में बोली जाने वाली प्रत्येक भाषा एक विशेष संस्कृति, माधुर्य, रंग का प्रतिनिधित्व करती है और एक संपत्ति है। कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिक प्रयोगों ने साबित किया कि मातृभाषा के माध्यम से सीखना गहरा, तेज और अधिक प्रभावी है। एक बच्चे का भविष्य का अधिकांश सामाजिक और बौद्धिक विकास मातृभाषा के मील के पत्थर पर टिका होता है। अपूर्ण प्रथम भाषा कौशल अक्सर अन्य भाषाओं को सीखना अधिक कठिन बना देते हैं। यह तभी होगा जब वे युवा प्रेमपूर्ण भाषा के रूप में बड़े होंगे, उन्हें खतरा महसूस नहीं होगा और इससे उन्हें आंका जाएगा। हमें उनकी जरूरत है कविता और गीत और उपन्यास लिखने के लिए। हमें चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करें, न कि क्षमाप्रार्थी और लज्जित हों, न की सफलता इस बात पर आधारित है कि वे कितनी अंग्रेजी जानते हैं। -प्रियंका 'सौरभ' भा...
गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर की पहली स्वदेशी वैक्सीन तैयार

गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर की पहली स्वदेशी वैक्सीन तैयार

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गर्भाशय-ग्रीवा कैंसर की पहली स्वदेशी वैक्सीन तैयार नई दिल्ली, 02 सितंबर (इंडिया साइंस वायर): केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विज्ञान और प्रौद्योगिकी; राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पृथ्वी विज्ञान; पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री, डॉ जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को गर्भाशय-ग्रीवा (Cervical) कैंसर की रोकथाम के लिए भारत की पहली स्वदेशी रूप से विकसित वैक्सीन के विकास की घोषणा की है। चतुष्कोणीय मानव पैपिलोमा वायरस (क्यूएचपीवी) वैक्सीन पर पिछले लगभग 10 वर्षों के दौरान किये गए वैज्ञानिक अनुसंधान के सभी चरणों की समाप्ति की घोषणा करते हुए, केंद्रीय मंत्री ने इस उपलब्धि को हासिल करने में वैज्ञानिकों एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), और इसके सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम - जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बाइरैक) के प्रयासों की स...