ये बदलाव और नए ख्वाब
अनुज अग्रवाल
सम्पादक
देश ने राष्ट्रपति चुनावों में दलित की भी नयी परिभाषा देख ली। अब दलित भी दो खेमो में बंट गया। सेकुलर दलित और राष्ट्रवादी दलित। सेकुलर खेमे की इसी प्रकार की बेसिरपैर की व्याख्याओं के कारण उनका जनाधार सिमटता जा रहा है। वे समझ ही नहीं रहे कि देश राष्ट्रवादी दर्शन और विचारों को स्वीकार कर चुका है। अंग्रेजों के बांटो और राज करो के मंत्र के दिन अब भारत में लद चुके हैं। अब सत्ता हथियाने के दर्शन की इस नाव में इतने छेद हो चुके हैं कि यह डूबने वाली है। जो समझदार हैं वे इस नाव को छोड़ते जा रहे हैं। चलो एक बात अच्छी हुई कि इस दलित राजनीति की चिकचिक से एक सरल,सहज विद्वान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के रूप में देश को मिल गया। इधर राज्यसभा में अल्पमत एन डी ए को उपराष्ट्रपति के रूप में वेंकैया नायडू जैसा तेजतर्रार चेहरा मिलने जा रहा है जिससे उनके लिए आगे की राह बड़ी आसान होने जा रही है...









